Mahabharat : Jarasandh Story in hindi

Mahabharat : Jarasandh Story in hindi 

महाभारत : जरासंध की कहानी

युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ पर बड़े अच्छे से शासन कर रहे थे। उनके मन में राजसूय यज्ञ करने की इच्छा हुई। राजा युधिष्ठिर ने उस समय अपने मन्त्रियो और भाइयों को बुलाकर उन से बार-बार पूछा – ‘राजसूय यज्ञ के सम्बन्ध में आप लोगों की क्या सम्मति है ?’

सभी ने सहमति जताई कि आप राजसूय यज्ञ कीजिये। भगवान श्री कृष्ण ने कहा- बिना जरासंध के मरे राजसूय यज्ञ पूरा नहीं हो सकता। उस ने सब राजाओं को जीतकर गिरिव्रज में कैद कर रखा है। उन राजाओं को कैद से छुड़वाना होगा और जरासंध का वध करना होगा तभी राजसूय यज्ञ पूरा हो सकता है।

युधिष्ठिर,भीम अर्जुन आदि जरासंध के बारे में जानना चाहा।

भगवान श्री कृष्ण ने फिर जरासंध के बारे में बताया।

Jarasandh Birth Story/Katha in hindi : जरासंध के जन्म की कहानी/कथा

जरासंध मगध नरेश है। जरासंध के पिता का नाम बृहद्रथ(Brihadratha) था। इनके 2 रानियां थी लेकिन कोई भी संतान नहीं थी। बहुत समय व्यतीत हो गया और वे बूढ़े़ हो चले थे। एक बार उन्होंने सुना कि उनके राज्य में ऋषि चंडकौशिक आये हुए हैं और वे एक आम के वृक्ष के नीचे विराजमान हैं। राजा को एक उम्मीद की किरण दिखाई दी और ऋषि से मिलने चल दिए। ऋषि के पास पहुँच कर उन्होंने बताया की उनके कोई संतान नहीं है। ऋषि को राजा की बात सुनकर दया आ गई। उन्होंने राजा को एक आम का फल दिया और कहा- इसे अपनी रानी को खिला देना।
 
राजा वो फल लेकर अपने महल आ गया। राजा के दो पत्नियां थी और राजा दोनों से बराबर प्रेम करते थे इसलिए राजा ने फल को काटकर दोनों को आधा आधा खिला दिया। कुछ समय बाद दोनों रानियों को आधे आधे पुत्र हुए। आधा हिस्सा एक पत्नी के गर्भ से आधा दूसरी से। दोनों रानियां डर गई। डर के कारण उन्होंने अपने आधे आधे पुत्र को एक जंगल में फिंकवा दिया।
 
उस जंगल में वहाँ से एक जरा नामक राक्षसी जा रही थी। उसने माँस के उन दोनों लोथड़ों को देखा और उसने दायां लोथड़ा दाएं हाथ में और बायां लोथड़ा बाएं हाथ में लिया। जैसे ही वह दोनों लोथड़ो को पास में लाइ तो कमाल हो गया, वह दोनो टुकडे जुड़ गए। जुड़ते ही उस बालक ने बहुत ज़ोर की गर्जना की जिससे डरकर वह जरा राक्षसी भाग गई और राजभवन में दोनों रानियों की छाती से दुध उतर आया। इसीलिए उसका नाम जरासंध हुआ। इस प्रकार जरासंध का जन्म हुआ।
 
जरासंध की 2 बेटी थी अस्ति और प्राप्ति। इन दोनों का विवाह इसने मथुरा के राजा कंस से किया था। लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने कंस का वध कर दिया। जिससे उसकी बेटी विधवा हो गई। जरासंध काफी क्रोधित हुआ। उसने 17 बार मथुरा पर आक्रमण किया। लेकिन प्रत्येक बार हार का सामना करना पड़ा। अंत में इसने ब्राह्मणो को अपनी सेना में शामिल कर लिया। भगवान कृष्ण निर्दोष ब्राह्मणों का वध नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मथुरा पूरी को छोड़ दिया। जिस कारण भगवान श्री कृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा। अब युथिष्ठिर राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं तो भगवान कृष्ण, अर्जुन व भीम जरासंध को मारने की तरकीब खोज रहे हैं।
 
नीचे दिए ब्लू लिंक में जरासंध के वध की कहानी है। आप उस पर क्लिक करके जरासंध के वध की पूरी कथा पढ़ सकते हैं।

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