kichak vadh

Kichaka Vadh Mahabharat Story in hindi

Kichaka Vadh Mahabharat Story in hindi 

कीचक वध महाभारत की कहानी

सभी पांडव व द्रौपदी अज्ञातवास में भेष बदलकर रहने लगे थे। युधिष्ठिर कंक के रूप में, भीम बल्लभ के रूप में, अर्जुन वृहन्नला के रूप में , नकुल तन्तिपाल के रूप में तथा सहदेव ग्रान्थिक के रूप में छिपकर मत्स्य नरेश विराट के यहाँ छिपकर रहने लगे।

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अज्ञातवास के 10 महीने बीत जाने के बाद एक दिन मत्स्य नरेश विराट की पत्नी का भाई कीचक अपनी बहन सुदेष्णा से मिलने के लिए आया। जब उसकी द‍ृष्टि सैरन्ध्री (द्रौपदी) पर पड़ी तो वह काम-पीड़ित हो उठा।

 

Kichak Draupadi hindi story : कीचक द्रौपदी की कहानी

उसने अपनी बहन से सैरंध्री के बारे में पूछा। कीचक की बहन ने यह कहकर टाल दिया कि ये महल की एक दासी है। लेकिन कीचक की बुरी नजर तो सैरंध्री पर थी। कीचक एकांत पाकर द्रौपदी के पास जा पहुँचा। कीचक कहता है- तुम मुझे अपना दास बना सकती हो।’ द्रौपदी डरकर बोली, ‘मैं एक दासी हूँ। मेरा विवाह हो चुका है, मेरे साथ ऐसा व्यवहार मत कीजिए।
कीचक उस समय तो रुक गया लेकिन बुरे व्यक्ति का कोई भरोसा नहीं होता। वह अपनी बहन के पास गया और कहता है कि तुम सैरंध्री को मेरे पास अकेले महल में भेजो। उसकी बहन ने मना कर दिया। लेकिन कीचक ने ज़िद्द पकड़ ली। सच तो ये है कि उसकी मौत उसे बुलावा दे रही थी। किसी दूसरे की पत्नी, बहन, बेटी, बहु पर जो बुरी नजर डालता है उसका क्या हाल होता है आप कथा पढ़कर समझ जायेंगे।

कीचक ने अपनी बहन से ज़िद्द की तो सुदेष्णा ने कहा कि मैं सैरंध्री को तुम्हारे पास भेज दूँगी। मौका पाकर सुदेष्णा ने द्रौपदी से कहा- सैरंध्री, मेरे भाई आएं हैं। तुम उसके कक्ष से मदिरा लेकर आओ। लेकिन सैरंध्री उसकी बुरी नजर जानती थी इसलिए द्रौपदी ने मदिरा लाने से मना कर दिया। अब रानी ने आज्ञा दी कि जो जैसा मैं कहती हूँ वैसा ही करो, मेरे भाई के कक्ष में जाओ और मदिरा लेकर आओ।

सैरंध्री(द्रौपदी) कीचक के कक्ष में गई। वहां पर कीचक मगरमच्छ की तरह आँखें गड़ाए बैठा हुआ था। जैसे ही द्रौपदी वहां पर आई तो कीचक ने जबरदस्ती सैरंध्री को पकड़ने की कोशिश की। द्रौपदी मुश्किल से वहां से भागी और रोती बिलखती सीधा वहां पर गई जहाँ पर राजा विराट अपनी सभा में बैठे हुए थे। राजा विराट के साथ युधिष्ठिर भी कंक के रूप में बैठे हुए थे। द्रौपदी के रोने की आवाज सुनकर वहां भीम आ गए लेकिन युधिष्ठिर ने भीम को वहां से जाने के लिए कह दिया। क्योंकि अज्ञातवास में सब छिपकर वहां रह रहे थे। और अगर अज्ञातवास पूरा होने से पहले किसी ने भी पांडवों को पहचान लिया तो दोबारा से 12 वर्ष का वनवास भोगना पड़ेगा।

भीम वहां से चले गए। द्रौपदी रोती हुई महाराज विराट से कहती है कि- प्रजा की और प्रजा के लोगों की रक्षा करना एक राजा का धर्म होता है। लेकिन आप सब तमाशा देखने में लगे हुए हैं। उस समय कंक ने सबको समझा बुझाकर बात को शांत कर दिया।

द्रौपदी वहां से चलकर सीधा महाराज विराट की महारानी सुदेष्णा के पास गई और कहती है कि तुमने ये जानते हुए कि मैं एक पतिव्रता नारी हूँ उसके बाद मुझे कीचक के कक्ष में भेजा, मेरे पाँच गन्धर्व पति हैं, वे कीचक का वध देंगे। कीचक कल सुबह का सूर्य उगता हुआ नहीं देखेगा। ऐसा कहकर द्रौपदी वहां से चली गई और भीम के पास पहुंची। भीम को द्रौपदी ने पूरी बात बताई और कहा कि अपनी पत्नी की लाज बचाना सबका कर्तव्य होता है तुम कीचक का वध करो। क्योंकि जब तक कीचक का वध नहीं होगा मुझे शांति नहीं मिलेगी।

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