Ravana-Kumbhakarna-Vibhishana punarjanma story

Ravana-Kumbhakarna-Vibhishana punarjanma story 

रावण-कुम्भकर्ण-विभीषण पूर्वजन्म कथा 

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस कथा का वर्णन किया है-

Pratapbhanu-Arimardan and Dharamruchi story: प्रतापभानु, अरिमर्दन और धर्मरुचि की कहानी 

कैकय देश के एक राजा थे सत्यकेतु(satyaketu)। इस राजा के दो पुत्र थे। प्रतापभानु(pratapbhanu) और अरिमर्दन(Arimardan)। राजा ने जेठे पुत्र( प्रतापभानु) को राज्य दे दिया और आप भगवान (के भजन) के लिए वन को चल दिए।

जब प्रतापभानु(Pratapbhanu) राजा हुआ, देश में उसकी दुहाई फिर गई। वह वेद में बताई हुई विधि के अनुसार उत्तम रीति से प्रजा का पालन करने लगा। उसके राज्य में पाप का कहीं लेश भी नहीं रह गया। अपनी भुजाओं के बल से उसने सातों द्वीपों (भूमिखण्डों) को वश में कर लिया और राजाओं से दंड (कर) ले-लेकर उन्हें छोड़ दिया। सम्पूर्ण पृथ्वी मंडल का उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र (चक्रवर्ती) राजा था। राजा प्रतापभानु का बल पाकर भूमि सुंदर कामधेनु (मनचाही वस्तु देने वाली) हो गई। (उनके राज्य में) प्रजा सब (प्रकार के) दुःखों से रहित और सुखी थी और सभी स्त्री-पुरुष सुंदर और धर्मात्मा थे।

इनके मंत्री थे धर्मरुचि।  यह राजा गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मण- इन सबकी सदा सेवा करता रहता था और राजा को नीति की बात बताया करता था जो वैद पुराणों में लिखी हुई हैं। जीवन में सब कुछ सम्पन्नता थी।

एक बार वह राजा एक अच्छे घोड़े पर सवार होकर, शिकार का सब सामान सजाकर विंध्याचल के घने जंगल में गया और वहाँ उसने बहुत से उत्तम-उत्तम हिरन मारे। राजा ने वन में फिरते हुए एक सूअर को देखा। नील पर्वत के शिखर के समान विशाल (शरीर वाले) उस सूअर को देखकर राजा घोड़े को चाबुक लगाकर तेजी से चला और उसने सूअर को ललकारा कि अब तेरा बचाव नहीं हो सकता। राजा ने बाण को धनुष पर चढ़ाया। सूअर बाण को देखते ही धरती में दुबक गया। राजा भी उसके पीछे-पीछे चला जा रहा हैं। सूअर भागकर पहाड़ की एक गहरी गुफा में जा घुसा। उसमें जाना कठिन देखकर राजा को बहुत पछताकर लौटना पड़ा। लेकिन बहुत देर हो गई थी राजा रास्ता भटक गया।

वन में फिरते-फिरते उसने एक आश्रम देखा, वहाँ कपट से मुनि का वेष बनाए एक राजा रहता था, जिसका देश राजा प्रतापभानु ने छीन लिया था और जो सेना को छोड़कर युद्ध से भाग गया था। दरिद्र की भाँति मन ही में क्रोध को मारकर वह राजा तपस्वी के वेष में वन में रहता था। जब राजा प्रतापभानु इसके पास गया तो इसने तुरंत पहचान लिया कि यह प्रतापभानु है। प्रतापभानु प्यास से बहुत व्याकुल था और इस कपटी मुनि को पहचान नही पाया।

जब कपटी मुनि ने राजा से पूछा की तुम कौन हो? तब राजा ने झूठ बोल दिया की राजा ने कहा-हे मुनीश्वर! सुनिए, प्रतापभानु नाम का एक राजा है, मैं उसका मंत्री हूँ। शिकार के लिए फिरते हुए राह भूल गया हूँ। बड़े भाग्य से यहाँ आकर मैंने आपके चरणों के दर्शन पाए हैं।

सुंदर वेष देखकर राजा ने उसे महामुनि समझा और घोड़े से उतरकर उसे प्रणाम किया, फिर घोड़े सहित एक सरोवर में स्नान और जलपान किया।

उस कपटी मुनि ने कहा-सुजान! सुनो, घोर अँधेरी रात है, घना जंगल है, रास्ता नहीं है, ऐसा समझकर तुम आज यहीं ठहर जाओ, सबेरा होते ही चले जाना।

राजा ने उस कपटी मुनि की बात मान ली।

तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥ –व्यक्ति के जीवन में जो घटना जहाँ घटनी होती हैं उसको कोई रोक नही सकता हैं।

अब रात्रि में राजा उस कपटी मुनि से पूछते हैं-हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम (धाम) विस्तार से बतलाइए की आप कौन हैं?

Pratapbhanu or kapti muni : प्रतापभानु और कपटी मुनि 

राजा ने उसको नहीं पहचाना, पर वह राजा को पहचान गया था। राजा तो शुद्ध हृदय था और वह कपट करने में चतुर था। एक तो वैरी, फिर जाति का क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल-बल से अपना काम बनाना चाहता था।

राजा को अपने वश में करके, अधिक स्नेह दिखाता हुआ वह (कपट-तपस्वी) ने झूठ बोलना शुरू कर दिया -हे राजन्‌! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे यहाँ रहते बहुत समय बीत गया। श्री हरि को छोड़कर किसी से कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता। प्रभु तो बिना जनाए ही सब जानते हैं। फिर कहो संसार को रिझाने से क्या सिद्धि मिलेगी।

(कपटी मुनि ने कहा-) जब सबसे पहले सृष्टि उत्पन्न हुई थी, तभी मेरी उत्पत्ति हुई थी। तबसे मैंने फिर दूसरी देह नहीं धारण की, इसी से मेरा नाम एकतनु है। हे पुत्र! मन में आश्चर्य मत करो, तप से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तप के बल से ब्रह्मा जगत को रचते हैं।

राजा सब सुनकर उस तपस्वी के वश में हो गया और तब वह उसे अपना नाम बताने लगा। तपस्वी ने कहा- राजन ! मैं तुमको जानता हूँ। तुमने कपट किया, वह मुझे अच्छा लगा। कपटी तपस्वी बोला- तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, महाराज सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे।

राजा को लगा की ये सच में कोई महान तपस्वी हैं। और इनके चरण राजा ने पकड़ लिए। अब राजा इनसे एक प्रार्थना करता हैं की मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुःख से रहित हो जाए, मुझे युद्ध में कोई जीत न सके और पृथ्वी पर मेरा सौ कल्पतक एकछत्र अकण्टक राज्य हो॥

कपटी मुनि ने ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर वह कुटिल कपटी मुनि फिर बोला- (किन्तु) तुम मेरे मिलने तथा अपने राह भूल जाने की बात किसी से (कहना नहीं, यदि) कह दोगे, तो हमारा दोष नहीं। क्योंकि अगर ब्राह्मण लोग को इस बात का पता चलेगा वो तुम्हे शाप दे देंगे।

प्रतापभानु कहते हैं यदि मैं आपके कथन के अनुसार नहीं चलूँगा, तो (भले ही) मेरा नाश हो जाए। मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। मेरा मन तो हे प्रभो! (केवल) एक ही डर से डर रहा है कि ब्राह्मणों का शाप बड़ा भयानक होता है। वे ब्राह्मण किस प्रकार से वश में हो सकते हैं, कृपा करके वह भी बताइए।

तपस्वी ने कहा-) हे राजन्‌ !सुनो,एक उपाय बहुत सहज है, परन्तु उसमें भी एक कठिनता है। दिक्कत इस बात की हैं जो मैं कहने जा रहा हूँ वो किसी गाँव या नगर से नही हो सकता हैं। हे राजन्‌! वह युक्ति तो मेरे हाथ है, पर मेरा जाना तुम्हारे नगर में हो नहीं सकता। जब से पैदा हुआ हूँ, तब से आज तक मैं किसी के घर अथवा गाँव नहीं गया।

अब राजा ने मुनि के चरण पकड़ लिए। (अतः) हे प्रभो! मेरे लिए इतना कष्ट (अवश्य) सहिए।

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