Kaurav attack Matsya desh(Virat Nagar) story in hindi

Kaurav attack Matsya desh(Virat Nagar) story in hindi

कौरवों द्वारा मत्स्य देश(विराट नगर) पर आक्रमण की कहानी

 

भीम ने कीचक का वध किया। क्योंकि उसने अपनी बुरी दृष्टि द्रौपदी पर डाली थी। कीचक के वध की सूचना आँधी की तरह चारों ओर फैल गई। दुर्योधन आदि कौरव विचार करते हैं कि कीचक का वध सिर्फ 6 लोग ही कर सकते हैं। बलराम जी, भीष्म जी, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन और भीम। भीम ने ही कीचक को मारा है। कौरवों को विश्वास हो गया था कि भीम ने ही कीचक को मारा है।  अब सभी कौरवों ने भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, दुसासन, व कर्ण और सेना सहित मत्स्य नगर की राजधानी विराट नगर पर आक्रमण करने का फैसला किया।

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इनके आक्रमण करने से पहले कौरवों ने त्रिगर्त के राजा सुशर्मा को विराट नगर पर आक्रमण करने के लिए कहा। सुशर्मा ने कौरवों की सलाह मानकर विराट नगर पर धावा बोलकर उस राज्य की समस्त गौओं को हड़प लिया।

 

 

 

अब एक सैनिक ने इसकी सुचना राजा विराट को दी। उसने कहा कि – राजा सुशर्मा हमसे सब गौओं को छीनकर अपने राज्य में ले जा रहे हैं। उस समय सभा में राजा विराट और कंक(युधिष्ठिर) आदि सभी मौजूद थे। कंक ने कहा- महाराज, आप मेरी सलाह मानिये। युद्ध में अपने साथ मुझे ले चलिए और अगर आप आज्ञा दें तो बल्लव(भीम), तन्तिपाल(नकुल), ग्रन्थिक(सहदेव) इन सबको साथ में लेकर चलो। फिर हमें युद्ध में कोई नहीं हरा पायेगा। क्योंकि ये सभी युद्ध कला में निपुण है।

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युधिष्ठिर की बात मानकर राजा विराट ने राजा सुशर्मा के ऊपर धावा बोल दिया। पांडवों का पराक्रम देखकर सुशर्मा डर गया और डर कर भागने लगा। तभी भीम ने भागकर सुशर्मा को पकड़ लिया और उसे खूब पीटा। उसको पीट पीटकर भीम ने उसे धरती पर पकट दिया और राजा विराट के सामने अधमरा करके खड़ा कर दिया।

 

 

तब कंक ने राजा को कहा कि आप इसे क्षमा कर दीजिये। क्योंकि क्षमा से बढ़कर दुनिया में कोई भी धर्म नहीं है। राजा विराट कहते हैं कि तुम्हारा ये कर्म माफ़ करने योग्य नहीं है लेकिन कंक के कहने पर मैं तुम्हे क्षमा करता हूँ। सुशर्मा के द्वारा दासत्व स्वीकार करने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने उसे छोड़ दिया।

 

 

 

इधर दूसरी ओर कौरवों ने विराट नगर पर हमला बोल दिया। प्रजा में हल्ला हो गया कि राजा विराट तो सुशर्मा के साथ युद्ध करने गए हैं। अब क्या किया जाये?  महल में केवल विराट के पुत्र कुमार उत्तर ही थे।

 

 

राजकुमार उत्तर को युद्ध करने के लिए कहा गया। राजकुमार उत्तर पहले तो युद्ध करने के लिए उत्साहित हुए लेकिन फिर डर गए की मैं पितामह भीष्म, गुरु द्रोण, अंगराज कर्ण और दुर्योधन का सामना कैसे करूँगा।  तब सैरंध्री(द्रौपदी) ने समझाया कि तुम अपने साथ बृहन्नला(अर्जुन) को ले जाओ। बृहन्नला युद्ध में निपुण है। द्रौपदी की बात मानकर कुमार उत्तर युद्ध में गए व बृहनल्ला को सारथि बनाया गया। 

 

 

जैसे ही कौरवों की सेना के सामने रथ गया तो कुमार उत्तर बड़े बड़े वीरों को देखकर डर गए। कुमार उत्तर कहते हैं कि तुम रथ वापस ले चलो। मैं इन योद्धाओं से मुकाबला नहीं कर सकता।” बृहन्नला ने कहा- “हे राजकुमार! किसी भी क्षत्रियपुत्र के लिये युद्ध में पीठ दिखाने से तो अच्छा है कि वह युद्ध में वीरगति प्राप्त कर ले। उठाओ अपने अस्त्र-शस्त्र और करो युद्ध।” किन्तु राजकुमार उत्तर पर बृहन्नला के वचनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह रथ से कूदकर भागने लगा। इस पर अर्जुन (वृहन्नला) ने भागकर कर उसे पकड़ लिया और कहा- “राजकुमार! भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। मेरे होते हुये तुम्हारा कोई भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

 

तब बृहनल्ला ने कहा कि तुम मेरे रथ के सारथि बनो। उत्तर रथ के सारथि बने और अर्जुन ने रथ को उस दिशा में ले जाने के लिए कहा जहाँ पर पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र छिपकर रखे हुए थे।

 

क्योंकि पाण्डवों के अज्ञातवास का समय समाप्त हो चुका था तथा उनके प्रकट होने का समय आ चुका था। उर्वशी के शापवश मिली अर्जुन की नपुंसकता भी समाप्त हो चुकी थी। अर्जुन, उत्तर के साथ उस श्मशान में गए  जहाँ पाण्डवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र छुपाये थे। वहां एक वृक्ष से अपने सभी अस्त्र शस्त्र उतार लिए।

 

 

अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष लिया और टंकार की। उत्तर ने अर्जुन से पूछा कि तुम कौन हो?

 

अर्जुन बोले- मैं तुम्हारे सामने खुद को प्रकट कर रहा हूँ। मैं पाण्डुपुत्र अर्जुन हूँ और ‘कंक’ युधिष्ठिर, ‘बल्लव’ भीमसेन, ‘तन्तिपाल’ नकुल तथा ‘ग्रन्थिक’ सहदेव है। अज्ञातवास के कारण मैं तुम्हारे यहाँ अपने भाइयों के साथ छिपकर रह रहा था। अब मैं इन कौरवों से युद्ध करूँगा, तुम रथ की बागडोर संभालो।” यह वचन सुनकर राजकुमार उत्तर ने गदगद होकर अर्जुन के पैर पकड़ लिये।   ऐसा कहकर अर्जुन ने अपने दिव्य रथ मंगवाया और उस पर सवार होकर रणभूमि में पहुंचा।

 

 

अर्जुन ने अपना  ‘देवदत्त’ शंख युद्ध के लिए बजाया।

शंख की ध्वनि को सुनकर दुर्योधन भीष्म से बोला- “पितामह! यह अर्जुन के देवदत्त शंख की ध्वनि है, अभी तो पाण्डवों का अज्ञातवास समाप्त नहीं हुआ है। अर्जुन ने स्वयं को प्रकट कर दिया, इसलिये अब पाण्डवों को पुनः बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना होगा।” दुर्योधन के वचन सुनकर भीष्म पितामह ने कहा- “दुर्योधन!  तुम्हें ज्ञात नहीं है कि पाण्डव काल की गति जानने वाले हैं, बिना अवधि पूरी किये अर्जुन कभी सामने नहीं आ सकता। मैंने भी गणना कर लिया है कि पाण्डवों के अज्ञातवास की अवधि पूर्ण हो चुकी है।” तुम किसी भी गणिताचार्य से पूछ सकते हो कि अज्ञातवास की अवधि समाप्त हुई या नहीं।

 

 

 

दुर्योधन क्रोध में बोला- पितामह, आप सदैव ही पांडवों का पक्ष लेते हैं। चलिए युद्ध कीजिये। भीष्म की आज्ञानुसार- दुर्योधन एक तिहाई सेना के साथ गौओं को हस्तिनापुर ले जाने लगा। अर्जुन ने दुर्योधन को जाते हुए देखा तो अपना रथ दुर्योधन के रथ के पीछे दौड़ने के लिए कुमार उत्तर से कहा। अर्जुन ने दुर्योधन के साथ के सामने आते ही असंख्य बाणों से उसे व्याकुल कर दिया। अर्जुन के बाणों से दुर्योधन के सैनिकों के पैर उखड़ गये और वे पीठ दिखाकर भाग गये। सारी गौएँ भी रम्भाती हुईं विराट नगर की ओर भाग निकलीं।

 

 

दुर्योधन को अर्जुन के बाणों से घिरा देखकर कर्ण, द्रोण, भीष्म आदि सभी वीर उसकी रक्षा के लिय दौड़ पड़े। कर्ण

 

अर्जुन ने एक एक करके सबसे युद्ध किया। अर्जुन ने कर्ण को पराजित किया। भीष्म व गुरु द्रोण को पराजित किया। अंत में दुसाशन को भी पराजित किया। अर्जुन इसे मारने लगे तभी याद आ गया कि नहीं नहीं, भीम ने इसे जान से मारने की प्रतिज्ञा की है। ऐसा कहकर अर्जुन ने इसकी जान को बक्श दिया। अब अर्जुन ने सम्मोहन बाण चला दिया। इस बाण से सब मूर्छित हो गए। अब अर्जुन ने कुमार उत्तर को कहा कि तुम कर्ण, दुसासन, और दुर्योधन का वस्त्र ले आओ। तुम्हारी बहन उतरा ने इन वस्त्रों को मंगवाया है। लेकिन गुरु द्रोण, कृपाचार्य व भीम पितामह के वस्त्र मत लाना। अर्जुन की आज्ञानुसार उत्तर इनके वस्त्र ले आया।

 

अब उत्तर ने कहा कि ये सब मूर्छित हो गए हैं आप इनका वध कर दिए। अर्जुन ने कहा- मूर्छित लोगों की हत्या करना घोर पाप है। इसलिए अब हम यहाँ से चलते हैं। ऐसा कहकर अर्जुन युद्ध जीतकर कुमार उत्तर के साथ विराट नगर में आ गए। विराट नगर में राजा विराट ने अपने पुत्र की जीत पर खूब स्वागत किया।

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