Mahabharat Khandava Van dahan story(Katha) in hindi

Mahabharat Khandava Van dahan story(Katha) in hindi

महाभारत खांडव वन दहन की कहानी(कथा)

पांडवों के द्रौपदी से पांच पुत्र हुए। सभी इंद्रप्रस्थ में ख़ुशी से रह रहे थे। महाराज युधिष्ठिर के राज में प्रजा समेत सभी लोग खुश थे। एक बार एक ब्राह्मण कृष्ण और अर्जुन के पास आये। उसने कहा- मैं अधिक भोजन करने वाला एक ब्राह्मण हूँ। तुम मेरी भूख शान्त करने की व्यवस्था करो। आप लोग एक बार पूर्ण भोजन कराकर मुझे तृप्ति प्रदान कीजिये’।

श्रीकृष्ण और अर्जुन बोले – ‘ब्रह्मन्! बताइये, आप किस अन्न से तृप्त होंगे?

वह ब्राह्मण कहते हैं- मेरी भूख साधारण भूख नहीं है। मैं अग्नि देव हूँ तथा इस खाण्डव वन को जलाकर अपनी क्षुधा(भूख) शान्त करना चाहता हूँ।

लेकिन इन्द्र देव मुझे ऐसा करने नहीं देते, उनका एक मित्र है तक्षक नाग। ये खाण्डव वन में निवास करता है। तक्षक नाग की रक्षा करने के लिये इंद्र वर्षा करके मेरे तेज को शान्त कर देते हैं जिस कारण मेरी भूख शांत नही होती। इसलिए जब मैं खाण्डव वन को जलाने लगूँ, उस समय तुम इन्द्र को मेघ वर्षा करने से रोके रखो।”

अर्जुन बोले- “हे अग्निदेव! मैं तथा मेरे मित्र कृष्ण इन्द्रदेव से युद्ध करने में समर्थ हैं लेकिन हमारे पास अलौकिक अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं। अगर आप हमें अलौकिक अस्त्र-शस्त्र प्रदान दें तो हम आपकी इच्छा पूरी कर सकते हैं।”

अग्निदेव ने तुरंत वरुणदेव को बुलाकर आदेश दिया- “वरुणदेव! आप राजा सोम द्वारा प्रदत्त गाण्डीव धनुष, अक्षय तूणीर, चक्र तथा वानर की ध्वजा वाला रथ अर्जुन को प्रदान करें।”

वरुणदेव ने अग्निदेव के आदेश का पालन किया और अग्निदेव अपनी प्रचण्ड ज्वाला से खाण्डव वन को भस्म करने लगे। खाण्डव वन से आग की उठती लपटों से सारा आकाश भर उठा और देवतागण भी परेशान होने लगे।

अब अग्नि को रोके ने लिए देवराज इन्द्र ने अपनी मूसलाधार वर्षा करना शुरू कर दिया, लेकिन श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपने अस्त्रों से उन मेघों को तत्काल सुखा दिया। इन्द्र क्रोधित हुआ और अपने क्रोध में अर्जुन तथा श्रीकृष्ण से युद्ध करने आ गये, लेकिन उन्हें हार का मुह देखना पड़ा।

तभी इन्द्र के प्रति एक आकाशवाणी हुई- ‘तुम्हारा मित्र तक्षक नाग कुरुक्षेत्र गया हुआ है, अतः खांडव वन दाह से बच गया है। “अर्जुन तथा कृष्ण” “नर नारायण” हैं अतः उनसे कोई देवता जीत नहीं पायेगा।’ यह सुनकर इन्द्र भी अपने लोक की ओर बढे।

खाण्डव वन में मय दानव, जो कि विश्वकर्मा का शिल्पी था, का निवास था। अग्नि से सन्तप्त होकर मय दानव भागता हुआ अर्जुन के पास आया और अपने प्राणों की रक्षा के लिये प्रार्थना करने लगा। अर्जुन ने मय दानव को अभयदान दे दिया। खाण्डव वन दहन पन्द्रह दिनों तक जलता रहा। इस अग्निकाण्ड से वहाँ के केवल छः प्राणी ही बच पाये, वे थे- मय दानव, अश्वसेन तथा चार सारंग पक्षी।

खाण्डव वन के पूर्णरूप से जल जाने के बाद अग्निदेव दोबारा ब्राह्मण के वेश में श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास आये तथा उनके पराक्रम से प्रसन्न होकर वर माँगने के लिये कहा। कृष्ण ने अपनी तथा अर्जुन की अक्षुण मित्रता का वर माँगा, जिसे अग्निदेव ने सहर्ष प्रदान कर दिया। अर्जुन ने अपने लिये समस्त प्रकार के दिव्य एवं अलौकिक अस्त्र-शस्त्र माँगे। अर्जुन की इस माँग को सुनकर अग्निदेव ने कहा- “हे अर्जुन! तुम्हें समस्त प्रकार के दिव्य एवं अलौकिक अस्त्र-शस्त्र केवल भगवान शंकर की कृपा से ही प्राप्त हो सकते हैं, मैं तुम्हें यह वर देने में असमर्थ हूँ। किन्तु मैं तुम्हें सर्वत्र विजयी होने का वर देता हूँ।” ऐसा कहकर अग्निदेव अन्तर्ध्यान हो गये।

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