Mahabharat(Kurukshetra) Yudh ki Taiyari aur Niyam

Mahabharat(Kurukshetra) Yudh ki Taiyari aur Niyam

महाभारत(कुरुक्षेत्र) युद्ध की तैयारी और नियम  

Mahabharata(Kurukshetra) war preparation and rules in hindi 

 

महाभारत का युद्ध होना अब निश्चित हो गया था। क्योंकि कृष्ण शांति दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे। लेकिन दुर्योधन ने भगवान के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। भगवान कृष्ण वापिस उप्पलव्यनगर आ गए।

 

इधर जब विदुर जी को पता चला तो उन्होंने महामंत्री का पद त्यागने का निश्चय किया। विदुर जी किसी भी ओर से युद्ध नहीं करना चाहते थे। वे युद्ध के सख्त खिलाफ थे। लेकिन उनकी बात को किसी ने नहीं सुना। इसलिए विदुर जी धृतराष्ट्र के पास गए और अपने पद को त्याग दिया। विदुर जी अब यहाँ से चले गए।

Mahabharata Yudh ki taiyari : महाभारत युद्ध की तैयारी

 

युद्ध में जाने से पहले दुर्योधन कुंती जी के पास गए और विजयश्री का आशीर्वाद माँगा। लेकिन कुंती जी कहती है पहले ये आशीर्वाद तुम अपनी माँ गांधारी से लेकर आओ। दुर्योधन गांधारी के पास जाते हैं लेकिन गांधारी भी उन्हें ये आशीर्वाद देने से मना कर देती है।  क्योंकि सब जानते हैं कि दुर्योधन अधर्म के रास्ते जा रहा है और उनके सामने भगवान है।  इसलिए दुर्योधन की हार और मृत्यु दोनों ही युद्ध में निश्चित है।

 

 

दुर्योधन बिना आशीर्वाद ही यहाँ से कुरुक्षेत्र की ओर अपनी सेना के साथ चल दिया।  महाभारत युद्ध में परम पवित्र कुरुक्षेत्र की भूमि को चुना गया। क्योंकि ये वीरों की भूमि है। यहाँ पर वीरगति को प्राप्त सभी की सद्गति होगी।

 

दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दु:शासन काफी खुश थे क्योंकि वे सोच रहे थे कि युद्ध में कौरवों की जीत पक्की है। दुर्योधन ने कर्ण को प्रधान सेनापति बनाने के लिए कहा। लेकिन भीष्म पितामह ने मना कर दिया। भीष्म पितामह कहते हैं- मैं कर्ण के नेतृत्व में युद्ध नहीं लडूंगा। हाँ मैं प्रतिदिन पांडवों के 10 हजार सैनिकों का वध जरूर करूँगा। भीष्म कहते हैं- लेकिन मैं पांडवों का वध नहीं करूँगा। भीष्म ने ये भी कह दिया जब तक वो प्रधान सेनापति रहकर युद्ध करेंगे तब तक कर्ण युद्ध में हिस्सा नहीं लेंगे।

 

इस पर दुर्योधन आक्रोश दिखाने लगते हैं लेकिन शकुनि उन्हें रोक लेते हैं। शकुनि भीष्म के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं।

Sanjay gets divya drishti by Ved Vyas : संजय का वेद व्यास द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त करना

इसी बीच धृतराष्ट्र के पास वेदव्यास जी आते हैं। वेदव्यास जी कहते हैं- तुमने ये क्या कर दिया। अब सर्वनाश के लिए तैयार हो जाओ। मैं तुम्हे दिव्य दृष्टि दे देता हूँ। जिससे तुम क्योंकि महाभारत का युद्ध यहीं से देख पाओगे। कौन क्या कर रहा है।

 

धृतराष्ट्र कहते हैं- भगवन! अब मैं दिव्यदृष्टि लेकर क्या करूँगा। मैंने आज तक कुछ भी नहीं देखा तो आगे भी देखने की इच्छा नहीं है। आप मेरी जगह  संजय को दिव्यदृष्टि दे दीजिये।

 

वेदव्यास जी दिव्य दृष्टि संजय को देकर वहां से चले जाते हैं। धृतराष्ट्र पूछते हैं- बताओ संजय मेरा पुत्र दुर्योधन क्या कर रहा है?

 

संजय बताता है कि-  दुर्योधन, शकुनि, कर्ण दु:शासन  और  उलूक बैठे हुए हैं । इन सबकी आज्ञा से शकुनि के पुत्र उलूक शांति दूत बनकर पांडवों के पास गए हैं। यहाँ पर उलूक ने काफी अपमान भरे शब्द दुर्योधन की ओर से कहे। तब कृष्ण ने कहा- उलूक तुम यहाँ से अब जाओ। तुम्हारे दुर्योधन के सन्देश को हमने सुन लिया है। दुर्योधन से जाकर कहना- तुम वीरों के भांति जीना तो नहीं सीखे लेकिन मरना तो सीख लो।

 

 

इधर पांडव और श्री कृष्ण आदि सभी युद्ध की नीति बनाने की सोचते हैं। सब विचार करते हैं अपनी सेना में ऐसा कौन वीर सेनापति होगा जो भीष्म पितामह को टक्कर दे पायेगा। कोई ध्रुपद जी का नाम लेता है, कोई किसी का नाम लेता है। तब अर्जुन कहते है- इसका निर्णय खुद श्री कृष्ण को करने दीजिये। भगवान श्री कृष्ण धृष्टद्युम्न को पांडवों का सेना पति नियुक्त करते हैं। सभी इस फैसले से सहमत हो जाते हैं।

 

जब युद्ध का पक्का हो गया तब घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक भी युद्ध के लिए आये। जिन्होंने खुद अपने हाथ से अपना सिर काटकर दान दिया। जो शीश के दानी कहलाये। और आज के समय खाटू श्याम के नाम से जाने जाते है। नीचे लिंक पर क्लिक करके आप ये पूरी कथा पढ़ सकते हैं।

Read : बर्बरीक के शीश दान और खाटू श्याम बनने की कथा

Mahabharata shalya story in hindi : महाभारत में शल्य की कहानी/कथा

कुरुक्षेत्र में जगह जगह कौरवों की ओर से शिविर लगाए गए थे। उसी समय शल्य भी पांडवों की ओर से युद्ध में  शामिल होने के लिए आ रहे थे। शल्य, माद्रा (मद्रदेश) के राजा जो पाण्डु के सगे साले और नकुल व सहदेव के मामा थे और माद्री के भाई हैं।

 

शल्य अपनी विशाल सेना के साथ पांडवों की ओर जा रहा था। मार्ग में दुर्योधन ने उन सबका अतिथि-सत्कार कर उन्हें प्रसन्न किया। शल्य ने सोचा ये सत्कार महाराज युधिष्ठिर की ओर से किया जा रहा है।  लेकिन जब उन्हें पता चला कि ये सारा छल तो दुर्योधन की ओर से रचा जा रहा है। तब वे कौरवों की ओर से युद्ध करने के लिए विवश हो गए।  इस प्रकार शल्य ने कर्ण का सारथि बनना स्वीकार कर लिया।

 

 

भगवान श्री कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने दुर्गा माँ की तपस्या करके युद्ध में जीत का आशीर्वाद भी प्राप्त किया।

 

 

 Mahabharat Yudh(War) ke Niyam :  महाभारत युद्ध के नियम

महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले कुरुक्षेत्र में भीष्म पितामह द्वारा कुछ नियम बनाये गए थे। जिस समय ये नियम बनाये थे वहीँ पर सभी पांडव, पांडवों के सेनापति धृष्टद्युम्न, शिखंडी, भगवान श्री कृष्ण और सभी कौरव मौजूद थे। शिखंडी ने भीष्म पितामह से शिविर में बैठने की आज्ञा मांगी। तब भीष्म ने कहा- ये युद्ध पुरुषों का है, यहाँ पर पुरुष ही युद्ध करेंगे लेकिन मैं तुम्हे बैठने से मना तो नहीं कर सकता। ऐसा कहकर शिखंडी व सभी पांडव बैठ गए।

 

भीष्म पितामह ने जो नियम बनाये उसके अनुसार कहते हैं –

 

 युद्ध धर्म के अनुसार ही लड़ा जायेगा।

 

एक वीर का युद्ध एक ही वीर से होगा।

 

युद्ध सुबह शुरू होगा और शाम को समाप्त हो जायेगाव

 

पैदल का पैदल से, हाथी सवार का हाथी से, घुड़सवार का घुड़सवार से,  रथी का रथी से, अति रथी का अति रथी से, महारथी का महारथी से  ही युद्ध होगा।

 

 

भय से भागते हुए या शरण में आए हुए लोगों पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं किया जाएगा।

 

निहत्थे पर किसी भी प्रकार का वार नहीं किया जायेगा।

 

 

दिन का युद्ध समाप्त होने पर सभी आपस में प्रेम से मिल सकते हैं।

 

 

युद्ध में सेवक का काम करने वालों पर कोई अस्त्र नहीं उठायेगा।

 

इस प्रकार युद्ध के नियम बनाकर अगले दिन युद्ध लड़ने के लिए सभी तैयार हो गए। आगे पढ़ें..

 

 

 

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