Mahabharat : Abhimanyu Death/Vadh Story in hindi

Mahabharat : Abhimanyu Death/Vadh Story in hindi

महाभारत : अभिमन्यु मृत्यु/वध की कथा 

वीर अभिमन्यु का नाम कौन नहीं जानता होगा। जिन बड़े बड़े महारथियों से इस अकेले बालक ने टक्कर ली और वीरगति को प्राप्त किया। आइये उन्ही वीर अभिमन्यु की हम कथा पढ़ते हैं।

महाभारत युद्ध के तेहरवें दिन चक्रव्यूह की रचना की गई। दसवें दिन के युद्ध के बाद भीष्म पितामह अर्जुन के बाणों से शर शैय्या पर लेट चुके थे। बाहरवें दिन के युद्ध में कौरव पक्ष युधिष्ठिर को बंधी बनाने की योजना बनाते हैं। इस योजना के अनुसार अर्जुन को युधिष्ठिर से दूर ले जाना था। दुर्योधन के कहने पर सुशर्मा अर्जुन को रणक्षेत्र से बहुत दूर ले जाता है लेकिन अर्जुन जल्दी ही उसका वध कर देता है।
अब द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को पकड़ने की बहुत कोशिश की। लेकिन सत्यजित ने युधिष्ठिर की रक्षा की। अंत द्रोणाचार्य ने अर्धचंद्र बाण से सत्यजित का सिर काट दिया। सत्यजित के मरने पर युधिष्ठिर रणक्षेत्र से लौट आए।

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रात में दुर्योधन ने गुरु द्रोण को खूब सुनाई कि आप पांडवों की ओर से पक्ष ले रहे हैं, आप उनसे प्रेम करते हैं जिस कारण से आपने युधिष्ठिर को नहीं पकड़ा। तब गुरु द्रोणाचार्य जी कहते हैं – पांडव सेना को कोई भी परास्त नहीं कर सकता है। हम कल चक्रव्यूह की रचना करेंगे। लेकिन अर्जुन को चक्रव्युह से दूर करना पडता तभी हम युधिष्ठिर को पकड़ सकते हैं क्योंकि अर्जुन चक्रव्यूह का भेदन करना जानता है।

तेहरवें दिन के युद्ध में त्रिगर्तों और संसप्तकों ने अर्जुन को ललकारा। अर्जुन युद्ध करते करते काफी दूर चले जाते हैं और तभी चक्रव्युह की रचना कर दी जाती है। चक्रव्यूह का भेदन करना केवल कृष्ण और अर्जुन जानते थे। लेकिन उस समय अर्जुन युद्ध करता करता काफी दूर चला गया था।

अभिमन्यु का चक्रव्यूह में प्रवेश : Abhimanyu chakravyuh story in hindi

चक्रव्युह की रचना कौरव पक्ष की ओर से होने जा रही थी। युधिष्ठिर काफी चिंतित थे। तभी अभिमन्यु युधिष्ठिर जी के पास आये कहते हैं ताऊ जी आप चिंता ना कीजिये। पिताश्री नहीं तो क्या हुआ, मैं इस चक्रव्यूह का भेदन करूँगा। चक्रव्यूह में प्रवेश करना तो मुझे आता है किन्तु मैं उसमें से निकलने का मार्ग नहीं जानता।

तब अभिमन्यु से पूछा कि तुमने चक्रव्यूह में अंदर जाने का रास्ता कब सीखा? और बाहर आने का रास्ता तुम्हें क्यों नहीं मालूम?
अभिमन्यु बताते हैं कि जब मैं माँ के गर्भ में था, उस समय मेरे पिता अर्जुन, मेरी माँ सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन के बारे में बताते हैं। चक्रव्यहू भेदन की बात सुनते सुनते माताश्री को नींद आ गई, जिस कारण मैं केवल अंदर जाने का रास्ता ही जान पाया, बाहर आने का रास्ता मुझे नहीं पता है।

तब युधिष्ठिर कहते हैं – तुम इसकी चिंता ना करो पुत्र, हम लोग तुम्हारे पीछे-पीछे होंगे और तुम उस व्यूह जो द्वार खोलोगे हम उसे बंद ही नहीं होने देंगे। अभिमन्यु चक्रव्यूह का भेदन करने के लिए युधिष्ठिर जी से आज्ञा मांगता है तब युधिष्ठिर भीम आदि को अभिमन्यु के साथ भेजता है, लेकिन चक्रव्यूह के द्वार पर जयद्रथ सभी को रोक देता है। केवल अभिमन्यु ही चक्रव्यूह में प्रवेश कर पाता है।

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चक्रव्यह में अंदर प्रवेश करने पर अभिमन्यु का सामना  दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण से होता है, लेकिन अभिमन्यु से मार देता है। यह बात दुर्योधन से सहन नहीं होती। दुर्योधन अभिमन्यु को जान से मारने के लिए कहता है। तभी दुर्योधन, द्रोण, अश्वत्थामा, वृहदबल, कृतवर्मा, कर्ण आदि ने अभिमन्यु को चारों ओर से घेर लिया और बुरी तरह से अभिमन्यु पर प्रहार किया। युद्ध की सभी सीमाएं तोड़ी जा चुकी थी जिसमें ये निश्चित हुआ था कि एक व्यक्ति के साथ एक व्यक्ति युद्ध करेगा और निहत्थे पर कोई प्रहार नहीं करेगा। आज अभिमन्यु इन योद्धाओं के बीच अकेला रह गया था और ये लोग अभिमन्यु पर प्रहार पर प्रहार किये जा रहे थे। सभी कौरवों ने मिलकर अभिमन्यु को घेरकर, बर्बरता से उस पर प्रहार कर करके उसे मार डाला। जिस कारण उसने वीरगति प्राप्त की।

जब अर्जुन को पता चलता है तो अर्जुन ने प्रतिज्ञा ली कि कल सूर्यास्त होने से पहले वह जयद्रथ का वध कर देगा नहीं तो अग्नि में समाधि ले लेगा।

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