Kartikeya birth(janam) and Tarakasur vadh story

Kartikeya birth(janam) and Tarakasur vadh story

कार्तिकेय जन्म और तारकासुर वध कथा(कहानी)

भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ है। शिव और पार्वती कैलाश पर नित्य लीला करते हैं। काफी समय व्यतीत हो गया।

Kartikeya birth(janam) : कार्तिकेय जन्म 

एक दिन माता पार्वती एक सरोवर के तट पर गई। सरोवर का जल निर्मल और स्वच्छ था। उसी समय उन्होंने देखा की कमल-पत्र में जल लेकर छ: कर्तिकाएँ अपने घर जाने ही वाली हैं।
भगवती उमा ने कहा- देवियों! अगर आपको कष्ट ना हो तो कमल-पत्र में रखा हुआ जल मैं भी पीना चाहती हूँ।
कृतिकाओं ने कहा-देवी! जल पीने से पहले आपको एक बात हमारी माननी पड़ेगी। इस समय आपके गर्भ में जो पुत्र है वह हमारा भी पुत्र मन जायेगा।
पार्वती जी ने तत्काल वचन दे दिया- ऐसा ही होगा।
कर्तिकाएँ बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने कमल- पत्र में रखा थोड़ा सा जल पार्वती जी को भी दिया। भगवती पार्वती जी ने कार्तिकाओं के साथ उस मधुर जल का पान किया। जल पिटे ही उनकी दाहिनी कोख से एक परम तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ। षष्ठी तिथि को कार्तिकेय भगवान का जन्म हुआ था। जिसके छ: मुख थे। उनके सुंदर हाथ में शूल, शक्ति और अंकुश शोभित थे। सरकंडों के वन में जन्म ग्रहण कर वह बालक दिनों-दिन बढ़ने लगा। वह अपने छेहों मुख से छेहों कृतिकाओं का दूध पीने लगा।

 

कर्तिकाएँ भी माँ की तरह उसका पालन-पोषण करने लगी। इस प्रकार कार्तिकाओं द्वारा पालित होने के कारन वह बालक आगे चलकर कार्तिकेय के नाम से विख्यात हुआ। देवताओं ने कार्तिकेय को अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये और उनकी विविध प्रकार से पूजा की। कार्तिकेय का एक नाम स्कन्द भी है।

 

Tarakasur death(vadh) : तारकासुर वध(मृत्यु)

तारकासुर वध- तारकासुर एक प्रसिद्ध असुर था, जो तार का पुत्र तथा तारा का भाई था। इसने ब्रह्मा से वर पाने के लिए घोर तप किया और उन्हें प्रसन्न करके दो वर प्राप्त किये थे। तारकासुर ब्रह्मा से वरदान पाने के बाद और भी अत्याचारी और बलवान हो गया था। क्योंकि ब्रह्माजी के वरदान के अनुसार तारकासुर का वध केवल शिव से उत्पन्न होने वाला ही कोई कर सकता था। इसने पूरी पृथ्वी पर आतंक मचा रखा था। सारे देवता इससे परेशान थे।

देवता मिलकर भगवान शिव के के पास गए हैं और भगवान शिव से अनुरोध किया है-प्रभु! अब देवताओं का दुःख दूर करने के लिए आप कुमार कार्तिकेय को आज्ञा दीजिये।
शिवजी ने कुमार कार्तिकेय को देवताओं को सौंप दिया है। कुमार कार्तिकेय देवताओं के सेनापति बन गए हैं। इंद्र ने तारकासुर के पास अपना दूत भेजा है। दूत ने तारकासुर से कहा- असुरराज! देवराज इंद्र तुमसे युद्ध करने आ रहे हैं।अगर तुम्हे अपने प्राण प्यारे हैं तो जो तुमसे हो सके वो करलो।

कुछ समय बाद कार्तिकेय ने देव सेना के साथ तारक के नगर पहुंचकर उसे चारों और से घेर लिया। दैत्यराज तारकासुर भी अपनी सेना के साथ युद्धभूमि में आ गया। भयंकर युद्ध छिड़ गया। कार्तिकेय का आश्रय पाकर देवता प्रबल हो गए थे। वे असुरों का संहार करने लगे।
तारकासुर ने जब कार्तिकेय को अपने सामने देखा तो बोला- अरे बालक! तू युद्ध में क्यों मारना चाहता है? तू अभी बालक है जाकर गेंद से खेल।

कार्तिकेय ने उत्तर दिया- तू मुझे बालक समझ रहा है। विषधर का नन्हा बच्चा भी मार डालने में समर्थ होता है। छोटे मन्त्र में भी अद्भुत शक्ति होती है। दुष्ट! अब तू मेरे हाथों से मरेगा।

ताकरसुर ने ऐसा सुनते ही अपने वज्रतुल्य मुदग्र का प्रहार किया। कार्तिकेय ने अपने चक्र से उसे बीच में ही नष्ट कर दिया। पार्वतीनन्दन के सामने असुरों के सारे अस्त्र-शस्त्र फ़ैल हो गए। असरों की सेना तितर बितर हो गई। पृथ्वी पर रक्त की नदियां बहने लगी। कार्तिकेय ने अब अपनी अमोघ शक्ति का प्रहार तारकासुर पर किया। वह शक्ति तारक की छाती में प्रवेश कर गई और उसकी छाती फट गई। दैत्य तारक का अंत हो गया।

तारक के वध से पृथ्वी से पाप मिट गया। देवगन शिव-पुत्र की स्तुति करने लगे। चारों तरफ कार्तिकेय की जय जय कर होने लगी।

बोलिए शिव-पार्वती नंदन की जय !! कुमार कार्तिकेय की जय !!

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