Kapil Devahuti and Kardama Story in hindi

Kapil Devahuti and Kardama Story in hindi

कपिल देवहुति और कर्दम कहानी/कथा 

 

स्वायम्भुव मनु के दो पुत्र (प्रियव्रत और उत्तानपाद) और तीन पुत्रियां( देवहूति, आकूति और प्रसूति) थी। देवहूति जी का विवाह कर्दम प्रजापति के साथ हुआ था।

 

ब्रह्मा जी ने ब्रम्हाजी ने कर्दम जी को आज्ञा दी कि तुम संतान उत्पत्ति करो तो उन्होंने दस हजार वर्षों तक सरस्वती नदी के तट पर तपस्या की। ये भगवान विष्णु की आराधना करने लगे। भगवान विष्णु प्रकट हो गए। इन्होंने भगवान की इस तरह से स्तुति की —

 

आज आपका दर्शन पाकर हमें नेत्रों का फल मिल गया। आपके चरणकमल भवसागर से पार जाने के लिये जहाज हैं। जिनकी बुद्धि आपकी माया से मारी गयी है, वे ही उन तुच्छ क्षणिक विषय-सुखों के लिये, जो नरक में भी मिल सकते हैं उन चरणों का आश्रय लेते हैं; किन्तु स्वामिन्! आप तो उन्हें वे विषय-भोग भी दे देते हैं । प्रभो! आप कल्पवृक्ष हैं। आपके चरण समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाले हैं। मैं गृहस्थ धर्म के पालन में सहायक शीलवती कन्या से विवाह करने के लिये आपके चरणकमलों की शरण में आया हूँ।

 

 

श्रीभगवान् ने कहा—तुमने आत्म संयमादि के द्वारा मेरी आराधना की है, तुम्हारे हृदय के उस भाव को जानकर मैंने पहले से ही उसकी व्यवस्था कर दी है ।

 

स्वायम्भुव मनु अपनी धर्म पत्नी महारानी शतरूपा के साथ तुमसे मिलने के लिये परसों यहाँ आयेंगे। उनकी एक कन्या इस समय विवाह के योग्य है। तुम सर्वथा उसके योग्य हो, इसलिये वे तुम्हीं को वह कन्या अर्पण करेंगे।

 

गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए नौ कन्याएँ उत्पन्न होंगी। उसके बाद मैं कपिल रूप में अपने अंश-कलारूप से तुम्हारी पत्नी देवहूति के गर्भ में अवतीर्ण होकर सांख्य शास्त्र की रचना करूँगा। ऐसा कहकर भगवान अपने लोक को चले गए।

 

Devahuti and Kardama Vivah(Marriage) : देवहुति और कर्दम जी का विवाह 

श्रीहरि के चले जाने पर  कर्दम जी उनके बताये हुए समय की प्रतीक्षा करते हुए बिन्दु-सरोवर पर ही ठहरे रहे। जैसा भगवान ने कहा था वैसा ही हुआ। मनु और शतरूपा जी आये हैं। मनु जी कहते हैं- यह मेरी कन्या—जो प्रियव्रत और उत्तानपाद की बहिन है—अवस्था, शील और गुण आदि में अपने योग्य पति को पाने की इच्छा रखती है। मैं बड़ी श्रद्धा से आपको यह कन्या समर्पित करता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये।

 

श्रीकर्दम मुनि ने मनु जी को कहा – ठीक है, मैं विवाह करना चाहता हूँ और आपकी कन्या भी हर प्रकार से सुयोग्य है लेकिन मेरी एक शर्त है।

 

जब तक इसके संतान न हो जायगी, तब तक मैं गृहस्थ-धर्मानुसार इसके साथ रहूँगा। उसके बाद भगवान् के बताये हुए संन्यास धर्म का पालन करूँगा।

 

मनुजी ने देखा कि इस सम्बन्ध में महारानी शतरूपा और राजकुमारी की स्पष्ट अनुमित है, अतः उन्होंने अनके गुणों में सम्पन्न कर्दमजी को उन्हीं के समान गुणवती कन्या का प्रसन्नतापूर्वक दान कर दिया।

 

इन दोनों का सर्वश्रेष्ठ बाह्य विधि से विवाह हुआ। महारानी शतरूपा ने भी बेटी और दामाद को बड़े प्रेमपूर्वक बहुत से बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और गृहस्थोचित पात्रादि दहेज़ में दिये। इस प्रकार सुयोग्य वर को अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गये। और वहां से विदा ली।

 

माता-पिता के चले जाने पर पति के अभिप्राय को समझ लेने में कुशल साध्वी देवहूति कर्दमजी की प्रतिदिन प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी, ठीक उसी तरह, जैसे श्रीपार्वतीजी भगवान् शंकर की सेवा करती हैं।

 

एक दिन कर्दम जी कहते हैं- मनुनन्दिनी! तुमने मेरा बड़ा आदर किया है। मैं तुम्हारी उत्तम सेवा और परम भक्ति से बहुत सन्तुष्ट हूँ। अपने धर्म का पालन करते रहने से मुझे तप, समाधि, उपासना और योग के द्वारा जो भय और शोक से रहित भगवत्प्रसाद-स्वरूप विभूतियाँ प्राप्त हुईं हैं, उन पर मेरी सेवा के प्रभाव से अब तुम्हारा भी अधिकार हो गया है। मैं तुम्हें दिव्य-दृष्टि प्रदान करता हूँ, उसके द्वारा तुम उन्हें देखो । अन्य जितने भी भोग हैं, वे तो भगवान् श्रीहरि के भ्रुकुटि-विलासमात्र से नष्ट हो जाते हैं; अतः वे इनके आगे कुछ भी नहीं है। तुम मेरी सेवा से भी कृतार्थ हो गयी हो; अपने पातिव्रत-धर्म का पालन करने से तुम्हें ये दिव्य भोग प्राप्त हो गये हैं, तुम इन्हें भोग सकती हो। हम राजा हैं, हमें सब कुछ सुलभ है, इस प्रकार जो अभिमान आदि विकार हैं, उनके रहते हुए मनुष्यों को इन दिव्य भोगों की प्राप्ति होनी कठिन है ।

 

 

देवहूति ने कहा—द्विजश्रेष्ठ! स्वामिन्!  मैंने जानती हूँ की आपको ये सब ऐश्वर्य प्राप्त हैं। किन्तु प्रभो! आपने विवाह के समय जो प्रतिज्ञा की थी कि गर्भाधान होने तक मैं तुम्हारे साथ गृहस्थ-सुख का उपभोग करूँगा, उसकी अब पूर्ति होनी चाहिये। क्योंकि श्रेष्ठ पति के द्वारा सन्तान प्राप्त होना पतिव्रता स्त्री के लिये महान् लाभ है ।

 

 

कर्दम मुनि ने अपनी प्रिया की इच्छा पूर्ण करने के लिये उसी समय योग में स्थित होकर एक विमान रचा, जो इच्छानुसार सर्वत्र जा सकता था। यह विमान सब प्रकार के इच्छित भोग-सुख प्रदान करने वाला था। ऐसे सुन्दर घर(विमान) को भी जब देवहूति ने बहुत प्रसन्न चित्त से नहीं देखा तो कर्दमजी ने स्वयं ही कहा— । ‘भीरु! तुम इस बिन्दुसरोवर में स्नान करके विमान पर चढ़ जाओ; यह विष्णु भगवान् का रचा हुआ तीर्थ मनुष्यों को सभी कामनाओं की प्राप्ति कराने वाला है’।

 

अपने पति की बात मानकर देवहुति जी ने सरस्वती के पवित्र जल में स्नान किया और स्नान करते ही उनकी देह निर्मल और कान्तिमान् हो गई।

 

जब कर्दमजी ने देखा कि देवहूति का शरीर स्नान करने से अत्यन्त निर्मल हो गया है, और विवाह काल से पूर्व उसका जैसा रूप था, उसी रूप को पाकर वह अपूर्व शोभा से सम्पन्न हो गयी है। तब उस श्रेष्ठ विमान पर दोनों ने सैकड़ों वर्षों तक विहार किया हैं। और जैसा भगवान ने कहा था वैसा ही हुआ। देवहूति के एक ही साथ नौ कन्याएँ पैदा हुए। कन्या होने के बाद कर्दम जी वन की ओर जाने लगे क्योंकि इन्होंने कहा था की संतान उत्पति के बाद मैं सन्यास धारण कर लूंगा।

 

देवहूति ने कहा—भगवन्! आपने जो कुछ प्रतिज्ञा की थी, वह सब तो पुर्णतः निभा दी; तो भी मैं आपकी शरणागत हूँ, अतः आप मुझे अभयदान और दीजिये॥ इन कन्याओं के लिये योग्य वर खोजने पड़ेंगे और आपके वन को चले जाने के बाद मेरे जन्म-मरण रूप शोक को दूर करने के लिये भी कोई होना चाहिये। आप कृपा करके मुझे एक पुत्र और प्रदान कीजिये।

 

देवहुति के इस प्रकार कहने पर कर्दम मुनि को भगवान् विष्णु के कथन का स्मरण हो आया और उन्होंने उससे कहा । दोषरहित राजकुमारी! तुम अपने विषय में इस प्रकार का खेद न करो; तुम्हारे गर्भ में अविनाशी भगवान् विष्णु शीघ्र ही पधारेंगे। श्रीहरि तुम्हारे गर्भ से अवतीर्ण होकर मेरा यश बढ़ावेंगे और ब्रम्हज्ञान का उपदेश करके तुम्हारे हृदय की अहंकारमयी ग्रन्थि का छेदन करेंगे ।

 

इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर भगवान् ने देवहुति के गर्भ से इस प्रकार प्रकट हुए, जैसे लकड़ी में से अग्नि। हर जगह आनंद ही आनंद छा गया। आकाश से देवताओं ने दिव्य पुष्पों की वर्षा की। ब्रम्हाजी को यह मालूम हो गया था कि साक्षात् परब्रम्ह भगवान् विष्णु सांख्यशास्त्र का उपदेश करने के लिये अपने विशुद्ध सत्वमय अंश से अवतीर्ण हुए हैं।

 

श्रीब्रम्हाजी ने कहा—प्रिय कर्दम! तुम दूसरों को मान देने वाले दो। तुमने मेरा सम्मान करते हुए जो मेरी आज्ञा का पालन किया है। बेटा! तुम सभ्य हो, तुम्हारी ये सुन्दरी कन्याएँ अपने वंशों द्वारा इस सृष्टि को अनेक प्रकार से बढावेगी। और भगवान विष्णु तुम्हारे पुत्र के रूप में धरा पर आये हैं। वे अविद्याजनित मोह की ग्रन्थियों को काटकर पृथ्वी में स्वच्छन्द विचरेंगे । ये सिद्धगणों के स्वामी और सांख्याचार्यो के भी माननीय होंगे। लोक में तेरी कीर्ति का विस्तार करेंगे और ‘कपिल’ नाम से विख्यात होंगे।

 

ब्रम्हाजी के चले जाने पर कर्दमजी ने उनके आज्ञानुसार मरीचि आदि प्रजापतियों के साथ अपनी कन्याओं का विधिपूर्वक विवाह कर दिया।

 

Kapil Bhagwan Updesh to Kardama : कपिल भगवान का कर्दम जी को उपदेश 

 

कर्दमजी ने देखा कि उनके यहाँ साक्षात् श्रीहरि ने अवतार लिया है तो वे एकान्त में उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे – आप वास्तव में अपने भक्तों का मान बढ़ाने वाले हैं। आपने अपने वचनों को सत्य करने और सांख्ययोग का उपदेश करने के लिये ही मेरे यहाँ अवतार लिया है । आप ऐश्वर्य, वैराग्य, यश, ज्ञान, वीर्य और श्री—इन छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं। मैं आपकी शरण में हूँ । आपकी कृपा से मैं तीनों ऋणों से मुक्त हो गया हूँ और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं। अब मैं संन्यास-मार्ग को ग्रहण कर आपका चिन्तन करते हुए शोक रहित होकर विचरूँगा। आप समस्त प्रजाओं के स्वामी हैं; अतएव इसके लिये मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ ।

 

 

श्रीभगवान् ने कहा—मुने! वैदिक और लौकिक सभी कर्मों में संसार के लिये मेरा कथन ही प्रमाण है। इसलिये मैंने जो तुमसे कहा था कि ‘मैं तुम्हारे यहाँ जन्म लूँगा’, उसे सत्य करने के लिये ही मैंने यह अवतार लिया है । मुने! मैं आज्ञा देता हूँ, तुम इच्छानुसार जाओ और अपने सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए दुर्जय मृत्यु को जीतकर मोक्षपद प्राप्त करने के लिये मेरा भजन करो । मैं स्वयंप्रकाश और सम्पूर्ण जीवों के अन्तःकरणों में रहने वाला परमात्मा हूँ। अतः जब तुम विशुद्ध बुद्धि के द्वारा अपने अन्तःकरण में मेरा साक्षात्कार कर लोगे तब सब प्रकार के शोकों से छूटकर निर्भय पद (मोक्ष) प्राप्त कर लोगे । माता देवहूति को भी मैं सम्पूर्ण कर्मों से छुड़ाने वाला आत्मज्ञान प्रदान करूँगा जिससे यह संसार रूप भय से पार हो जायगी ।

 

 

भगवान् कपिल के इस प्रकार कहने पर प्रजापति कर्दमजी उनकी परिक्रमा कर प्रसन्नतापूर्वक वन को चले गये। और सब प्रकार की कामना को छोड़कर मन, बुद्धि और चित को भगवान में लगा दिया और  भगवान के धाम को प्राप्त किया।

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