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Shri Krishna Shanti Doot Mahabharat Story in hindi

Shri Krishna Shanti Doot Mahabharat Story in hindi

श्री कृष्ण का शांति दूत बनना महाभारत की कहानी

 

पांडवों का वनवास और अज्ञातवास दोनों ही पुरे हो चुके थे। इसके बाद वीर अभिमन्यु का विवाह विराट की पुत्री उत्तरा के साथ किया गया। अब सभी पांडव उपप्लव्य नगर में रहने लगे। यहाँ पर सभी एकत्र हुए हैं। राजा विराट, ध्रुपद, कृष्ण, बलराम और सभी पांडव। सभी आपस में विचार विमर्श करते हैं कि पांडवों को अब क्या करना चाहिए। कौरवों के पास 2 ही विकप्ल थे। या तो पांडवों को इंद्रप्रस्थ राज्य लौटा दिया जाये या फिर पांडवों के साथ युद्ध किया जाये। युद्ध में काफी संहार होने वाला था। इसलिए सबने विचार विमर्श करके एक दूत को कौरवों के पास भेजा गया।

 

इधर धृतराष्ट्र को भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, विदुर सभी समझा रहे थे कि वे राजा हैं। और राजा होने के नाते पांडवों को उनका इंद्रप्रस्थ लौटा दिया जाये।  इसी में सबका भला है। लेकिन धृतराष्ट कहता है कि मेरे पुत्र दुर्योधन को ये मंजूर नहीं है। इसलिए मैं अपने पुत्र की बात मानूंगा।

 

जब दूत राज सभा में आया तब दूत ने कहा कि महाराज पांडवों ने आपसे इंद्रप्रस्थ लौटने के लिए कहा है। उसी समय दुर्योधन खड़ा हो गया। उसने कहा कि वो पांडवों को राज्य नहीं लौटाएगा। चाहे कुछ भी हो जाये। भीम, गुरु द्रोण, सबने बहुत समझाया लेकिन दुर्योधन नहीं समझा। तब दूत को धृतराष्ट्र ने ये सन्देश दिया कि तुम पांडवों से जाकर कहो कि कौरवों का दूत तुम्हारे पास आएगा।

 

पांडवों का दूत वापिस लौट गया। धृतराष्ट ने संजय को बुलाया और ये कहकर भिजवाया कि तुम कुछ भी करके पांडवों को समझा लेना कि वो जहाँ भी है खुश रहे। दुर्योधन के कारण धृतराष्ट्र उन्हें राज्य देने में असमर्थ है। ये सब बात संजय ने जाकर युधिष्ठिर आदि पांडवों को बताई।  अर्जुन को क्रोध आ गया। अर्जुन कहता है अगर वे हमें राज्य नहीं लौटना चाहते हो युद्ध के लिए तैयार रहें।

 

संजय ने यही बात जाकर सभा में बताई कि पांडवों ने कहा है कि वो शांति बनाये रखना चाहते हैं। अगर वे राज्य लौटा देते हैं तो पांडव युद्ध नहीं करेंगे। तभी दुर्योधन खड़ा हो गया और कहता है क्या ये पांडव हमें युद्ध के नाम से डराना चाहता हैं। हम उन्हें इंद्रप्रस्थ नहीं देंगे।

 

गुरु द्रोण से इस विषय पर राय मांगी गई । गुरु द्रोण ने कहा कि आप पांडवों को उनका इंद्रप्रस्थ लौटा दीजिये इसी में कुरुवंश की भलाई है। दुर्योधन ने कहा कि आप सब बूढ़े हो गए हैं जो पांडवों के पक्ष में बात कर रहे हैं। हम उनसे युद्ध करने के लिए तैयार हैं।

 

Krishna Arjun and Duryodhan hindi story  : कृष्ण अर्जुन और दुर्योधन की कहानी

अब युद्ध का लगभग पक्का हो गया। शकुनि ने दुर्योधन से कहा कि दुर्योधन अपने घमंड को छोड़ो और एक काम करो। युद्ध में अगर तुम वासुदेव श्री कृष्ण को अपने पक्ष में ले लोगे तो तुम्हे युद्ध में जितने से कोई नहीं रोक सकता। ये बात समझकर शकुनि ने दुर्योधन को द्वारिका में भेजा। जिस समय दुर्योधन द्वारिका में पहुंचा उस समय कृष्ण सोये हुए थे। दुर्योधन भगवान के सिरहाने आकर बैठ गया। थोड़ी ही देर में अर्जुन भी वहां पर आ गया। अर्जुन हाथ जोड़कर भगवान के श्रीचरणों के पास नम्रतापूर्वक बैठ गये।  भ ये दोनों भगवान श्री कृष्ण को अपनी ओर से युद्ध करने के लिए अपने पक्ष में करने के लिए आये हैं।

 

 

भगवान कृष्ण की जब आँख खुली तो उन्होंने पहले अर्जुन को देखा क्योंकि वो सामने बैठा हुआ था। भगवान ने कहा कि पार्थ यहाँ किस तरह से आये हो। तभी दुर्योधन बीच में बोल पड़ा कि इससे पहले तो मैं आया हूँ।

 

भगवान कहते हैं ठीक है! तुम आये हो लेकिन मेरी दृष्टि पहले तो अर्जुन पर पड़ी है। मैंने अर्जुन को देखा है। बताओ अर्जुन क्या चाहते हो। अर्जुन कहता है कि प्रभु आप युद्ध में हमारी तरफ से लड़ेंगे। भगवान मुस्कुराये ओर कहते हैं कि- “एक ओर तो मेरी ‘नारायणी सेना’ है और दूसरी ओर मैं रहूंगा; परन्तु मैं शस्त्र नहीं उठाऊंगा। आपमें से जिन्हें जो रूचे, ले लें; किंतु मैंने अर्जुन को पहले देखा है, अतः पहले मांग लेने का अधिकार अर्जुन का है।”  एक ओर भगवान का बल, उनकी सेना और दूसरी ओर शस्त्रहीन भगवान।

 

 

 

अर्जुन ने तुरंत कह दिया। मैं सहायता में आपको मांगने के लिए आया हूँ। मुझे आपकी सेना से कोई मतलब नहीं है। तब दुर्योधन मन ही मन खुश हो गया कि अर्जुन तो निरा मूरख है। उस कृष्ण को अपनी सेना में ले रहा है जो युद्ध में अस्त्र शस्त्र नहीं उठाएगा। दुर्योधन दिखावा करते हुए अनमने मन से कहता है ठीक है कृष्ण! फिर आप मुझे अपनी नारायणी सेना ही दे दीजिये।

 

 

श्रीकृष्णचन्द्र ने दुर्योधन के जाने पर अर्जुन से कहा-  तुमने मुझ शस्त्रहीन को ही अपनी ओर क्यों लिया? तुम

 

अर्जुन ने कहा- “प्रभो! आपको छोड़कर मुझे तीनों लोकों का राज्य भी नहीं चाहिये। आप शस्त्र लें या न लें, पांडवों के एकमात्र आश्रय आप ही हैं।”

 

 

अब अर्जुन बलरामजी के पास भी गए हैं। बलराम जी कहा कि वो किस पक्ष में युद्ध लड़ेंगे। बलरामजी ने युद्ध करने से मना कर दिया। बलरामजी कहते हैं दोनों ओर तुम भाइयों का ही आपस में रक्त बहेगा। मेरी मानो तो युद्ध मत करो। इसलिए मैं ना तो तुम पांडवों को जीत का आशीर्वाद देता हूँ ओर ना ही कौरवों को। क्योंकि मुझे तुम पांडव और कौरव दोनों ही प्रिय हो। ऐसा कहकर बलराम जी ने युद्ध में शामिल होने से मना कर दिया।

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