Kaurav and Pandav(Arjun) Education(Siksha) and Pariksha By Dronacharya in hindi

Kaurav and Pandav(Arjun) Education(siksha) and Pariksha By Dronacharya in hindi 

कौरव और पांडव(अर्जुन) की शिक्षा और परीक्षा गुरु द्रोणाचार्य द्वारा परीक्षा 

 

गुरु द्रोणाचार्य ने पांडव और कौरवों को शिक्षा देना शुरू किया है। अर्जुन (सदा अभ्‍यास में लगे रहने से ) धनुर्वेद की जिज्ञासा, शिक्षा, बाहुबल और उद्योग की दृष्टि से उन सभी शिष्‍यों में श्रेष्ठ एवं आचार्य द्रोण की समानता करने योग्‍य हो गये। अर्जुन के साथ साथ गुरु द्रोण सभी को अस्त्र और शस्त्र की शिक्षा देने लगे।
एक बार गुरु द्रोण अश्व्थामा को अकेले में चक्रव्यहू रचना के बारे में सीखा रहे थे वहीँ पर अर्जुन भी पहुँच गया।

 

अर्जुन हर तरह से गुरुदेव के कार्य को पूरा करने का प्रयत्न करते थे। उनकी खूब सेवा करते थे। अस्त्रों के अभ्‍यास में भी उनकी अच्‍छी लगन थी। इसीलिये वे द्रोणाचार्य के बड़े प्रिय हो गये।

 
एक बार रात्रि में भीम भोजन कर रहे थे। अर्जुन पास में बैठे थे। तेज हवा चलने के कारण दीपक बुझ गया था। लेकिन भीम लगातार खाना खाये जा रहे थे। अर्जुन ने पूछा, भीम भैया! आप अँधेरे में खाना किस तरह से खा रहे हैं।

 

भीम ने कहा की भाई, हाथो के भी आँखे होती है और ये अभ्यास की बात है। खाना मुह से अंदर जायेगा और हाथ इसमें सहयोगी बनेंगे। अर्जुन को ये बात बहुत पसंद आई। अर्जुन ने अब रात्रि में ही अभ्यास करना शुरू कर दिया। गुरु द्रोण ने जब अर्जुन को देखा तो बहुत प्रसन्न हुए और अर्जुन को ह्रदय से लगा लिया। द्रोण ने कहा- – अर्जुन! मैं ऐसा करने का प्रयत्न करूंगा, जिससे इस संसार में दूसरा कोई धर्नुधर तुम्‍हारे समान न हो।

 

फिर द्रोणाचार्य जी ने कौरवों को गदायुद्ध, खड्ग चलाने तथा तोमर, प्रास और शक्तियों के प्रयोग की कला एवं एक ही साथ अनेक शस्त्रों के प्रयोग अथवा अकेले ही अनेक शत्रुओं से युद्ध करने की शिक्षा दी।

 

एक दिन निषादराज हिरण्‍यधनुका का पुत्र एकलव्‍य द्रोण के पास आया। लेकिन आचार्य ने एकलव्य को अपना शिष्‍य नहीं बनाया। क्योंकि वो अपने वचन से बंधे हुए थे।

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द्रोण के दो शिष्‍य दुर्योधन और भीमसेन गदा युद्ध में निपुण हो गए। लेकिन ये दोनों क्रोध (स्‍पर्द्धा) से भरे रहते थे। अश्व्थामा धनुर्विद्या में निपुण हो गया। नकुल और सहदेव दोनों भाई तलवार चलने में कुशल हो गए। युधिष्ठिर भला चलने में निपुण हो गए।

 

पांडव और कौरव की परीक्षा : Pandav Kaurav Pariksha 

एक बार गुरु द्रोण ने सभी शिष्यों की परीक्षा लेने को सोची। और उन्होंने एक वृक्ष पर एक पक्षी बिठाया। अपने सभी शिष्यों को बुलाकर उसकी आँख में तीर मारने के लिए बोला।
आचार्य द्रोण ने सबसे पहले युधिष्ठिर से कहा- तुम धनुष पर बाण-चढ़ाओ और मेरी आज्ञा मिलते ही उसे छोड़ दो’।

द्रोण ने पूछा- तुम्हे इसमें क्या दिखाई देता है

युधिष्ठिर ने आचार्य को उत्तर दिया- मैं सब कुछ देख रहा हूँ ।

द्रोणाचार्य फि‍र द्रोण ने कहा- क्‍या तुम इस वृक्ष को, मुझ को अथवा अपने भाइयों का भी देखते हो?

युधिष्ठिर ने कहा- ‘हां, मैं इस वृक्ष को, आपको, अपने भाइयों तथा इस पक्षी को भी बारंबार देख रहा हूं’। उनका उत्तर सुनकर द्रोणाचार्य अप्रसन्न- से हो गये और – ‘हट जाओ यहां से, तुम इस लक्ष्‍य को नहीं बींध सकते’।

 

फिर आचार्य ने यही प्रश्न दुर्योधन और उसके भाइयों से पूछा। सभी ने यही उत्तर दिया जो युधिष्ठिर ने दिया था। यह सुनकर आचार्य ने उन सबको झिड़ककर हटा दिया।

 

द्रोणाचार्य ने अर्जुन से मुस्‍कराते हुए कहा- ‘अब तुम्‍हें इस लक्ष्‍य को भेदना है। बताओ तुम्हे क्या दिखाई देता है?

अर्जुन ने कहा की मुझे इस पक्षी के सिर में लगी हुई आँख दिख रही है।

गुरुदेव ये बात सुनकर खुश हो गए और अर्जुन से कहा की लक्ष्य का भेदन करो।

अर्जुन ने तुरंत बाण छोड़ दिया। और बाण पक्षी की आँख में लगा। परीक्षा में अर्जुन सफल हुआ और आचार्य ने अर्जुन को ह्रदय से लगा लिया।

एक बार अश्वत्थामा ने गुरु द्रोण से पूछा- गुरुदेव! आप अर्जुन को अपना प्रिय शिष्य क्यों मानते हैं?
गुरुदेव ने कहा की अश्वत्थामा समय आने पर तुम्हे खुद पता चल जायेगा।

एक दिन आचार्य द्रोण अपने शिष्‍यों के साथ गंगाजी में स्‍नान करने के लिये गये। वहां जल में गोता लगाते समय एक मगरमच्छ ने द्रोणाचार्य की टांग पकड़ ली। वे अपने सभी शिष्‍यों से बोले- ‘मुझे बचाओ’।
उनके इस आदेश के साथ ही अर्जुन ने पांच अमोघ एवं तीखे बाणों द्वारा पानी में डूबे हुए उस मगरमच्छ पर प्रहार किया। जबकि दूसरे राजकुमार हक्‍के-बक्‍के–से होकर अपने-अपने स्‍थान पर खड़े रहकर देखते रहे।

 

 

द्रोणाचार्य ने बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन के बाणों से मगरमच्छ के टुकड़े-टुकड़े हो गये थे।

द्रोणाचार्य ने कहा कि ये तुम सबकी परीक्षा थी। यहाँ पर मगरमच्छ मेरी माया से आया था। इस परीक्षा में अर्जुन सफल हुआ है। और ये सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनेगा।

 
इसके बाद द्रोणाचार्य ने अर्जुन को ब्रह्मशिर नामक अस्त्र का प्रयोग करना बताया। अर्जुन को बताया कि मनुष्‍यों पर तुम्‍हें इस अस्त्र का प्रयोग कभी नहीं करना है। यदि किसी अल्‍प तेज वाले पुरुष पर इसे चलाया गया तो यह उसके साथ ही समस्‍त संसार को भस्‍म कर सकता है।

 
यह अस्त्र तीनों लोकों में असाधारण बताया गया है। तुम मन और इन्द्रियों को संयम में रखकर इस अस्त्र को धारण करो और यदि कोई शत्रु तुम्‍हें युद्ध में पीड़ा देने लगे तो तुम उसका वध करने के लिये इस अस्त्र का प्रयोग कर सकते हो’। तब अर्जुन ने ‘तथास्‍तु’ कहकर वैसा ही करने की प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्र को ग्रहण किया। उस समय गुरु द्रोण ने अर्जुन से पुन: यह बात कही- ‘संसार में दूसरा कोई पुरुष तुम्‍हारे समान धनुर्धर न होगा’।

 

इस तरह से कौरव और पांडवों की शिक्षा पूरी हुई है। और इनका कोशल दिखने के लिए रंगभूमि का आयोजन किया गया।

 

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