Krishna Vidur story in hindi

Krishna Vidur story in hindi 

Bhagwan shri krishan ne Vidur or Vidurani per kripa ki thi. jo riste me bhagwaan ne kaka-kaki lagte hai . bhagwaan ne Duryodhan ke 56 bhog ko, Vidur ka saag khane ke liye chod diya hai. Ye kahani bhagwaan ka prem dikhati hai. kaise bhagwaan ne kele ke chilke khaya. 

56 Bhog ke bare me Janiye

जिस समय महाभारत युद्ध कि घोषणा हुई तब भगवान शांति दूत बन कर दुर्योधन के महल मे गए थे। भगवान के स्वागत कि बहुत तैयारी कि गई। दुःशासन का भवन, जो राजभवन से भी सुंदर था, वासुदेव के लिए खाली कर दिया गया था। धृतराष्ट्र ने आदेश दिया था, अश्व, गज, रथ, गाएं, रत्न, आभरण और दूसरी जो भी वस्तुएं हमारे यहां सर्वोत्तम हों, वे दुःशासन के भवन में एकत्र कर दी जाएं। वे सब श्रीवासुदेव को भेंट कर दी जाएं।

दुर्योधन के मन मे प्रेम नहीं था बस दिखावा था। भगवान ने कहा कि आप(कौरव और पांडव) आधा-आधा राज्य बाँट लो।  तो दुर्योधन ने मना कर दिया।  भगवान ने कहा कोई बात नहीं तुम सिर्फ 5 गावं दे दो पांडवो को गुजर बसर करने के लिए।  लेकिन दुर्योधन ने मना कर दिया।  बिना युद्ध के सुई के नोक के बराबर जमीं नहीं मिलेगी। क्योकि उसकी बुद्धि विनाश कि ओर जा रही थी। कहा भी गया है “विनाशकाले विपरीत बुद्धि(Vinashkale viprit buddhi)

व्यक्ति गलत मार्ग की और जाता है और जब कोई रोके तो व्यक्ति उसे भी अपना शत्रु मान लेता है

दुर्योधन के पास उनके मामा खड़े थे शकुनि। दुर्योधन पूछते है मामा मैंने ठीक कहा न ? शकुनि बोले कि राजनीती में तू मेरा ही शिष्ये है, मेरे मुह कि बात छिन ली तूने। देख पांडवो के पास बस एक शक्ति है जो कृष्ण है। और कोई शक्ति नहीं है। तू अपने सैनिको को बोल कि कृष्ण को पकड़कर कारागार में डाल दे। जो पांडव सुनेगे तो आधे पांडव मर जायेगे।

सैनिको को आदेश दिया कि पकड़ लो कृष्ण को। ऐसा कहते ही सैनिक कृष्ण को पकड़ने के लिए दौड़े। तभी भगवान श्री कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखा दिया। और प्रत्येक व्यक्ति के अंदर भगवान कृष्ण का सवरूप दिखने लगा। और भगवान कि और देखा तो रोद्र रूप दिखा। आज भगवान के रोद्र रूप को देख कर डर गया है दुर्योधन। तूने सोचा होगा में वही छोटा सा कृष्ण हु जिसने माखन कि मटकी फोड़ी थी और माँ ने ऊखल से बाँध दिया था। तो हाँ में वही कृष्ण हु। पकड़ ले मुझे।

दुर्योधन बोला नहीं भगवान मुझसे गलती हो गई। अब आप मेरा आतिथ्ये स्वीकार कीजिये।

भगवान बोले कि नही, अब हम तुम्हारे घर का अन्न ग्रहण नही करेंगे।

दूसरे के घर का अन्न कब ग्रहण किया जाता है- जब 3 परिस्तिथि हो-

1. खिलाने वाले के मन में भाव हो, 2. किसी के पास आभाव हो और 3. तीसरा किसी के लिए इतना प्रभाव हो कि मना ही न किया जा सके।

भगवान बोले तेरे अंदर भाव नहीं, मेरे पास आभाव नहीं और मेरी दृष्टि में तेरा कोई प्रभाव नहीं। मै तेरे घर का भोजन नहीं करूँगा। दुर्योधन भगवान को मनाता रहा लेकिन भगवान ने एक नही सुनी।

भगवान वहां से चल दिए है। अब महल से निकल कर सोच रहे है अच्छा इसने निमंत्रण दिया है जो सुबह से भूखे बैठे है। याद आई कि हाँ मेरे काका और काकी कितने दिनों से मेरा इंतजार कर रहे है।

मन करम वचन छान चतुराई, तबहि कृपा करत रघुराई।(Man karam vachan chan chaturai, tabhi kripa karat Raghurai)

जब हम मन करम और वचन से चतुराई को छोड़ देंगे।  एक-दम भोले बालक जैसे बन  जायेगे तब भगवान कृपा(kripa) कर देते है।  आज विदुर-विदुरानी(vidur-vidurani) पर कृपा होने जा रही है।

Dekhiye Bhagwan ki kripa

भगवान विदुर के द्वार पर पहुंच गए।  विदुरानी उस समय स्नान कर रही थी और विदुर जी बाजार मे सामान खरीदने गए थे।  भगवान ने आवाज लगाई- काका-काका।  काकी-काकी।  जैसे ही विदुरानी ने आवाज सुनी तो अपनी सुध खो बैठी।  कि आज मेरे गोपाल आये है।  निर्वस्त्र ही दरवाजे कि और दौड़ी ऐसा कहते हुए मेरे भगवान आये है। जो दरवाजा खोला, भगवान ने एकदम झट से अपना पीताम्बर उढ़ा दिया। भगवान को अंदर लेके गई।  चौकी बिछाई वो भी उलटी।  भगवान उस उलटी चौकी पर ही बैठ गए।  एक बार भी भगवान ने नही कहा काकी मे पहली बार तो तेरे घर आया हु और तू मुझे उलटी चौकी पर बिठा रही है।

विदुरानी ने कहा लाला मे तेरा रोज इंतजार करती हु कि मेरा लाला कब आएगा? रोज-रोज आपके लिए माखन मिश्री रखती लेकिन आप मेरे घर नहीं आये न? आज तो मैंने अब तक माखन भी नही निकला कोई व्यवस्था भी नहीं कि क्या खिलाऊ आपको? भगवान एक टक अपने भक्त को निहार रहे है।  विदुरानी को याद आया कि केले के फल रखे हुए है।  भगवान को इंतजार नहीं करवाना चाहती है कि माखन निकालू और भगवान से दूर होउ।  केले का गुदा तो जमीं पर डाल रही है और छिलका खिला रही है। भगवान छिलके खा रहे है।  भगवान उन छिलको को चबा रहे है।  भगवान ने एक बार भी कुछ नहीं बोला।  भगवान चबाते रहे।  और विदुरानी को देख रहे है। 

उसी समय विदुर जी आ गए।  जो द्वार खोला तो देखा कि भगवान कृष्ण सामने बैठे हुए है।  आज गोपाल ने मेरी पत्नी कि जन्म-जन्म कि साधना पूरी कर दी।  जब पास पहुंचे तो देखा कि भगवान को छिलके खिला रही है केले कि जगह।  और विदुरानी के तन पर कोई वस्त्र भी नहीं है। विदुर बोले – ये क्या कर रही है पगली, भगवान को छिलके खिला रही है , दिखाओ मैं खिलाता हूँ तुम जाकर वस्त्र पहन कर आओ। विदुर जी ने छिलका फेंका और केला श्री कृष्ण को दिया ….भगवान की आंखो से आँसू की धार बह निकली — बोले अच्छे हैं, मीठे हैं पर स्वाद नहीं है इनमें जो काकी के हाथो से आ रहा था। बरसों बाद इतने प्रेम से खिलाया था किसी ने। वो ब्रज का माखन ? भगवान को केले के छिलके माखन जितने प्रिये लग रहे है। विदुर ने कहा कि आज भगवान को केले नहीं 56 भोग खिलाऊंगा। भगवान बोले काका जी 56  भोग तो मैं दुर्योधन के घर छोड़ के आया हूँ। मुझे तो इसी मे 56 भोग का आनंद आ रहा है। तब भगवान ने वहां साग रोटी खाई। जो 56 भोग से कहीं बढ़ कर थी।

 

सूरदास(Surdas) जी ने कितना सुन्दर कहा है – दुर्योधन को मेवा त्यागो, साग विदुर घर खाई सबसे ऊंची प्रेम सगाई।(duryodhan ko meva tyago, saag vidur ghar khai, sabse unchi prem sagai)

इस प्रकार भगवान ने विदुर और विदुरानी पर कृपा की।

बोलिए भक्त वत्सल भगवान की जय(Boliye Bhakt vatsal bhagwan ki jai )

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