Mahabharat Story : Yudhisthira ka Yuvraj banna

Mahabharat Story : Yudhisthira ka Yuvraj banna  

महाभारत कहानी : युधिष्ठिर का युवराज बनना 

 

पांडवों ने गुरु द्रोणाचार्य जी को गुरु दक्षिणा प्रदान की। इसके एक वर्ष बीत जाने के बाद एक वर्ष बीतने पर धृतराष्ट्र ने पाण्‍डुपुत्र युधिष्ठिर को उनके सद्गुणों के कारण युवराज बनाया। थोड़े ही दिनों में युधिष्ठिर ने अपने शील , उत्तम स्‍वभाव के द्वारा पूरी प्रजा का दिल जीत लिया।
दूसरी ओर भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा पूरी को जरासंध के आतंक से बचाकर द्वारिका नगरी बसाई। इसके लिए उन्होंने विश्वकर्मा जी को नियुक्त किया। और इन्होंने सुंदर द्वारिका का निर्माण किया है। फिर रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के साथ तय हुआ था। लेकिन रुक्मिणी चाहती थी कि इनका विवाह श्री कृष्ण के साथ हो। इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने रुक्मणी का हरण किया। नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके आप रुक्मिणी और कृष्ण विवाह की पूरी कहानी पढ़ सकते हैं।

http://www.hindi-web.com/god/krishna/krishna-rukmani-vivah-story-hindi/

 

फिर भीम बलरामजी से गदायुद्ध तथा रथयुद्ध की शिक्षा लेने लगे। अर्जुन भी अपने लक्ष्य को साधने और सभी बाण चलाने में निपुण हो गए। इसलिये द्रोणाचार्य को यह दृढ़ विश्‍वास हो गया था कि फुर्ती और सफाई में अर्जुन के समान दूसरा कोई योद्धा इस जगत् में नहीं है। एक दिन द्रोण ने कौरवों की भरी सभा में निद्रा को जीतने वाले अर्जुन से कहा- मेरे गुरु अग्नि वेश नाम से विख्‍यात हैं।उन्‍होंने पूर्व काल में म‍हर्षि अगत्‍स्‍य से धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की थी। मैं उन्‍हीं महात्‍मा अग्निवेश का शिष्‍य हूं। एक पात्र (गुरु) से दूसरे (सुयोग्‍य शिष्‍य) को इसकी प्राप्ति कराने के उद्देश्‍य से सर्वथा उद्यत होकर मैंने तुम्‍हें यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र प्रदान किया, जो मुझे तपस्‍या के मिला था। वह अमोघ अस्त्र वज्र के सामन प्रकाशमान है। उसमें समूची पृथ्‍वी को भस्‍म कर डालने की शक्ति है। मुझे वह अस्त्र देते समय गुरु अग्निवेशजी ने कहा था कि तुम यह अस्त्र मनुष्‍यों पर न चलाना। मनुष्‍येतर प्राणियों में भी जो अल्‍पवीर्य हों, उन पर भी इस अस्त्र को न छोड़ना।’

 

 

अर्जुन! इस दिव्‍य अस्त्र को तुमने मुझसे पा लिया है। दूसरा कोई इसे नहीं प्राप्त कर सकता। इस अस्त्र के सम्‍बन्‍ध में मुनि के बताये हुए इस नियम का तुम्‍हें भी पालन करना चाहिये। अब तुम अपने भाई-बन्‍धुओं के सामने ही मुझे एक गुरु-दक्षिणा दो’। तब अर्जुन ने प्रतिज्ञा की- ‘अवश्‍य दूंगा।’ उनके यों कहने पर गुरु द्रोण बोले- ‘अर्जुन! यदि युद्ध-भूमि में मैं भी तुम्‍हारे विरुद्ध लड़ने को जाऊं तो तुम (अवश्‍य) मेरा सामना करना’। यह सुनकर  अर्जुन ने ‘बहुत अच्‍छा’ कहते हुए उनकी इस आज्ञा का पालन करने की प्रतिज्ञा की और गुरु के दोनों चरण पकड़कर उन्‍होंने सर्वोत्तम उपदेश प्राप्त कर लिया।

 

 

पाँचों पांडव(युधिष्ठिर) की कीर्ति के पुरे नगर में फेल रही थी। इनके राज्य में प्रजा काफी खुश थी। जिस कारण दुर्योधन, शकुनि और धृतराष्ट्र काफी परेशान थे। और इन्होंने लाक्षागृह में सभी पांडवों को जीवित जलने के प्रयास किया।

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