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Prahlad-Narsingh and Hiranyakashipu story 1 in hindi

Prahlad-Narsingh and Hiranyakashipu story 1 in hindi

प्रल्हाद, नृसिंह और हिरण्यकशिपु की कहानी 1

 

परीक्षित(Parikshit) जी महाराज शुकदेव(Sukdev) जी से कहते है की गुरुदेव! आप कहते है की भगवान समदर्शी(जो सबको समान दृष्टि से देखे) है। लेकिन देखने में आता है की भगवान देवताओ की रक्षा करते है और असुरों को मारते है। जब भगवान की दृष्टि में समदर्शिता है तो ये विषमता क्यों?

शुकदेव जी कहते है- परीक्षित, वास्तव में श्रोता हो तो तेरे जैसा हो। आपने जो प्रश्न किया है परमात्मा समदर्शी है या नहीं। ये भगवान की दृष्टि में नहीं है। ये मानव की दृष्टि में है।
हमको लगता है की भगवान देवताओं की रक्षा करते है और दैत्यों को मार देते है। जबकी वास्तव में वो देवताओं को मारते नहीं है बल्कि उन्हें तार देते है। भवसागर से उनका बेडा पार कर देते है। जब भगवान बाध्य और बाधकता को स्वीकार करके अवतार लेते है तो सबकी रक्षा करते है। उनकी दृष्टि में कोई भेद नहीं है।

परीक्षित जी महाराज शुकदेव जी से कहते है की मैंने सुना है की हिरण्यकशिपु(Hiranyakashipu) के घर भक्त प्रल्हाद(Bhagat prahlad)  का जन्म हुआ था। क्यों?
किसी भक्त के घर भक्त का जन्म हो तो समझ आता है पर हिरण्यकशिपु(Hiranyakashipu) अभक्त के घर भक्त का जन्म कैसे हो सकता है।

शुकदेव जी महाराज कहते है की जिस समय भगवान ने वराह(Varaha) अवतार लेके हिरण्याक्ष(Hiranyaksha) को मारा। हिरण्यकशिपु ने अपनी माँ दिति(Diti) को और अपने भाई की पत्नी को राजा सुयज्ञ की कथा सुनाकर आत्मा की नित्ता के बारे में समझाया। और ये मन्दराचल पर्वत(Mandrachal parvat) पर तप करने के लिए गए। 10 हजार वर्ष निकल गए। भगवान के प्रति इनके मन में बदले की भावना है। क्योंकि भगवान ने इनके भाई हिरण्याक्ष को मारा था।

ब्रह्मा(Brahma)  जी प्रकट हुए और बोले की बेटा- वर मांग।

ये मिटटी के ढेर से बाहर आया और ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांगने लगा।

लेकिन ब्रह्मा जी ने कहा की बेटा अमरता का वरदान में किसी को नही दे सकता। और कुछ मांग ले।

तब इसने माँगा की ब्रह्मा जी मुझे वर दीजिये की- ना मैं दिन में मरुँ, ना रात में मरुँ। ना घर में मरुँ ना बाहर मरुँ। ना आकाश में मरुँ ना पाताल में मरुँ। ना मैं जल में मरुँ ना, ना थल  पर मरुँ। ना अस्त्र से मरुँ ना शस्त्र से मरुँ। आपकी सृष्टि से पैदा होने वाले किसी भी जीव से ना मरुँ और अंत में ये भी मांग लिया की 12 महीनो में मेरी मृत्यु ना हो।

ब्रह्मा जी ने सोचा की-ये मरेगा कैसे? ये तो अमरता जैसा ही वर मांग रहा है। फिर भी ब्रह्मा जी ने सोचा की हमारा कोई भक्त तो बनता नहीं। ये एक भक्त बना है। अगर इसको भी वरदान नही दूंगा तो ये भी विरोधी बन जायेगा।
इतना सोचकर ब्रह्मा जी ने कह दिया तथास्तु।

Devotee Prahlad Birth(janam) story in hindi: भक्त प्रल्हाद जन्म कथा

इधर जब  इन्द्र ने देखा कि दैत्यराज हिरण्यकशिपु(Hiranyakashipu) तपस्या करने गया हुआ है, तब उसने देवताओं के साथ मिलकर उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। देवताओं से पराजित होकर सारे दैत्यगण इधर-उधर भागने लगे। जहां जिसको शरण मिली वह वहां छुप गया। देवताओं ने दैत्यपुरी को लूटकर जला दिया।

हिरण्यकशिपु की पत्नी दैत्येश्वरी कयाधू(kayadhu) उस समय गर्भवती थी। उसके सभी अनुचर और दैत्य भाग गए थे। इन्द्र ने बलपूर्वक उसे रथ में बिठाया और अमरावती की ओर ले चला। वह रोती हुई सहायता की प्रार्थना करने लगी। कयाधू ने इन्द्र(Indra) को बहुत धिक्कारा और कहा, ‘‘तुम देवताओं के राजा इन्द्र हो, परस्त्री हरण करना तुम्हें शोभा नहीं देता। अगर तुम अपना हित चाहते हो तो मुझ पतिव्रता स्त्री को शीघ्र छोड़ दो।’’ जब देवर्षि नारद( devarshi narad) के कानों में ये शब्द पड़े, तो उनका कोमल हृदय द्रवित हो गया। आगे बढ़कर उन्होंने देवराज को रोका।

नारद की ओर जब इन्द्र ने प्रश्न भरी दृष्टि से देखा कि वे ऐसा क्यों करना चाहते है, तो देवर्षि ने देवराज को सावधान करते हुए कहा, ‘‘देवराज ! यह आप क्या कर रहे हैं ? विजय के उन्मांद में मर्यादा का परित्याग आपको शोभा नहीं देता। क्या आप यह नहीं जानते कि किसी परायी स्त्री को बंदी बनाना ठीक नहीं है ?’’

इस पर इन्द्र ने कहा, ‘‘इसका पति हम देवताओं का शत्रु है, इसलिए मैं कयाधू को बंदी बनाकर रखना चाहता हूँ ताकि इसके गर्भ में पल रहे दैत्यवंश के उत्तराधिकारी को समाप्त कर दैत्यकुल के बीज को ही हमेशा के लिए समाप्त कर दूँ।’’ इन्द्र के इस तर्क पर मुस्कुराते हुए नारद बोले, ‘‘हे इन्द्र, तुम नहीं जानते कि इसके गर्भ में जो बालक है, वह चिरंजीवी है। उसका वध तुम्हारी शक्ति के बाहर की बात है। उससे देवताओं को कोई भय नहीं हो सकता। बल्कि वह तुम्हारे कल्याण का कारण बनेगा। वह भगवान का परम भक्त होगा।’
नारद की सलाह मानते हुए कयाधू को रथ से उतारकर इन्द्र वापस चले गए।

हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधू को जब इन्द्र ने मुक्त कर दिया तब वह बहुत प्रसन्न हुई और उसने नारद जी के चरणों में बार-बार प्रणाम करके अपनी कृतज्ञता प्रकट की।
नारद जी ने कहा, ‘‘पुत्री तुम्हारा दैत्यपुर तो ध्वस्त हो गया है अब तुम मेरे गुरुकुल में चलकर तब तक सुखपूर्वक रहो, जब तक आपके पति तपस्या समाप्त करके लौट नहीं आते ।’’

कयाधू ने देवर्षि की आज्ञा स्वीकार की और उनके साथ गुरुकुल में निवास करने लगी। कयाधू बड़ी श्रद्धा से नारद जी की सेवा करती। नारद जी के आदेशानुसार वह भक्ति-भाव से भगवान विष्णु का पूजन करती और उनका नाम जपती। असुर सम्राट की पत्नी होती हुई भी तपस्विनी की भांति वह जीवन व्यतीत करती। अपने पुत्र की मंगल कामना के लिए वह धरती पर सोती, कठिन व्रतों का पालन करती और अपनी भूख कंद-मूल खल खाकर शांत करती। अवसर मिलने पर नारद जी उसको भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं भगवान के दिव्य स्वरूप और उनके अनंत गुणों का उपदेश करते। नारद जी गर्भ में पल रहे शिशु को लक्ष्य करके इन सारे गूढ़ तत्वों का दिव्य उपदेश दिया करते थे। इस तरह से प्रल्हाद जी ने माँ के पेट में ही भगवान विष्णु के नाम का जप करना शुरू कर दिया था। नारद जी जानते थे की ये स्वयं भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त बनेगा।

Hiranyakashipu Ka tapasya karke vapis lotna : हिरण्यकशिपु का तपस्या करके वापिस लोटना

तपस्या पूर्ण करके हिरण्यकशिपु मन्दराचल पर्वत से नीचे उतरे और पाकिस्तान के मुल्तान में गए जो की इनकी राजधानी थी। कयाधू से इनके चार पुत्र थे और एक बेटी थी। जिनमे सबसे छोटे पुत्र थे प्रल्हाद। 5 वर्ष की अवस्था में इनकी बुद्धि भगवान में रत थी। क्योंकि गुरुदेव नारद जी से सब कुछ सिख कर आये थे। निरंतर भगवान का सुमिरन और चिंतन करते थे।

शुक्राचार्य जी असुरों के गुरु है। इनके दो पुत्र थे- शण्ड और अमर्क। इन दोनों ने प्रल्हाद की शिक्षा का भार संभाला। ये प्रल्हाद जी को गुरुकुल पर लेकर गए और राजनीती, अर्थनीति आदि का पाढ़ सिखाया। प्रल्हाद जी, गुरूजी का पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और ज्यों-का-त्यों सुना भी देते थे लेकिन इन्हे मन से अच्छा नही लगता था।

एक दिन हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र से पूछा- ‘बेटा! बताओ तो सही तुमने कौन सी बात सीखी?
प्रल्हाद जी ने कहा- पिताजी! जो गुरुदेव ने सिखाया है वो आपको बताऊ या जो मैंने खुद सीखा है वो बताऊँ।

हिरण्यकशिपु खुद तो कभी स्कूल गया नही था तो क्या पूछता? बोला की प्रल्हाद जो तूने अपने मन से सीखा है तू वो मुझे बता।
संसार में लोग ‘मैं’ और ‘मेरा’ के चक्कर में फंसे हुए है। लोग ‘श्री हरि’ की भक्ति से विमुख हो रहे है। अगर वो अपना कल्याण चाहे तो भगवान विष्णु की शरण में चले जाएं।

संसार का जितना भी सम्बन्ध है वो केवल देह तक है, आत्मा का सम्बन्ध तो केवल परमात्मा से है। मानव जीवन का परम लक्ष्य केवल परमात्मा होना चाहिए। हमे केवल उसी भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए।

हिरण्यकशिपु जी प्रल्हाद के मुख से मीठी-मीठी बाते सुनकर हंसने लगे और कहते हैं बेटा, ऐसा लगता हैं की विष्णु के पक्षपाती कुछ ब्राह्मण भेष बदलकर गुरूजी के घर पर रहते हैं। बालक की अच्छे से देख-रेख की जाएं, जिससे इसकी बुद्धि बहकने ना पाये।

अभी इसकी पढाई बाकि है?
गुरुदेव बोले की अभी तो इसे बहुत पढ़ना है। फिर से प्रल्हाद जी को गुरुकुल में लाया गया। फिर से पढाई शुरू की।

कुछ समय बाद दोबारा पढ़ कर आये और हिरण्यकशिपु ने प्रल्हाद को अपनी गोद में बिठाया और  पूछा की क्या सीखा प्रल्हाद?

प्रल्हाद जी ने कहा- हमें उस हरि का ही श्रवण, स्मरण , उसी का कीर्तन करना चाहिए। प्रल्हाद जी ने सुंदर नवधा भक्ति(navadha bhakti) का उपदेश अपने पिता को दिया।

प्रल्हाद जी ने कहा की मैंने पढाई ही नही की बल्कि भगवन विष्णु को जाना भी हैं। पिताजी! संसार के लोग तो पिसे हुए को पीस रहे हैं, चबाये हुए को चबा रहे हैं। उनकी इन्द्रियां वश में ना होने के कारण भोगे हुए को विषयों को फिर-फिर दोबारा-दोबारा भोग रहे हैं। और नरक की और जा रहे हैं। प्रल्हाद जी इतना कहकर चुप हो गए।

हिरण्यकशिपु ने प्रल्हाद को अपनी गोदी से फेंक दिया और अत्यंत क्रोध के कारण लाल लाल नेत्र हो गए । और शण्ड-अमर्क से कहते है की आपने फिर से मेरे पुत्र को मेरे बेरि का नाम लेना सीखा दिया।

शण्ड-अमर्क बोले की हमने आपके पुत्र को ऐसी कोई भी शिक्षा नही दी है।

प्रल्हाद ने देखा की मेरे पिता मेरे गुरुदेव का अपमान कर रहे है। ये बात प्रल्हाद जी को अच्छी नही लगी।

प्रल्हाद जी ने कहा-पिताजी! जो लोग परमात्मा का नाम लेते है। परमात्मा का नाम गाते है। उस पर भगवान की कृपा है। जिस पर भगवान की कृपा होगी वो ही उनका नाम लेगा। ये नाम सिखाने से नही आएगा।

अब हिरण्यकशिपु को क्रोध आ गया। उसने अपने सैनिको से

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