Karna Krishna and kunti samvad Story in hindi

Karna Krishna and kunti samvad Story in hindi

 

कर्ण कृष्ण और कुंती के संवाद की कहानी

 

भगवान श्री कृष्ण शांति दूत बनकर कौरवों की सभी में गए। लेकिन दुर्योधन ने भगवान श्री कृष्ण के शांति के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और युद्ध का रास्ता चुना। जब युद्ध होना निश्चित हो गया तब कर्ण का कवच और कुण्डल इंद्र ने दान में ले लिया।

Krishna and Karna Samvad in hindi : कृष्ण और कर्ण का संवाद

जब भगवान कृष्ण हस्तिनापुर से जाने लगे तब वहां पर कर्ण भी मौजूद थे। कर्ण ने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी। क्योंकि दुर्योधन ने सभा में भगवान के साथ उचित व्यवहार नहीं किया था। भगवान कहते हैं कर्ण! इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। जिसने गलती की उसे ही क्षमा मांगनी चाहिए। क्योंकि मैं तो मान अपमान से परे हूँ।ऐसा कहकर भगवान कहते हैं मैं अब यहाँ से जा रहा हूँ। चलो थोड़ी दूर अगर साथ चल सकते हो तो।

 

कर्ण कहते हैं वासुदेव! मैं आपके साथ चलने के लिए तैयार हूँ लेकिन मैं आपके रथ का सारथि बनूँगा। तब भगवान ने कहा की ठीक है। कर्ण सारथि बने और कृष्ण उस रथ पर बैठे। दूसरे रथ पर कृतवर्मा और सात्यिकी थे। कुछ दूर जाने पर भगवान ने कर्ण को कहा- रथ रोको कर्ण।

 

कर्ण ने रथ रोक दिया। भगवान ने सात्यिकी और कृतवर्मा को वहीँ रुकने के लिए कहा।

 

 

अब कर्ण और कृष्ण अकेले थे। कर्ण कृष्ण से यहाँ पर एक बात पूछते हैं कि वासुदेव! एक बात बताओ। मेरा और अर्जुन का जितनी बार भी सामना हुआ उसमे मैं जीत क्यों नहीं पाया। अर्जुन मुझसे हर बार भारी क्यों पड़ा?

 

कृष्ण कहते हैं- क्योंकि वो हर बार धर्म के पक्ष में युद्ध करता है। तुम हर बार अधर्म का साथ देते हो जिस कारण से तुम हार जाते हो।

 

 

 

अब कृष्ण ने कर्ण से कहा- कर्ण तुम जानते हो कि तुम कौन हो? किसके पुत्र हो?

 

कर्ण कहते हैं- वासुदेव! मुझे सूत पुत्र के नाम से जाना जाता है। लेकिन मैं ये भी जानता हूँ कि मैं सूत पुत्र नहीं हूँ। मुझे किसी क्षत्राणी ने जन्म दिया है। किसी मज़बूरी के कारण उन्होंने मेरा त्याग कर दिया होगा।

 

भगवान कहते हैं- हाँ कर्ण। तुम पांच वीर महारथियों के भाई हो। जिन्हे आज तक युद्ध में कोई नहीं हरा पाया। तब कर्ण को समझते हुए देर नहीं लगी कि ये पांच वीर महारथी तो पांडव हैं। ये सुनकर कर्ण चौंक गए।

 

कर्ण कहते हैं- वासुदेव! अब युद्ध होने वाला है। तब तुमने ये सब मुझे क्यों बताया। क्योंकि मैं पहले ही टूट चूका हूँ। मेरे कवच और कुण्डल इंद्र देव ने ले लिए। अब तुमने मुझे ये बताया कि मैं पांडवों का भाई हूँ। अब किस प्रकार मैं उन पर बाण चला पाउँगा।

 

कृष्ण कहते हैं- कर्ण! तुम जानते हो कि दुर्योधन अधर्म के रास्ते पर चल रहा है। तुम पांडवों के पास चलो। मैं खुद तुम्हे इंद्रप्रस्थ का राजा बना दूंगा। तुम्हारे पाँचों भाई तुम्हारी सेवा करेंगे। क्योंकि तुम धर्म में युधिष्ठिर के सामान, और वीरता में अर्जुन के सामान हो।

 

 

कर्ण कहते हैं- नहीं वासुदेव! मैं दुर्योधन को युद्ध में उसकी ओर से युद्ध करने का वचन दे चूका हूँ। जिस समय मुझे सूत पुत्र कहा जा रहा था तब दुर्योधन ने ही मुझे अंग देश का राजा बनाया था। उसके उपकार का बदला मैं मरकर भी नहीं उतर सकता।

 

कृष्ण कहते हैं- कर्ण! उस समय वो खुद पांडवों से हार रहा था। तब उसे कोई चारा नहीं दिखाई दिया। इसलिए दुर्योधन ने तुम्हे अंग देश का राज्य दिया।

 

कर्ण बोले- कृष्ण! चाहे कुछ भी है। अब मैं दुर्योधन को वचन दे चूका हूँ। चाहे सूर्य अपने प्रकाश से अलग हो जाये लेकिन मैं तुम्हारी ओर से युद्ध करूँगा। तुम्हारी मृत्यु से पहले मेरी मृत्यु होगी।

 

 

फिर कर्ण पूछते हैं- मेरी माँ कुंती है। उन्होंने मेरा त्याग क्यों किया?

 

कृष्ण कहते हैं- कर्ण! तुम्हारे पिता सूर्य देव और माता कुंती है। ऋषि दुर्वाशा के फलस्वरूप तुम्हारा जन्म तुम्हारी विवाह से पहले हो गया था। लोक लाज के लिए उन्होंने तुम्हारा त्याग कर दिया।

 

ये सब सुनकर कर्ण पूरी तरह से टूट गया। कर्ण सोचता है जो आज तक खुद को सूत पुत्र समझ रहा था वह कुंती का पुत्र है।

 

इस तरह भगवान कृष्ण ने भी कर्ण को समझाने का बहुत ही प्रयास किया लेकिन प्रतिज्ञाबद्ध और वचनबद्ध होने के कारण कर्ण ने पांडवों की ओर से युद्ध करने से मना कर दिया। साथ में वासुदेव से ये वचन भी लिया कि वो किसी को भी ये ना बताएं कि मैं कुंती पुत्र और पांडवों का भाई हूँ। क्योंकि अगर पांडवों को पता चला तो वे मुझसे कभी भी युद्ध नहीं कर पाएंगे।

 

 

यहाँ से जाने के बाद कर्ण सीधा दुर्योधन के पास गया। कर्ण दुर्योधन से कहता है मित्र! तुम किसी तरह से चिंता न करना। जब तक तुम्हारा मित्र कर्ण है तब तक तुम्हे युद्ध मैं कोई भी हरा नहीं सकता। व्यक्ति से उसकी परछाई अलग हो सकती है लेकिन दुर्योधन से कर्ण कभी नहीं। ऐसा विश्वास दिलाकर कर्ण यहाँ से चला गया।

 

रात्रि हुई लेकिन कर्ण को वो सारी बातें याद आने लगे कि किस तरह से कर्ण को रंगभूमि में सूतपुत्र कहकर अपमानित किया गया था। जैसे तैसे सुबह हुई है।

 

Kunti and Karna Samvad in hindi : कुंती और कर्ण का संवाद

एक रोज कुंती भी कर्ण से मिलने आई। कर्ण पूछते हैं- राजमाता! आप यहाँ पर मुझसे मिलने क्यों आई है? मैं तो सूतपुत्र हूँ। कोई देख लेगा तो क्या कहेगा एक महल की राजमाता एक सूत पुत्र से बात कर रही है। तब कुंती कहती है कि तुम सूत पुत्र नहीं हो। तुम मेरे पुत्र हो।

 

कर्ण कहते हैं- मैं जानता हूँ कि मैं तुम्हारा पुत्र हूँ। वासुदेव कृष्ण ने मुझे सब बता दिया। लेकिन मेरे साथ जो अन्याय हुआ उसका कारण तो या आप हैं या सूर्य देव। मेरी क्या गलती थी उसमे। बोलिये माता बोलिये।

 

आज कुंती सिर्फ रो रही हैं। अपने पुत्र कर्ण को छाती से भी नहीं लगा पा रही हैं।  कुंती कहती हैं- पुत्र कर्ण कुछ ऐसी मज़बूरी थी कि मुझे तुमको गंगा में बहाना पड़ा। अब मेरी दशा तो देखिये। एक ओर पांच पांडव तुम्हारे भाई खड़े है दूसरी ओर तुम। दोनों ओर मेरे ही तो पुत्र हैं।

 

 

एक माँ का दर्द तुम नहीं समझ पाओगे कर्ण। मैं तुमसे कुछ मांगने आई हूँ।

 

 

कर्ण कहते हैं- मेरे पास अब देने के लिए कुछ भी नहीं है। इंद्र ने मेरे कवच और कुण्डल ले लिए। वासुदेव कृष्ण ने मुझे सत्य बता दिया। अब मैं युद्ध मैं लडूंगा भी तो किस तरह से लडूंगा।

 

 

कुंती कहती है- तुम मेरे पुत्रों का वध मत करना।

 

 

कर्ण कहते हैं- माता! मैं युद्ध में दुर्योधन का साथ दे रहा हूँ। लेकिन मैंने अर्जुन को मारने की शपथ खाई है।

मुझे समझ नहीं आता है कि मैं अब क्या करूँ? फिर भी मैं तुम्हे वचन देता हूँ कि तुम्हारे युद्ध में पांच पुत्र ही जीवित रहेंगे। या तो अर्जुन वीरगति को प्राप्त होगा या मैं। क्योंकि अर्जुन के अलावा मैं तुम्हारे किसी पुत्र को नहीं मारूंगा।

 

 

माता कुंती ये सब सुनकर रो पड़ी। और वहां से चली गई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.