Khandavprastha to Indraprastha Mahabharat Story in hindi

Khandavprastha to Indraprastha Mahabharat Story in hindi

खांडवप्रस्थ से इंद्रप्रस्थ महाभारत की कहानी 

लाक्षागृह से जीवित निकलने के बाद पांडव आगे बढे हैं। भीम ने बकासुर को मारा है। फिर अर्जुन ने स्वयंवर में द्रौपदी को पाया है। इसके बाद माता कुंती की बात को सच करने के लिए पाँचों पांडवों ने द्रौपदी के साथ विवाह किया। अब धृतराष्ट्र व दुर्योधन आदि कौरवों को ये बात पता चल गई थी कि पांडव जीवित हैं और पांडवों ने पांचाल राजा द्रुपद की बेटी द्रौपदी से विवाह कर लिया जिससे उनकी द्रुपद से मित्रता होने बाद वे काफ़ी शक्तिशाली हो गए हैं।
विदुर व भीष्म के कहने पर धृष्टराष्ट्र ने सभी पांडवों को हस्तिनापुर राज्य में बुलाया। अब प्रश्न ये था कि हस्तिनापुर का राजा किसे बनाया जाये? इसका फैसला भीष्म पितामह पर छोड़ा गया। भीष्म पितामह ने हस्तिनापुर को कौरव व पांडवों में आधा-आधा बांटने का आदेश दिया।
लेकिन धृष्टराष्ट्र ने यहाँ पर अपनी चाल चली। पांडवों को बंजर भूमि देने का निश्चय किया। धृष्टराष्ट्र ने युधिष्ठिर को कहा- युधिष्ठिर! आज मैं राज्य का विभाजन करने जा रहा हूँ। दुर्योधन बहुत ज़िद्दी है लेकिन राजा बनने के तुम लायक हो। लेकिन पुत्र प्रेम के कारण मैंने राज्य का विभाजन करना उचित समझा है। तुम खांडवप्रस्थ के वन को हटा कर अपने लिए एक शहर का निर्माण करो, जिससे कि तुममें और मेरे पुत्रों में कोई अंतर ना रहे। यदि तुम अपने स्थान में रहोगे, तो तुमको कोई भी क्षति नहीं पहुंचा पाएगा। तुम खांडवप्रस्थ में निवास करो और आधा राज्य भोगो।

कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, भीष्‍म, धौम्‍य, व्‍यास, श्रीकृष्‍ण, बाल्हिक और सोमदत्‍त ने चारों वेद के विद्वानों को आगे रखकर भद्रपीठ पर संयमपूर्वक बैठे हुए युधिष्ठिर का उस समय अभिषेक किया और सबने यह आशीर्वाद दिया कि ‘राजन्! तुम सारी पृथ्‍वी को जीतकर सम्‍पूर्ण नरेशों को अपने अधीन करके प्रचुर दक्षिणा से युक्‍त राजसूर्य आदि यज्ञ याग पूर्ण करने के पश्‍चात अवभृथ स्‍नान करके बन्‍धु-बान्‍धवों के साथ सुखी रहो।’ इस तरह से युधिष्ठिर का राज्यभिषेक करके आधा राज्य पांडवों को सोंप दिया गया।

Pandvon ki Rajdhani Indraprastha : पांडवों की राजधानी इन्‍द्रप्रस्‍थ

राजा धृतराष्‍ट्र की बात मानकर पाण्‍डवों ने उन्‍हें प्रणाम किया और आधा राज्‍य पाकर वे खाण्‍डवप्रस्‍थ की ओर चल दिये, जो भयंकर वन के रुप में था। धीरे-धीरे वे खाण्‍डवप्रस्‍थ में जा पहुंचे।
खांडवप्रस्थ उस समय एक बहुत पुराना नगर था जिस पर उनके पूर्वज राज करते थे। पाण्‍डवों ने मेहनत करके श्रीकृष्‍ण सहित वहां जाकर उस स्‍थान को स्वर्गलोक के सामान बना दिया।

फिर भगवान् श्री कृष्ण ने देवराज इन्‍द्र का चिन्‍तन किया। इन्‍द्र देव ने भगवान के मन की बात जान ली और विश्‍वकर्मा को खाण्‍डवप्रस्‍थ नगर का निर्माण करने को कहा। साथ ही ये भी कहा कि आज से वह दिव्‍य और सुंदर नगर इन्‍द्रप्रस्‍थ के नाम से जाना जायेगा।

विश्‍वकर्मा खाण्‍डवप्रस्‍थ में गए और भगवान श्री कृष्ण को प्रणाम करके कहा- मेरे लिये क्‍या आज्ञा है?
भगवान ने कहा- विश्वकर्मा! तुम कुरुराज युधिष्ठिर के लिये महेन्‍द्रपुरी के समान एक महानगर का निर्माण करो। इन्‍द्र के निश्‍चय किये हुए नाम के अनुसार वह इन्‍द्रप्रस्‍थ कहलायेगा।

इस प्रकार विश्कर्मा ने एक सुदर नगर का निर्माण कर दिया। जिसकी सोभा व सुंदरता अलौकिक थी। अब खंडावनगर को इंद्रप्रस्थ के नाम से जाना जाने लगा। यहाँ पर सभी पांडव सुखपूर्व द्रौपदी व माता कुंती के साथ उस नगर पर राज करने लग गये। आगे पढ़ें

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