Raskhan Story in hindi

Raskhan Story in hindi 

रसखान की कहानी

रसखान का अर्थ है रस की खान। जो भक्त भगवान श्री कृष्ण के रूप माधुर्य में, भगवान की कथा के रस में डूब हुआ है वो रसखान है।

रसखान जी एक मुस्लमान भक्त हुए है। यहाँ पर उन्ही की कहानी दी गई है। उनके जीवन के अनेक प्रसंग सुनने को मिलते हैं। उनमे से एक है-
एक बार वे “श्रीमद्भागवत-कथा” समारोह में पहुंचे। वहां पर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं को बड़े प्रेम से सुनने लगे। व्यासगद्दी के पास भगवान श्री कृष्ण का बहुत ही सुंदर चित्र रखा हुआ था। उस चित्र को देखकर और भगवान की कथा सुनकर रसखान जी भगवान के दीवाने हो गए। कथा पूरी होने के बाद रसखान उन व्यास जी के पास पहुंचे जो भागवत कथा कह रहे थे।

रसखान ने उनसे पूछा, व्यास जी! आप जिनकी कथा सुना रहे थे ये उन्ही का चित्र है क्या? ये उनकी ही तस्वीर है?

व्यास जी ने कहा- हाँ ! ये भगवान श्री कृष्ण बांके बिहारी का चित्र है। रसखान के मन में अब भगवान की मूर्ति बस गई थी।

फिर रसखान ने पूछा- अच्छा ये श्री कृष्ण रहते कहाँ है?

व्यास जी बोले- ये ब्रज में श्री धाम वृन्दावन में रहते हैं। ज्यो ही इन्होंने सुना तो तुरंत ही ब्रज की ओर निकल पड़े।\

 

रसखान जी ब्रज पहुंचे। जैसे ही ब्रजभूमि में रसखान ने प्रवेश किया मानो उनका जीवन धन्य हो गया। आज बांके बिहारी श्री राधा रानी ने उन्हें अपने धाम में आने की अनुमत दे दी। अब रसखान जी गोवर्धन पर श्रीनाथ जी के दर्शन के लिए जाने लगे। लेकिन द्वारपाल ने उन्हें धक्का देकर निकल दिया। एक मुस्लिम कैसे भगवान के मंदिर में जा रहा है। तीन दिन बीत गए रसखान जी भगवान के दर्शन करने के लिए पीढ़ियों में ही बैठे हैं। वहां से जा नही रहे। भूखे प्यासे और भगवान भगवान के प्रेम में व्याकुल भगवान की एक झलक पाने को तरस रहे हैं।

 

अब रसखान जी भगवान के लिए पद गया रहे हैं। भगवान को उन पर दया आ गई। भगवान खुद आये और उन्होंने रसखान जी को दर्शन दिए। इसके बाद गोसाई श्रीविट्ठलनाथ जी ने उनको गोविंदकुंड पर स्नान कराकर दीक्षित किया। श्री विट्ठलनाथ श्री वल्लभाचार्य के पुत्र है। दीक्षा मिलने के बाद रसखान जी “रसखानि” हो गए। भगवान के प्रति उनका अगाध प्रेम हो गया। इसके बाद तो रसखान जी ने ऐसे ऐसे भगवान के लिए पद लिखे की आज भी उन्ही पदों को गाकर लोग परमात्मा को प्राप्त कर जाते हैं। भगवान के नाम, रूप रस में डूब जाते हैं।

 

रसखान जी का एक पद बड़ा ही सुंदर है – जिसमे ये भगवान के बाल रूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि-

“धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसि बनी सिर सुन्दर चोटी
खेलत खात फिरै अँगना, पग पैजनिया कटि पीरि कछौटी
वा छवि को रसखान बिलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी”

अर्थ :- बाल कृष्ण धूल भरे अति सुंदर लग रहे हैं। भगवान के सिर पर सुन्दर चोटी है, खेलते-खाते आँगन में घूम रहे हैं, पैरों में पैंजनी और कमर में पीली कछौटी बँधी है।

रसखान जी इस छवि को प्रेम से निहार रहे हैं और उस छवि पर कामदेव अपनी करोड़ों कलाओं को न्योछावर करते हैं। उस कौवे बड़े भाग हैं जो कृष्ण के हाथ से माखन रोटी छीन कर ले गया।

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उनका एक और पद बड़ा अच्छा है जिसमे वे केवल ब्रज में रहने की कामना करते हैं। रसखान जी कहते हैं कि

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वालन।
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन।
जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।।

अर्थ : – रसखान कहते हैं कि (अगले जन्म में) मैं यदि मनुष्य हूँ तो मैं गोकुल के ग्वालों और गायों के बीच रहना चाहूँगा।
यदि मैं पशु हूँ तो मै नन्द की गायों के साथ चरना चाहूँगा।

अगर पत्थर भी बनूंतो भी उस पर्वत का बनूँ जिसे हरि ने अपनी तर्जनी पर उठा ब्रज को इन्द्र के प्रकोप से बचाया था।
अगर मैं पक्षी हूँ तो मैं यमुना के तट पर किसी कदम्ब वृक्ष पर बसेरा करूँ।

धन्य हैं रसखान जी! जिन्होंने भगवान को और उनके प्रेम को पाया।

 

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