Radha Rani Bhagat Roop Goswami Story

Radha Rani Bhagat Roop Goswami Story

Roop goswami ji Radha rani ke kirpa pater they. Rup goswami ji Radha rani se bahut prem karte they. unki story aapke samne hai  jo maine katha me suni or brajdiscovery per bhi hai.

रूप गोस्वामी जी अपने मन में निरंतर किशोरी जी , स्यामा जू, श्री राधा रानी का ध्यान करते थे । लेकिन अब उनकी उम्र काफी हो रही है, बीमार रहने लगे है । काफी समय बित चुका है लेकिन अब तक किशोरी जी की कृपा का दर्शन उन्हें नहीं हुआ है ।

एक बार वो नन्द गाँव में थे , उनकी कृपा न मिलने के कारण मन में काफी दुःख भरा हुआ था ।प्राण उनकी कृपा के बिना छटपट करने लगे। खाना-पीना छूट गया। मधुकरी को जाना बंद हो गया।
उसी समय संवाद मिला कि सनातन गोस्वामी आ रहे हैं उन्हें देखने। वो सोचने लगे ये तो मेरे गुरु के समान है, इनकी सेवा किस तरह से की जाये? उनके मन में आया अगर खीर बनाने की सामग्री मेरे पास होती तो गुरूजी को खीर बना कर खिलाता आज ।पर सामग्री आती कहाँ से? किसी से कुछ मांगने का उनका नियम नहीं था। मधुकरी को जाते तो बिना मांगे रोटियों के टूक और मिलता ही क्या? इच्छा दबा देनी पड़ी।
उसी समय एक ब्रज-बालिका आयी दूध, चावल, शक्करादि बहुत-सा सामान लेकरं बोली- “बाबा तू मधुकरी को नाय गयौ कई दिना ते। भूखौ होयगो। माँ ने तेरे तंई सामान भेज्यौ है। खीर बनाय के पाय लीजौं।” (अर्थ- बाबा आप भूखे होगे मेरी माँ ने आपके लिए सामान भेजा है जिसमे खीर बनाने का  सामान है ) ) गोस्वामी अवाक! सनातन गोस्वामी को खीर खिलाने की उनकी वासना जागते ही सामान प्रस्तुत! यह कैसी राधारानी की कृपा! उन्होंने तनिक भी विलम्ब न किया। तत्काल ही बालिका की माँ को प्रेरणा देकर सामान भिजवा दिया।

बस फिर क्या था जैसे ही रूप गोस्वामी ने कृपा को देखा उनकी आँखों से प्रेम के आंसू बहने लगे राधारानी की कृपा देख उनका हृदय द्रवित हो रहा था। पर हृदय का दुःख काम नहीं हो रहा था वह तो और बढ़ ही रहा था।  राधारानी कृपा करती हैं तो भी दूर रहकर लुक-छिपकर दूसरों के माध्यम से करती हैं, मुझे कुपात्र जान स्वयं सामने न आना ही ठीक समझती हैं- वे सोच रहे थे। बालिका उनकी ओर विस्मय से देख रही थी।

देखते-देखते बोली- “बाबा तू रोबे कायको है? दुर्बल है, खीर बनायवे की शक्ति नाँय, जा मारे? तो ला खीर मैं बनाय दऊँ।”(बाबा आप क्यों रो रहे हो ?बाबा आप शरीर से कमजोर हो? आपके अंदर खीर बनाने की भी शक्ति नहीं है ? तो लाओ मैं खीर बना देती हूँ )

“ना लाली, खीर तो मैं बना लूँगा। दुर्बल नहीं हूँ।”(नहीं लाड़ली में खुद ही बना लूंगा )

“बाबा, तेरो मोंहड़ो तो सूख रह्यौ है। हाथ-पैरन में जान दीखे नाँय। खानो-पीनो बन्द कर राख्यौ है। मधुकरी को जाय नाँय, तो दुर्बल तो आपई होयगो। च्यौं नई जाय मधुकरी को?

“लाली, मधुकरी के लिये ही क्या वृज में पड़ा हूँ? व्रजेश्वरी की कृपा के लिए। जब वे कृपा करती ही नहीं, तो मधुकरी जा के क्या करूँगा?”

“बाबा, तू जाने नाँय। कृपा तो तोपैं हय रही है। तबई तो तोको हियाँ राख राख्यौ है राधारानी ने। माँ कह्यौ करै बाक़ी कृपा के बिना कोऊ व्रज में रह नाँय सके। जासों तू दु:ख मति करे, अच्छो। मैं जाऊँ। खीर बनाय के पाय लीजों, नई राधारानी दु:ख पामेंगी।” वह बालिका स्नेह भरी दृष्टि से बाबा की ओर देखती और मुस्कराती वहाँ से चली गयी।

थोड़ी देर में सनातन गोस्वामी आ गये। खीर बनाकर रूप गोस्वामी ने उन्हें खिलायीं खीर की अप्राकृत सुगंध और स्वाद से वे चमत्कृत रह गये। उसे खाकर जो अप्राकृत नशा चढ़ा, वो देखते ही बनता था। रूप गोस्वामी से उन्होंने कहा- “रूप, ऐसी खीर तो मैंने कभी नहीं खाई! तुमने कैसे बनायी?”

रूप गोस्वामी ने सब कह सुनाया। सुनते ही सनातन गोस्वामी के शरीर में एक रोमांच पैदा हो गया रूपगोस्वामी की ओर देखते रह गये। कुछ देर बाद बोले- “रूप! तुम नहीं जानते कि वह बालिका जो खीर की सामग्री लाई थी कौन थी। वे स्वयं राधारानी थीं। तुमने उन्हें इतना कष्ट दिया। वे अपने भक्त को भूखा कब देख सकती हैं? अब फिर कभी जान-बूझकर भूखे रहने की बात न सोचना।”

“और देखो, अपने लिये या किसी और के लिये किसी वासना को भी हृदय में स्थान न देना। भक्त की वासना की पूर्ति के लिये ही राधारानी स्वयं चंचल हो उठती हैं। तुम्हारे हृदय में मुझे खीर खिलाने के लिए जो वासना हुई थी वह भी एक कारण है उनके स्वयं इतना कष्ट करने का।”

यह सुन रूप गोस्वामी के वचनों की पुष्टि के लिये किसी बाह्य साक्ष्य की आवश्यकता तो थी नहीं। पर बाह्य साक्ष्य से भी उनकी पुष्टि अपने-आप हो गयी, जब वे दूसरे दिन उस बालिका के घर गये मधुकरी को। उसे वहाँ न देखकर घरवालों से पूछा, तो उन्होंने कहा- “वह तो बहुत दिनों से मासी के घर दूसरे गाँव गयी है। अभी आयी कहाँ है?”

अब और भी इस बात में संदेह करने का कोई अवकाश न रहा कि उस व्रज-बालिका के रूप में राधारानी ही आयी थीं खीर की सामग्री लेकर। आना तो था ही उन्हें। अपने दोनों प्रिय भक्तों की एक साथ सेवा करने का अवसर उन्हें फिर कब मिलता? प्रियादास जी ने भक्तमाल की टीका में सूत्र रूप में इस घटना का उल्लेख इस प्रकार किया है-

रहे नंदगाँव रूप, आये श्रीसनातन जू,

महासुखरूप भोग खीर कौ लगाइयै॥

नेकु मन आई, सुखदाई प्रिया लाड़िली जू,

मानौ कोऊ बालकी सुसोज सब ल्याइयै॥

करिकै रसोई सोई, लै प्रसाद पायौ,

भायो, अमल सो आयो बढ़ि, पूछी, सो जताइयै॥

“फैरि जिन ऐसी करौ, यही दृढ़ हिये धरौ,

ढरौ निज चाल” कहि आँखें भरि आइयै॥ 359॥

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