Kauravas Birth(Janam) Story in hindi

Kauravas Birth(Janam) Story in hindi

कौरव की जन्म कहानी/कथा 

 

एक बार की बात है, महर्षि वेद व्‍यास धृतराष्ट्र के यहां आये। गान्‍धारी ने भोजन और विश्राम की व्‍यवस्‍था द्वारा उन्‍हें संतुष्ट किया। तब व्‍यासजी ने गान्‍धारी को वर देने की इच्‍छा प्रकट की। गान्‍धारी ने अपने पति के समान ही सौ पुत्र मांगे। वेद व्यास ने आशीर्वाद दे दिया।

 

 

गान्‍धारी ने धृतराष्ट्र से गर्भ धारण किया। दो वर्ष व्‍यतीत हो गये, लेकिन गांधारी के कोई पुत्र नही हुआ।  इसी दौरान गान्‍धारी ने  सुना कि कुन्‍ती ने युधिष्ठिर को जन्म दिया है, तब उसे बड़ा दु:ख हुआ। गांधारी ने धृतराष्ट्र की अनजान में ही अपने पेट पर आघात किया। तब उसके गर्भ से एक मांस का पिण्‍ड प्रकट हुआ, जो लोहे के पिण्‍ड के समान कड़ा था। उसने दो वर्ष तक उसे पेट में धारण किया था, तो भी उसने उसे इतना कड़ा देखकर फेंक देने का विचार किया।

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यह बात मह‍र्षि व्‍यास को मालूम हुई। वे बड़ी जल्दी गांधारी के पास पहुंचे। उन्होंने गान्‍धारी से पूछा- ‘तुम इसका क्‍या करना चाहती थीं ?

 

गांधारी ने महर्षि को सारी बात सच-सच बता दी। गान्‍धारी ने कहा-  कुन्‍ती के एक ज्‍येष्ठ पुत्र उत्‍पन्न हुआ है। यह समाचार सुनकर अत्‍यन्‍त दु:ख के कारण मैंने अपने गर्भ को गिराया है। आपने पहले मुझे ही सौ पुत्र होने का वरदान दिया था; लेकिन इतने दिनों के बाद मेरे गर्भ से यह मांसपिण्‍ड पैदा हुआ है।

 

व्‍यासजी ने कहा- तूने यह बहुत गलत कर दिया। मेरा आशीर्वाद  झूठा नहीं हो सकता है। अब तुम सौ मटके (कुण्‍ड) तैयार कराओ और उन्‍हें घी से भरवा दो। और किसी गुप्त स्थान पर इस मांसपिण्‍डों को ठंडे जल से सींचो। गान्धारी ने उनकी आज्ञानुसार ऐसा ही किया।

 

उस समय सींचे जाने पर उस मांसपिण्‍ड के सौ टुकड़े हो गये। वे अलग-अलग अंगूठे के पोरु के बरावर सौ गर्भों के रुप में परिणित हो गये।

 

 

काल के परिवर्तन से क्रमश: मांसपिण्‍ड के यथायोग्‍य पूरे एक सौ एक भाग हुए। फिर गान्‍धारी ने उन सभी गर्भों को उन पर्वोक्त कुण्‍डों में रखा।  तब भगवान् व्‍यास ने गान्‍धारी से कहा- ‘इतने ही दिन अर्थात पूरे दो वर्षों तक प्रतीक्षा करने के बाद इन कुण्‍डों का ढक्‍कन खोल देना चाहिये’।

 

Duryodhana birth story in hindi : दुर्योधन के जन्म की कहानी/कथा 

ऐसा कहकर भगवान् व्‍यास हिमालय पर्वत पर तपस्‍या के लिये चले गये। दो वर्ष बीतने पहले कुंड में से दुर्योधन(Duryodhana) उत्‍पन्न हुआ। जन्‍मकाल के प्रमाण से राजा युधिष्ठिर उससे भी ज्‍येष्ठ थे। दुर्योधन के जन्‍म का समाचार परम बुद्धिमान् भीष्‍म तथा विदुरजी को बतया गया।

 

 

 

जिस दिन दुर्योधन का जन्‍म हुआ, उसी दिन भीमसेन भी उत्‍पन्न हुए।  धृतराष्ट्र का वह पुत्र जन्‍म लेते ही गदहे के रेंकने की सी आवाज में रोने-चिल्‍लाने लगा। उसकी आवाज सुनकर बदले में दूसरे गदहे भी रेंकने लगे। गीध, गीदड़ और कौए भी कोलाहल करने लगे। बड़े जोर की आंधी चलने लगी। सम्‍पूर्ण दिशाओं में दाह-सा होने लगा।

 

 

तब राजा धृतराष्ट्र डर गए और बहुत-से ब्राह्मणों को, भीष्‍मजी और विदुरजी को, आदि सभी महान लोगों पूछा -क्‍या मेरा पुत्र राजा बन सकेगा?

 

 

 

भयानक अपशकुनों को देखकर ब्राह्मण लोग तथा परम बुद्धिमान विदुरजी इस प्रकार बोले- राजन ! आपके ज्‍येष्ठ पुत्र के जन्‍म लेने पर जिस प्रकार ये भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उनसे स्‍पष्ट जान पड़ता है कि आपका यह पुत्र समूचे कुल का संहार करने वाला होगा। यदि इसका त्‍याग कर दिया जाय तो सब विघ्नों की शान्ति हो जायगी। यदि इसका त्याग नहीं किया गया तो बड़ा भारी उपद्रव खड़ा होगा। लेकिन पुत्रमोह के कारण धृतराष्ट्र उसका त्याग नहीं कर सके।

 

 

Dhritarashtra Daughter Dushala Story in hindi : धृतराष्ट्र की पुत्री दुःशला 

 

इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र के पूरे सौ पुत्र हुए।  एक ही मास में गान्‍धारी से एक कन्‍या उत्‍पन्न हुई, जो सौ पुत्रों के अतिरिक्त थी। जिसका नाम दु:शला(Dushala) रखा गया।

 

Dhritarashtra son Yuyutsu Story in hindi : धृतराष्ट्र पुत्र युयुत्‍सु

जिन दिनों गर्भ धारण करने के कारण गान्‍धारी का पेट बढ़ गया था और वह क्‍लेश में पड़ी रहती थी, उन दिनों महाराज धृतराष्ट्र की सेवा में एक वैश्‍यजातीय स्त्री रहती थी।  धृतराष्ट्र के अंश से उस वैश्‍यजातीय भार्या के द्वारा एक और पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम युयुत्‍सु(Yuyutsu) पड़ा।

 

युवा होने पर सभी राजकुमारों का विवाह यथायोग्य कन्याओं से कर दिया गया। दु:शला का विवाह जयद्रथ के साथ हुआ।

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