Mahabharat Karna Vadh(Death) Story/Katha in hindi

Mahabharat Karna Vadh(Death) Story/Katha in hindi

महाभारत कर्ण वध(मृत्यु) की कहानी/कथा

महाभारत में कर्ण वध का दृश्य बड़ा ही मार्मिक रहा है। भीष्म पितामह सर शैया पर हैं। गुरु द्रोणाचार्य का वध हो चुका है। कर्ण को कौरव सेना का प्रधान सेनापति बनाया गया है। अगले दिन के युद्ध में दुशासन का भी वध भीम ने कर दिया है। कर्ण और अर्जुन के मध्य युद्ध होता है लेकिन सूर्यास्त हो जाता है। सूर्यास्त होने के बाद शकुनि और दुर्योधन दोनों कर्ण से शिकायत करते हैं कि आज तुम्हारे पास अर्जुन का वध करने का मौका था। लेकिन तुमने वध नहीं किया।

कर्ण कहता है कि मैं अर्जुन का वध कर सकता था पर सूर्यास्त हो गया था और सूर्यास्त के बाद युद्ध करना युद्ध नियम के विरुद्ध है।
तब दुर्योधन और शकुनि कहते हैं आज से पहले भी तो सूर्यास्त हुआ था और तब भी नियम टूटे थे लेकिन तब तुमने कुछ नहीं कहा।
कर्ण कहता है कि उस समय मैं कौरव सेना का सेनानायक नहीं था। पर आज मेरी ज़िम्मेदारी बन जाती है। फिर कर्ण कहते हैं दुर्योधन मित्र, तुम चिंता ना करो। कल अर्जुन को मेरा सामना करने से कोई रोक नहीं पायेगा।

रात में कुंती भी आई है आशीर्वाद देने के लिए। कर्ण ने कहा अब इस आशीर्वाद का कोई महत्व नहीं रह जाता है। कल या तो मैं नहीं रहूँगा या अर्जुन। अब तुम्हारे पाँच बेटे ही रहेंगे। मैं अर्जुन को छोड़कर किसी का भी वध नहीं करूँगा।
फिर अब कर्ण जब सोने लगे हैं तो इनको नींद नहीं आती है। क्योंकि इन्हें वो श्राप याद आ रहे हैं जो ब्राह्मण द्वारा और परशुराम द्वारा दिए गए हैं।

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अगले दिन का युद्ध शुरू हुआ। कर्ण… नकुल, सहदेव, भीम, युधिष्ठिर सभी को युद्ध में पराजित कर देता है। लेकिन अपने वचन के अनुसार किसी का भी वध नहीं करता है। अंत में अर्जुन से सामना होता है। अर्जुन और कर्ण के बीच घमासान युद्ध होता है। कर्ण आज अर्जुन पर हावी पड़ रहे हैं। कर्ण बार बार अर्जुन के धनुष की प्रत्यंचा तोड़ देते हैं लेकिन अर्जुन भी कर्ण के दोबारा तीर चलाने से पहले प्रत्यंचा को चढ़ा लेते हैं। जब कर्ण अर्जुन पर तीर चलता है तो कृष्ण उसकी वाह वाही करते हैं जिसे देखकर अर्जुन थोड़ा सा सोच में पड़ जाता है।

 

अब कृष्ण परिस्थिति को भांप लेते हैं। जब युद्ध करते करते काफी देर हो गई तो कृष्ण अर्जुन को कहते हैं अर्जुन अपना दिव्यास्त्र चलाओ। अर्जुन अपना दिव्यास्त्र चलाने लगता है। तभी कर्ण के रथ का पहिया रण भूमि के गड्ढ़े में धंस जाता है। जो ब्राह्मण के श्राप का परिणाम था। इसके बाद कर्ण भी ब्रह्मास्त्र चलाने के लिए एक मंत्र बोलता है जिससे ब्रह्मास्त्र प्रकट हो जाये। लेकिन गुरु परशुराम के श्राप के कारण वो दिव्यास्त्र प्रकट नहीं कर पाता है। कर्ण अब अर्जुन को कहता है कि वो अपने रथ का पहिया निकालने जा रहा है। तुम थोड़ा धैर्य रखो।
अर्जुन कर्ण की बात मानकर एकदम चुपचाप खड़ा हो जाता है। तभी कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अर्जुन ये सही समय है तुम कर्ण पर बाण चलाओ।

अर्जुन कहते हैं कि केशव ये धर्म के विरुद्ध है।

 

तब कृष्ण कहते हैं जब द्रौपदी को भरी सभा में बेइज्जत किया जा रहा था तब ये उनका विरोध करने की जगह उनके साथ में था। तब इसका धर्म कहाँ था?

जब एक अभिमन्यु निहत्थे पर वार किया जा रहा था, तब धर्म कहाँ था? तुम ये सब ना सोचो और इसका वध करदो। कृष्ण के ऐसा कहते है अर्जुन ने अपने धनुष से तीर चलाया और कर्ण का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस तरह कर्ण आज वीरगति को प्राप्त हो गया।

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