Mahabharat Bakasur Vadh Story in hindi

Mahabharat Bakasur Vadh Story in hindi 

महाभारत बकासुर वध की कहानी/कथा  

 

 

घटोत्कच के जन्म के बाद सभी पांडव व माता कुंती आगे बढे हैं। उन सबने अपने सिर पर जटाएं रख ली थी। वल्‍कल और मृगचर्म से अपने शरीर को ढंक लिया था और तपस्‍वी का वेष धारण कर लिया था। । पाण्‍डव लोग सब शास्‍त्रों के ज्ञाता थे और प्रतिदिन उपनिषद, वेद-वेदांग तथा नीतिशास्‍त्र का स्‍वाध्‍याय किया करते थे। एक दिन जब वे स्‍वाध्‍याय में लगे थे, उन्‍हें पितामह व्‍यासजी का दर्शन हुआ। पाण्‍डवों ने श्रीकृष्‍णद्वैपायन व्यास जी को प्रणाम किया और अपनी माता के साथ वे सब लोग उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

 
वेदव्यास जी कहते हैं तुम्‍हारा परम हित करने के लिये मैं यहां आया हूं। ये जो कुछ भी हो रहा है तुम्हारी आगे आने वाले सुख के लिए हो रहा है। यहां पास ही जो यह रमणीय नगर हैं, इसमें रोग-व्‍याधि का भय नहीं है। अत: तुम सब लोग यहीं छिपकर रहो।

 

भगवान् व्‍यास उन सबके साथ एकचक्रा नगरी के निकट गये। व्यास जी कुन्‍ती को कहते हैं कि महात्‍मा धर्मराज युधिष्ठिर सदा धर्मपरायण हैं; अत: ये धर्म से ही सारी पृथ्‍वी को जीतकर भूमण्‍डल के सम्‍पूर्ण राजाओं पर शासन करेंगे। तुम किसी भी तरह कि चिंता ना करो। पाण्‍डव इस पृथ्‍वी को जीतकर प्रचुर दक्षिणा से सम्‍पन्‍न राजसूय तथा अश्‍वमेघ आदि यज्ञों द्वारा भगवान् का यजन करेंगे। ऐसा कहकर महर्षि द्वैपायन ने इन सबको एक ब्राह्मण के घर में ठहरा दिया और पाण्‍डव श्रेष्‍ठ युधिष्ठिर से कहा- ‘तुम लोग यहां एक मास तक मेरी प्रतीक्षा करो। मैं पुन: आउंगा। ऐसा कहकर व्यास जी वहां से चले गए।

 
सभी पांडव माता कुंती के साथ एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर अतिथि बनकर रहने लगे। इन ब्राह्मण के एक पत्नी, एक पुत्र व एक पुत्री थी। सभी पांडव वहां पर भिक्षा मांगकर लाते और भिक्षा में जो कुछ मिलता सब मिल बांटकर कहते थे। सबका गुजारा इसी तरह होता था।
एक दिन की बात है ब्राह्मण बड़ी चिंता में अपने घर को आया। और अपनी पत्नी से कुछ वार्तालाप करने लगा। वार्तालाप करने के बाद उसकी पत्नी जोर जोर से रोने लगी।

उनके रोने की आवाज सुनकर माता कुंती वहां पर आ गई। और उन्होंने रोने के कारण पूछा। उस ब्राह्मण ने बताया की हमारे गाँव से दो कोस की दूरी पर यमुना किनारे जंगल में एक नरभक्षी राक्षस रहता है। उसका नाम बक है। वो बकासुर राक्षस बड़ा ही ताकतवर है।
राक्षसोचित्‍त बल से सम्‍पन्‍न वह शक्तिशाली असुरराज सदा इस जनपद, नगर और देश की रक्षा करता है। उसके कारण हमें शत्रुराज्‍यों तथा हिंसक प्राणियों से कभी भय नहीं होता। उसके लिये कर नियत किया गया है- बीस खारी अगहनी के चावल का भात, दो भैंसे और एक मनुष्‍य, जो वह सब सामान लेकर उस के पास जाता है। प्रत्‍येक गृहस्‍थ अपनी बारी आने पर उसे भोजन देता है। यद्यपि यह बारी बहुत वर्षों के बाद आती है, तथापि लोगों के लिये उसकी पूर्ति बहुत कठिन होती है।जो कोर्इ पुरुष कभी उससे छूटने का प्रयत्‍न करते हैं, वह राक्षस उन्‍हें पुत्र और स्‍त्री सहित मारकर खा जाता है।
यहां का राजा न्‍याय के मार्ग पर नहीं चलता। वह कोई भी आईएस उपाय नहीं करता, जिससे सदा के लिये प्रजा का संकट दूर हो जाय।

लेकिन आज हमारी बारी आयी है। मुझे उस राक्षस को  भोजन और एक पुरुष की बलि देनी पड़ेगी। मेरे पास धन नहीं है, जिससे कहीं से किसी पुरुष को खरीद लाऊं। अपनी पत्नी व बच्चों को मैं मारने नहीं दूंगा। क्योंकि एक मानव का यही धर्म है अपनी पत्नी व बच्चो की रक्षा करें। लेकिन उस निशाचर से छूटने का कोई उपाय मुझे नहीं दिखायी देता; अत: मैं अत्‍यन्‍त दुस्‍तर दु:ख के महासागर में डूबा हुआ हूं। अब मैं राक्षस के पास जाऊंगा वह हमे खा जायेगा।

 

 

Bhim Bakasur Fight in hindi : भीम बकासुर का युद्ध/लड़ाई

कुंती ने ये बात अपने पांडव पुत्र को बताई। और निर्णय लिया गया कि अबकी बार भीम बकासुर के पास भोजन लेके जायेगा। ब्राह्मण परिवार ने काफी विरोध किया लेकिन कुंती ने कहा हम आपके यहाँ अतिथि बनकर रह रहे हैं। धर्म कहता है जिस घर में रहो उस पर कोई आपत्ति आ जाये तो सभी को मिलकर उसका निपटारा करना चाहिए।

इस प्रकार भीम उस बकासुर के पास भोजन लेकर पहुंचे हैं। बक राक्षस के वन में पहुंचकर महाबली भीमसेन उसके लिये लाये हुए अन्‍न को खुद खाते हुए राक्षस का नाम- ले लेकर उसे पुकारने लगे। भीम के इस प्रकार पुकारने से वह राक्षस अत्‍यन्‍त क्रोध में भरकर वहां आया जहाँ भीम भोजन कर रहे थे।

उसका शरीर बहुत बड़ा था। उसकी आंखे रोष से लाल हो रही थीं। आकृति बड़ी विकराल जान पड़ती थी। उसके दाढ़ी, मूंछ और सिर के बाल लाल रंग के थे। बड़ा भयानक था वह राक्षस। भीम को वह अन्‍न खाते देख राक्षस का क्रोध बहुत बढ़ गया और उसने आंखें तरेरकर कहा-‘यमलोक में जाने की इच्‍छा रखनेवाला यह कौन दुर्बुद्धि मनुष्‍य है, जो मेरी आंखों के सामने मेरे ही लिये तैयार करके लाये हुए इस अन्‍न को स्‍वयं खा रहा है ?’
भीम जोर-जोर से हंसने लगे और मुंह फेरकर खाते ही रह गये। अब नरभक्षी राक्षस भीम को मारने के लिए दौड़ा। भीम भी भोजन पूरा करके युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।

उस राक्षस ने एक वृक्ष को उखड दिया और भीम के ऊपर फेंका। भीम ने उस वृक्ष को बायें हाथ से हंसते हुए-से पकड़ लिया। तब उसने निशाचर ने बहुत-से वृक्षों को उखाड़ा और भीम पर चला दिया। भीम ने भी उस पर अनेक वृक्षों द्वारा प्रहार किया। फिर बकासुर ने अपना नाम सुनाकर भीम की ओर दौड़कर दोनों बांहों से उन्‍हें पकड़ लिया। भीम ने भी उस राक्षस को दोनों भुजाओं से कसकर छाती से लगा लिया और बलपूर्वक उसे इधर-उधर खींचने लगे। उस समय बकासुर भीम से छूटने के लिये छटपटा रहा था। खींचातानी में वह राक्षस बहुत थक गया। उस नरभक्षी राक्षस को कमजोर पड़ते देख भीमसेन उसे पृथ्‍वी पर पटककर रगड़ने और दोनों घुटनों से मारने लगे। अंत में भीम ने अपने एक घुटने से बलपूर्वक राक्षस की पीठ दबाकर दाहिने हाथ से उसकी गर्दन पकड़ ली और बायें हाथ से कमर का लंगोट पकड़कर उस राक्षस को दुहरा मोड़ दिया। उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में चीत्‍कार कर रहा था। भीम ने उस राक्षस को इतना मारा कि वो परलोक सिधार गया। इस तरह से भीम ने उस ब्राह्मण परिवार की बक नाम असुर से रक्षा की।

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