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Prahlad-Narsingh and Hiranyakashipu story 2 in hindi

Prahlad-Narsingh and Hiranyakashipu story 2 in hindi

प्रह्लाद, नृसिंह और हिरण्यकशिपु की कहानी 2

पहले पार्ट(part 1) में आपने पढ़ा की किस तरह प्रल्हाद(Prahlad) जी का जन्म हुआ। इनको गुरुकुल में पढ़ने के लिए भेजा गया। गुरुकुल से आने के बाद इन्होने अपने पिता के सामने विष्णु(Vishnu) का नाम लिया। और इनके पिता ने इन्हे यातनाएं देनी शुरू की। आगे की कथा पढ़िए-

Holika(holi) Dahan hindi story: होलिका(होली) दहन की कहानी

हिरण्यकशिपु  ने अपने पुत्र को दण्ड स्वरुप उसे आग में जलाने का आदे़श दिया। इसके लिये राजा नें अपनी बहन होलिका(Holika) से कहा कि वह प्रह्लाद को जलती हुई आग में लेकर बैठ जाये।

उसको वरदान में एक ऐसी चादर मिली हुई थी जो आग(aag) में नहीं जलती थी। हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रहलाद को आग में जलाकर मारने की योजना बनाई।

होलिका बालक प्रहलाद को गोद में उठा जलाकर मारने के उद्देश्य से वरदान वाली चादर ओढ़ धूं-धू करती आग में जा बैठी। प्रभु-कृपा से वह चादर वायु के वेग से उड़कर बालक  प्रह्लाद पर जा पड़ी और होलिका जल कर वहीं भस्म हो गई।  इस प्रकार प्रह्लाद को मारने के प्रयास में  होलिका की मृत्यु हो गई।

तभी से होली(Holi) का त्योहार मनाया जाने लगा।

जब इतना सब करने पर भी प्रल्हाद की मृत्यु नही हुई तो हिरण्यकशिपु(hiranyakashipu) ने कहा की इसको यहाँ से कहीं भी दूर ले जाओ।

प्रल्हाद जी को फिर शण्ड(Shand)-अमर्क(Amark) लेकर गए। गुरुकुल में कमरे में बंद कर दिया गया। एक दिन शण्ड-अमर्क किसी काम से बाहर चले गए।

तब असुर बालकों ने प्रल्हाद जी को बाहर निकला और कहा की प्रल्हाद तुम हमारे साथ खेलो।

प्रल्हाद जी बोले की मुझे तुम्हारा खेल नही खेलना है। हाँ अगर तुम मेरा खेल खेलोगे तो मैं जरूर तुम्हारे साथ खेलूंगा। तब पूछने लगे की तुम्हारा खेल क्या है? और तुमने कहाँ से सीखा?

प्रल्हाद ने बताया है की मैंने अपनी माँ के पेट में अपने गुरु नारद जी से जान लिया था की परमात्मा के नाम में कितनी शक्ति है। और ये खेल मैंने अपने गुरुदेव नारद जी से सीखा। मेरे गुरुदेव नारद है।

सभी बालक बोले की आपके गुरुदेव ने आपको कौन सा खेल सिखाया है।
प्रह्लाद जी बोले की आप सभी बालक जाओ और मंजीरा , खड़ताल और ढोलकी लेकर आ जाओ।

हम सभी मिलकर भगवान को खुश करेंगे और उनका कीर्तन करेंगे। क्योंकि भगवान को खुश करने के लिए कोई बहुत परिश्रम या प्रयत्न नही करना पड़ता। बस उनसे प्रेम करो। दया की भावना अपने अंदर रखो। अपने दुर्गुणों को निकाल के फेंक दो। इस प्रकार प्रल्हाद जी ने सुंदर उपदेश दिया हैं।

सभी बालक अपने घर से सामान लेकर आ गए। प्रल्हाद जी को बीच में बिठाया और सभी दैत्य बालकों ने भगवान के नाम को खूब गया। भगवान नाम संकीर्तन जब करने लगे तो दैत्य बालकों ने ऐसा अनुभव न कभी सुना न कभी देखा।

प्रल्हाद जी को कीर्तन करते हुए इतना डूब गए की अपनी देह तक का भी भान नही रहा।

जब शण्ड-अमर्क आये तो देखा की आज तक ये प्रल्हाद खुद ही भगवान का नाम लेता था लेकिन आज इसने सभी दैत्य बालकों को भी नाम लेना सीखा दिया है। सारी की सारी पाठशाला ही बिगाड़ दी है। हमने कोई कीर्तन मण्डली थोड़ी खोल राखी है। हम तो गुरुकुल चला रहे है।

शण्ड-अमर्क दौड़ कर हिरण्यकशिपु के पास गए और बोले की इस प्रल्हाद को आप अपने पास रखिये। इसने सभी बालकों को विष्णु का भक्त बना दिया है।

सेनापति को भेजा गया। वो प्रल्हाद को लेकर आने लगे तो खुद भी भगवान को याद करने लगा। और कहा की आपको पिता ने याद किया है।

प्रल्हाद जी सभी बालकों से बोले की- मुझे पिता ने याद किया है। आप कीर्तन कीजिये मैं अभी थोड़ी देर में आया।

सभी बालक बोले की नही प्रल्हाद हम भी आपके साथ में चलेंगे।

प्रल्हाद बोले की मेरे पिताजी को ये भजन, कीर्तन पसंद नही है। आप यही पर कीर्तन करो।

लेकिन सभी बोले की यदि मण्डली से मंडलेश्वर ही चले गए तो मण्डली तो बिगाड़ जाएगी। जब नही माने तो प्रल्हाद जी महाराज सभी के साथ महल के अंदर पहुंचे तो हिरण्यकशिपु के कान में हरि का नाम गया। तो एक बार उसे भी आनंद आया। और मुख से हरि नाम निकल पड़ा।

थोड़ी देर में हिरण्यकशपु को याद आया अरे! ये विष्णु तो मेरा बेरि है मैं क्यू इसका नाम ले रहा हु।

इसने प्रल्हाद जी से कहा की तू विष्णु का भजन करना छोड़ दे।

प्रल्हाद जी ने कहा की आप खाने को मत दो, कपडे मत को लेकिन भजन करना मैं नही छोड़ पाउँगा।

Narsingh Bhagwan prakat : नृसिंह भगवान का प्रकट होना

हिरण्यकशिपु(hiranyakashipu) बोले की तू विष्णु, विष्णु(vishnu, vishnu) करता है। ये बता तेरा विष्णु रहता कहाँ है?

प्रल्हाद जी बोले की हरि व्यापक सर्वत्र सामना , प्रेम ते प्रकट होही मैं जाना।

भगवान विष्णु तो हर जगह विद्यमान है। यदि आप मेरी आँखों से देखंगे तो आपको हर जगह विष्णु दिखाई पड़ेंगे।

हिरण्यकशिपु बोले की फिर वो तेरे अंदर भी होगा।

प्रल्हाद बोले की हाँ मेरे अंदर भी है , आपके अंदर भी है और प्रत्येक जीव मात्र के अंदर वो विष्णु ही बैठा है।

हिरण्यकपु बोले की मेरे हाथ में जो तलवार है क्या इसमें भी तेरा विष्णु बैठा हुआ है?

प्रल्हाद जी बोले की हाँ इस तलवार में भी विष्णु बैठा हुआ है। ये विश्वास है भक्त का।

अच्छा प्रल्हाद तो क्या इस खम्बे में भी तेरा विष्णु बैठा हुआ है?

प्रल्हाद जी बोले की मो में , तो में, खडग खम्भ में, जहाँ देखो तहाँ राम। (mo me to me khadag khambh me jahan dekho tahan ram)

मुझमे, आपमें, इस तलवार में, और इस खम्बे में भी भगवान विष्णु बैठे हुए है।

जैसे ही इतना सुना तो हिरण्यकशिपु दौड़कर खम्बे के पास गया और जाकर के घुसा मारा। और खम्बे के 2 टुकड़े हो गए। जैसे ही खम्भे के 2 टुकड़े हुए उसमे से भगवान नृसिंह प्रकट हो गए। जिनका मुख तो सिंह जैसा और शरीर मानव जैसा।

नृसिंह भगवान का दर्शन करके हिरण्यकशिपु ने कहा की न तो ये नर है और न ये पशु है। आज मैं इससे अपने भाई की मृत्यु का बदला लूंगा। इतना कहकर भगवान को ललकारा।

भगवान और इसके बीच युद्ध हुआ। अंत में भगवान ने इसको पकड़ लिया और बीच देहलीज पर इसे लेकर गए और अपनी गोद में इसे लिटा लिया।

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