Pandavas rishi Durvasa Story in hindi

Pandavas rishi Durvasa Story in hindi

पांडव और ऋषि दुर्वासा की कहानी

 

जिस समय पांडव वनवास में थे और अर्जुन भगवान शिव की तपस्या करने के लिए गए हुए थे तब दुर्वासा मुनि अपने दस हज़ार शिष्यों के साथ दुर्योधन के यहाँ पहुंचे। यहाँ पर शकुनि और दुर्योधन ने अपने आतिथ्य से उन्हें खूब प्रसन्न किया। इसके बाद दुर्योधन कहता है कि पांडव अभी वन में हैं। आप उनके पास जाइये। वो भी आपका दर्शन करना चाहते हैं। आप अपने शिष्यों के साथ वनवासी युधिष्ठिर का आतिथ्य ग्रहण करें। दुर्योधन ने उन्हें जान बुझ कर उस समय भेजा जब द्रौपदी अपना भोजन पूरा कर चुकी हो।

क्योंकि पांडवों के पास एक ऐसा पात्र(बटलोई ) था कि जिसमे भोजन कर लेने के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता था। दुर्योधन ने सोचा कि अगर दुर्वासा ऋषि को भोजन नहीं मिला तो दुर्वासा उन्हें शाप दे देंगे।

अब दुर्वासा जी युधिष्ठिर जी के पास अपने शिष्यों के साथ पहुंचे। युधिष्ठिर ने कहा कि भगवन! आप हमारी कुटिया की शोभा को बढ़ाइए। तभी दुर्वासा जी थोड़े से क्रोधित होकर कहते हैं की ऋषि कोई शोभा बढ़ने की वस्तु नहीं होते।

 

युधिष्ठिर जी ने तुरंत क्षमा मांगी और कहा- आप हमें सेवा का अवसर दीजिये। ऋषि ने भीम व युधिष्ठिर आदि को भोजन बनाने का आदेश दिया। दुर्वासा जी कहते हैं कि आप भोजन तैयार कीजिये इतने हम स्नान करके आते हैं।

 

दुर्वासा जी स्नान करने चले गए लेकिन यहाँ पर पांडव द्रौपदी सहित चिंता में पड़ गए। क्योंकि सब भोजन कर चुके थे। और द्रौपदी के अंत में भोजन करने के बाद पात्र में कुछ भी शेष नहीं बचा था। सब सोचने लगे कि –

Durvasa Muni and cooking pot of Draupadi hindi story : दुर्वासा मुनि और द्रौपदी के भोजन बनाने की कथा

 

अगर ऋषि को शिष्यों सहित भोजन नहीं करवाया तो आज हमें श्राप मिलना निश्चित है। क्योंकि ये ऋषि अत्यंत क्रोधी स्वभाव के हैं। द्रौपदी को और कोई उपाय नहीं सूझा। तब उसने मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण को याद करते हुए कहा – “जिस तरह से आपने दयुत सभा में मेरी लाज जाने से बचाई थी उसी तरह से भक्तवत्सल आज फिर हमें इस धर्म संकट से निकालो।

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भगवान तो भक्त के हृदय की बात सुनते हैं। वहां पर तुरंत श्रीकृष्ण आ पहुंचे।
भगवान श्री कृष्ण को देखकर सभी के शरीर में जान आ गई। श्री कृष्ण ने कहा कि क्या हुआ- तुम सब उदास क्यों हो? मुझे बड़ी जोर से भूख लगी है बातें बाद में करेंगे। पहले मुझे जल्दीं से कुछ खाने को दो। मुझे बड़ी भूख लगी है।

द्रौपदी कहती हैं – प्रभु! मैं अभी-अभी खाकर उठी हूं। अब तो उस बर्तन में कुछ भी नहीं बचा है।”

श्रीकृष्ण ने कहा- “अपना बर्तन मुझे दिखाओ।” ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने वो पात्र हाथ में लिया तो देखा कि उसमे एक चावल का दाना बचा हुआ था।
उन्होंने उसी को मुंह में डालकर कहा- “इस एक चावल के दाने से सबका पेट भर जाये। ऐसा कहते ही पुरे विश्व का पेट उस समय भर गया।

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इधर दुर्वासा मुनि अपने शिष्यों के साथ स्नान करके हटे और उनको डकार आने लगी। उनका पेट भर गया और उन सबकी तृप्ति हो गई। अब ऋषि दुर्वासा ने सभी शिष्यों से कहा कि हम सबका पेट भर चूका है अब हमें यहाँ से चलना चाहिए। ऐसा कहकर दुर्वासा अपनी शिष्य मण्डली के साथ वहां से चले गए।
जब सहदेव ने गंगातट पर जाकर देखा तो वहाँ उन्हें कोई नहीं मिला।

 

बस, सब लोग वहाँ से चुपचाप भाग निकले। सहदेव को पता चला कि ऋषिगण समूह यहाँ से चला गया है। और सहदेव ने ये बात अपने भाई युधिष्ठिर व द्रौपदी सबको बताई। इस तरह से आज भगवान श्री कृष्ण ने एक बार फिर पांडवों सहित द्रौपदी को श्राप से बचा लिया।
पांडवों से मिलने के बाद अब भगवान श्री कृष्ण द्वारिका चले गए।

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