Satsang Mahima Story/katha in hindi

Satsang Mahima Story/katha in hindi

सत्संग महिमा कथा/कहानी 

सत्संग महिमा में अनेक कथाएं है। केवल सत्संग के माध्यम से लोग भव सागर से पार तर जाते हैं। उन कथाओं में से आप ये कथा पढ़िए-

 

Narada and Krishna Satsang mahima story : नारद और कृष्ण जी सत्संग महिमा कथा 

एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास गये और प्रणाम करते हुए बोलेः “हे लक्ष्मीपते, हे कमलनयन ! कृपा करके इस दास को सत्संग की महिमा सुनाइये।”

भगवान ने मंद-मंद मुस्कराते हुए अपनी मधुर वाणी में कहाः हे नारद ! सत्संग की महिमा का वर्णन करने में तो वाणी की गति नहीं है।

” फिर क्षण भर रूककर श्री भगवान बोलेः ” हाँ, यहाँ से तुम आगे जाओ। वहाँ इमली के पेड़ पर एक बड़ा विचित्र, रंगीन गिरगिट है, वह सत्संग की महिमा जानता है। उसी से पूछ लो।”

देवर्षि खुशी-खुशी इमली के पेड़ के पास गये और योगविद्या के बल से गिरगिट से बातें करने लगे। उन्होंने गिरगिट से पूछाः “सत्संग की महिमा क्या है ? कृपया बतलाइये।”

सवाल सुनते ही वह गिरगिट पेड़ से नीचे गिर गया और छटपटाते हुए प्राण छोड़ दिये। नारदजी को बड़ा अचंभा हुआ। वे डरकर लौट आये और भगवान को सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

भगवान ने मुस्कराते हुए कहाः “अच्छा, नगर के उस धनवान के घर जाओ और वहाँ जो तोता पिंजरे में दिखेगा, उसी से सत्संग की महिमा पूछ लेना।”

नारदजी क्षण भर में वहाँ पहुँच गये एवं तोते से वही सवाल पूछा, मगर देवर्षि के देखते ही देखते उसने आँखें मूंद लीं और उसके भी प्राणपखेरू उड़ गये। अब तो नारद जी बड़े घबरा गये।

वे तुरंत भगवान के पास लौट आये और कहने लगेः “यह क्या लीला है भगवन् ! क्या सत्संग का नाम सुनकर मरना ही सत्संग की महिमा है ?”

श्री भगवान हँसकर बोलेः “वत्स ! इसका मर्म भी तुमको समझ में आ जायेगा। इस बार नगर के राजा के महल में जाओ और उसके नवजात पुत्र से अपना प्रश्न पूछो।”

नारदजी तो थरथर काँपने लगे और बोलेः “हे प्रभु ! अब तक तो बच गया लेकिन अब की बार तो लगता है मुझे ही मरना पड़ेगा। अगर वह नवजात राजपुत्र मर गया तो राजा मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा।”

भगवान ने नारदजी को अभयदान दिया। नारदजी दिल मुट्ठी में रखकर राजमहल में आये। वहाँ उनका बड़ा सत्कार किया गया। अब तक राजा को कोई संतान नहीं थी। अतः पुत्र के जन्म पर बड़े आनन्दोल्लास से उत्सव मनाया जा रहा था।

नारदजी ने डरते-डरते राजा से पुत्र के बारे में पूछा। नारदजी को राजपुत्र के पास ले जाया गया। पसीने से तर होते हुए, मन-ही-मन श्रीहरि का नाम लेते हुए नारदजी ने राजपुत्र से सत्संग की महिमा के बारे में प्रश्न किया तो वह नवजात शिशु हँस पड़ा और बोलाः “महाराज ! चंदन को अपनी सुगंध और अमृत को अपने माधुर्य का पता नहीं होता। ऐसे ही आप अपनी महिमा नहीं जानते इसलिए मुझसे पूछ रहे हैं।

वास्तव में आप ही के क्षणमात्र के संग से मैं गिरगिट की योनि से मुक्त हो गया और आप ही के दर्शनमात्र से तोते की क्षुद्र योनि से मुक्त होकर इस मनुष्य जन्म को पा सका।

आपके सान्निध्यमात्र से मेरी कितनी सारी योनियाँ कट गयीं और मैं सीधे मानव-तन में पहुँच गया, राजपुत्र बना। यह सत्संग का कितना अदभुत प्रभाव है ! हे ऋषिवर ! अब मुझे आशीर्वाद दें कि मैं मनुष्य जन्म के परम लक्ष्य को पा लूँ।”

नारदजी ने खुशी-खुशी आशीर्वाद दिया और भगवान श्री हरि के पास जाकर सब कुछ बता दिया। श्रीहरि बोलेः “सचमुच, सत्संग की बड़ी महिमा है। संत का सही गौरव या तो संत जानते हैं या उनके सच्चे प्रेमी भक्त !” इसलिए जब भी समय मिले सत्संग कीजिये ।

 

 Read : सत्संग की महिमा 

Raja Janak Satsang Mahima Story : राजा जनक सत्संग महिमा कथा 

राजा जनक ने सत्संग का आयोजन किया। जिस समय सत्संग शुरू होने वाला था उसी समय एक काला भयंकर विषधर उस सभा में आया। सत्संगकर्ता अष्टावक्र ऋषि ने योगबल से सर्प का भूतकाल देखकर सभाजनों से कहा: ‘तुम लोग तुम डरो मत, यह भूतपूर्व सम्राट राजा अज है।’

सत्संग की पूर्णाहुति की घड़ियां आईं तब सर्प की जगह पर एक देवपुरुष की आकृति उभर आई। उस देवपुरुष ने राजा जनक का माथा चूमते हुए कहा: ‘पुत्र हो तो तेरे जैसे हों। तुम्हारे सत्संग-आयोजन से और अष्टावक्र मुनि की कृपा से मैं सत्संग सुन पाया, जिसके फलस्वरूप मुझे अजगर की दुःखद योनि से छुटकारा मिला।’

राजा अज पार्षदों के साथ स्वर्ग की ओर गए। राजा जनक को पूर्वजों के दर्शन करने की इच्छा हुई। वे योगबल से यमपुरी पहुंचे। उन्हें देखकर यमराज बोले,’जनक! तुम सीधे स्वर्ग में नहीं जा सकते, तुम्हें नरक के रास्ते होते हुए जाना पड़ेगा।’ जनक दो यमदूतों के साथ स्वर्ग की ओर जाने लगे। मार्ग में नारकीय जीवों का आक्रन्द सुनकर जनक चकित हो गए। इतने में वह आक्रन्द जय-जयकार में बदल गयाः ‘जनक! तुम्हारी जय हो…जय हो…।’

सत्संग की वायु इतनी शुद्ध है कि नरकवासियों को भी शांति देती है। पाप में रत रहकर घोर नरक पानेपर्यंत पाप करनेवाले जो पापी हैं, उन्हें भी सत्संग सुख-शांति देता है। अर्थात सत्संग से पापफल भोगे बिना पाप से छुटकारा मिल सकता है। यह तो आपने सुना होगा कि कर्मफल भोगे बिना नष्ट नहीं होता- नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। लेकिन सत्संग की महिमा अनंत है। यदि दुःख के समय मनुष्य सत्संग में जा बैठे तो दुःख कम हो जाता है, यह प्रत्यक्ष है। पाप के फल से प्राप्त जो शोक, भय, चिंता है वह भी घट जाती है। इस प्रकार पाप-फल से बच गए।

यमदूत बोले, ‘महाराज! आपने गुरुदीक्षा ली है और गुरुतत्त्व का, आत्मतत्त्व का प्याला पिया है। आपको छूकर बहती हुई हवा पापियों के पाप-ताप को निवृत्त कर रही है इसलिए वे जय-जयकार कर रहे हैं।’

जनक ने यमदूतों से कहा,’यदि मेरे यहां रुकने से इन्हें शांति मिलती है तो मैं यहां ठहरता हूं।’

उसी समय नरक के अधिष्ठाता ने आकर जनक को कहा, ‘राजन्! आप पुण्यात्मा हैं। आप यहां अधिक देर तक नहीं ठहर सकते। कृपया अब आप स्वर्ग की ओर प्रस्थान करें।’

जनक बोले, ‘यदि ऐसा ही है तो इनके कल्याण के लिए मैं अपने सारे पुण्य अर्पित करता हूं।’ उसी समय यमराज स्वयं वहां पधारे और बोले, ‘जनक! इनकी भलाई में अपने पुण्य अर्पित करने से तो तुम्हें महापुण्य हुआ है।’

जनक बोले, ‘मैं अपना महापुण्य भी इनके कल्याण हेतु अर्पित करता हूं।’ फिर तो साक्षात नारायण आ गए और बोले, ‘जनक! अब तो तुम्हें परम पुण्य हुआ है। तुम्हारे जैसे महात्मा जहां जाते हैं, वहीं मेरा और वैकुण्ठ का प्राकट्य हो जाता है।’

जनक, ‘भगवन्! मुझे तो पता तक न था कि सत्संग का, संत-सान्निध्य का इतना महत्त्व है। प्रभो! अब तो मैं अपने अंतरात्म-स्वर्ग में ही नित्य निवास करूंगा।’

भगवान ने कहा, ‘जनक! आज से मेरे दो हृदय होंगे। मेरा एक हृदय तुम्हारे जैसे संतों के साथ रहेगा और दूसरा हृदय जब-जब मैं अवतार लूंगा तब-तब काम में लूंगा।’

बोलिए संत समाज की जय !!

Read : श्री राम जन्मोत्सव कथा

Read : श्री कृष्ण जन्मोत्सव कथा 

2 thoughts on “Satsang Mahima Story/katha in hindi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.