Ram Sister Shanta Story in hindi

Ram Sister Shanta Story in hindi

राम की बहन शांता की कहानी 

 

भगवान श्री राम के चरित्र अनेक हैं। और उनके सारे चरित्र अनेक जन्मो में भी नही गए जा सकते हैं। दुनियाभर में अनेक रामायण प्रचलित हैं। दक्षिण में वाल्मीकि रामायण, कंबन रामायण और रामचरित मानस, अद्भुत रामायण, अध्यात्म रामायण और आनंद रामायण की चर्चा ज्यादा होती है। उक्त रामायण का अध्ययन करने पर हमें रामकथा से जुड़े कई नए तथ्‍यों की जानकारी मिलती है। इसी तरह अगर दक्षिण की रामायण की मानें तो भगवान राम की एक बहन भी थीं, जो उनसे बड़ी थी। जबकि तुलसीदास कृत रामायण में इसका जिकर नही है। और ये तुलसीदास जी को वरदान भी था की इन्ही की रामायण कलयुग में सबसे ज्यादा गाई जाएगी। क्योंकि हनुमान जी महाराज का इसमें परम सहयोग है। 

 

राम की बहन कौन थीं? Ram ki sister kon thi?

इसका नाम क्या था? और Ram ki sister ka naam?

 

इस संबंध में तीन कथाएं मिलती हैं जो इस प्रकार हैं।
1. पहली कथा  : पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अंगदेश के राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी की कोई संतान नहीं थी। कहा जाता है कि एक बार अयोध्या में वर्षिणी ने मजाक में ही राजा दशरथ के सामने संतान न होने के अपने दुख को व्यक्त किया। इस पर राजा दशरथ के मुँह से अपनी बेटी शांता को उन्हें देने की बात निकल गई।

 

रघुकुल की यह परम्परा थी कि एक बार मुँह से निकले वचनों का पालन मरते दम तक किया जाता था। इसलिये राजा दशरथ ने अपनी एकमात्र बेटी शांता को उन्हें सौंप दिया। इस प्रकार शांता को लेकर रोमपद और वर्षिणी अपने देश लेकर आ गये जहाँ बड़े ही प्यार से उसका लालन-पालन होने लगा। राजा रोमपद और वर्षिणी ने बखूबी माता-पिता होने की जिम्मेदारी निभाई। शांता को वेद पठन और कला की शिक्षा भी दी गयी।

 

 

2. दूसरी कथा : लोककथा अनुसार शांता जब पैदा हुई, तब अयोध्‍या में अकाल पड़ा और 12 वर्षों तक धरती वीरान हो गई। राजा  को सलाह दी गई कि उनकी पुत्री शां‍ता ही अकाल का कारण है। राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को वर्षिणी को दान कर दिया। उसके बाद शां‍ता कभी अयोध्‍या नहीं आई। राजा दशरथ को इस बात का हमेशा डर रहता था की अगर शांता यहाँ पर आई तो फिर से आकाल पड़ जायेगा।

 

 

3. तीसरी कथा : कुछ लोग मानते थे कि राजा दशरथ ने शां‍ता को सिर्फ इसलिए गोद दे दिया था, क्‍योंकि वह लड़की होने की वजह से उनकी उत्‍तराधिकारी नहीं बन सकती थीं।
एक बार राजा रोमपद शांता से बातचीत में व्यस्त थे। तभी एक ब्राह्मण वहाँ पहुँचा और राजा से मानसून के दिनों में खेतों की जुताई के लिए मदद की गुहार लगाई। लेकिन रोमपद अपनी दत्तक पुत्री से बातचीत में इतने मशगूल थे कि उन्होंने उस ब्राह्मण की विनती की ओर ध्यान नहीं दिया।

 

राजा की इस अनदेखी से ब्राह्मण व्यथित हुआ और उसने वह राज्य छोड़ दिया। वर्षा के राजा इंद्र अपने भक्त की इस अनदेखी से अप्रसन्न और कुपित हुए। उनके प्रकोप से उस वर्ष अंगदेश में बहुत ही कम बारिश हुई। राजा रोमपद के समक्ष गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया। उन्होंने इस समस्या के निदान के लिए ऋष्यशृंग या ऋंगी ऋषि को बुलवाया और इससे बचने के लिए उन्हें यज्ञ करने को राजी कर लिया। ऋंगी ऋषि विभण्डक ऋषि के पुत्र तथा कश्यप ऋषि के पौत्र बताये जाते हैं। उनके नाम को लेकर यह उल्लेख है कि उनके माथे पर सींग (संस्कृत में ऋंग) जैसा उभार होने की वजह से उनका यह नाम पड़ा था।

 

ऋष्यशृंग या ऋंगी ऋषि यज्ञ करने को राजी हो गये लेकिन उन्होंने रोमपद की दत्तक पुत्री शांता का हाथ माँग लिया। राजा रोमपद और वर्षिणी थोड़ी संकुचित हुई क्योंकि शांता राजकुमारी थी जिसे ऋषि से शादी के बाद आश्रम में रहना पड़ता। लेकिन उन्होंने ऋषि की बात टाली नहीं और शांता का हाथ उनके हाथों में दे दिया।

 

कुछ अन्य पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राजा दशरथ और कौशल्या ने ही अपनी बेटी शांता श्रृंग ऋषि को सौंप दी थी।

 

बाद में ऋष्यशृंग ने ही दशरथ की पुत्र कामना के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया था। राजा दशरथ और इनकी तीनों रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहती हैं कि पुत्र नहीं होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। इनकी चिंता दूर करने के लिए ऋषि वशिष्ठ सलाह देते हैं कि आप अपने दामाद श्रृंग ऋषि से पुत्रेष्ठी यज्ञ करवाएं। इससे पुत्र की प्राप्ति होगी।

 

पहले तो ऋंग ऋषि ने यज्ञ करने से इंकार किया लेकिन बाद में शांता के कहने पर ही ऋंगी ऋषि राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करने के लिए तैयार हुए थे।

 

ऋषि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ सकता। मेरी पत्नी शांता को भी आना पड़ेगा। श्रृंग ऋषि की यह बात जानकर राजा दशरथ विचार में पड़ गए, क्योंकि उनके मन में अभी तक दहशत थी कि कहीं शांता के अयोध्या में आने से फिर से अकाल नहीं पड़ जाए।

 

तब पुत्र कामना में आतुर दशरथ ने संदेश भिजवाया कि शांता भी आ जाए। शांता तथा शृंग ऋषि अयोध्या पहुंचे। शांता के पहुंचते ही अयोध्या में वर्षा होने लगी और फूल बरसने लगे। शांता ने दशरथ के चरण स्पर्श किए।

 

दशरथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि ‘हे देवी, आप कौन हैं? आपके पांव रखते ही चारों ओर वसंत छा गया है।’ जब माता-पिता (दशरथ और कौशल्या) विस्मित थे कि वो कौन है? तब शांता ने बताया कि ‘वो उनकी पुत्री शांता है।’ दशरथ और कौशल्या यह जानकर अधिक प्रसन्न हुए। वर्षों बाद दोनों ने अपनी बेटी को देखा था।
दशरथ ने दोनों को ससम्मान आसन दिया और उन दोनों की पूजा-आरती की। तब शृंग ऋषि ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया तथा इसी से भगवान राम तथा शांता के अन्य भाइयों का जन्म हुआ ।

इसका कारण यह था कि यज्ञ कराने वाले का जीवन भर का पुण्य इस यज्ञ की आहुति में नष्ट हो जाता। राजा दशरथ ने शृंग ऋषि को यज्ञ करवाने के बदले बहुत सा धन दिया जिससे इनके पुत्र और कन्या का भरण-पोषण हुअा और यज्ञ से प्राप्त खीर से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। ऋंगी ऋषि फिर से पुण्य अर्जित करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने लगे।

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