kak bhusundi purva janam and rishi lomash Story

kak bhusundi purva janam and rishi lomash Story

काकभुशुण्डि पूर्वजन्म और ऋषि लोमश कथा

आपने पढ़ा की गरुड़ जी काकभुशुण्डि जी के पास आये हैं और उनका मोह दूर हुआ है। अब काकभुशुण्डिजी अपने पूर्वजन्म की कथा सुना रहे हैं। काकभुसुण्डि जी गरुड़ जी से कहते हैं- अब मैं अपने प्रथम जन्म के चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभु के चरणों में प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं॥ पूर्व के एक कल्प में पापों का मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपारायण और वेद के विरोधी थे॥

उस कलियुग में मैं अयोध्यापुरी में जाकर शूद्र का शरीर पाकर जन्मा। मैं मन, वचन और कर्म से शिवजी का सेवक और दूसरे देवताओं की निंदा करने वाला अभिमानी था॥ मैं धन के मद में मतवाला, कुछ भी बोलने वाला और उग्रबुद्धि वाला था, मेरे ह्रदय में अभिमान था। रहता तो मैं रामजी की राजधानी में था लेकिन मैंने उनकी कुछ महिमा नही जानी। लेकिन अब जान गया हूँ। 

उस कलिकाल में मैं बहुत वर्षों तक अयोध्या में रहा। एक बार वहाँ अकाल पड़ा, तब मैं विपत्ति का मारा विदेश चला गया॥ मैं दीन, मलिन (उदास), दरिद्र और दुःखी होकर उज्जैन गया। कुछ काल बीतने पर कुछ संपत्ति पाकर फिर मैं वहीं भगवान्‌ शंकर की आराधना करने लगा॥

वहां पर एक ब्राह्मण वेदविधि से सदा शिवजी की पूजा करते, उन्हें दूसरा कोई काम न था। वे परम साधु और परमार्थ के ज्ञाता थे, वे शंभु के उपासक थे, पर श्री हरि की निंदा करने वाले न थे॥ मैं कपटपूर्वक उनकी सेवा करता। ब्राह्मण बड़े ही दयालु और नीति के घर थे। हे स्वामी! बाहर से नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्र की भाँति मानकर पढ़ाते थे॥ उन ब्राह्मण श्रेष्ठ ने मुझको शिवजी का मंत्र दिया और अनेकों प्रकार के शुभ उपदेश किए। मैं शिवजी के मंदिर में जाकर मंत्र जपता। मेरे हृदय में दंभ और अहंकार बढ़ गया॥ मैं दुष्ट, नीच जाति और पापमयी मलिन बुद्धि वाला मोहवश श्री हरि के भक्तों और द्विजों को देखते ही जल उठता और विष्णु भगवान्‌ से द्रोह करता था॥

गुरुजी मेरे आचरण देखकर दुखी थे। वे मुझे बहुत समझते थे पर मैं कुछ नही समझता था। एक बार गुरुजी ने मुझे बुलाया और कहा- हे पुत्र! शिवजी की सेवा का फल यही है कि श्री रामजी के चरणों में प्रगाढ़ भक्ति हो॥ सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई॥

शिवजी और ब्रह्माजी भी श्री रामजी को भजते हैं (फिर) नीच मनुष्य की तो बात ही कितनी है?ब्रह्माजी और शिवजी जिनके चरणों के प्रेमी हैं, अरे अभागे! उनसे द्रोह करके तू सुख चाहता है?

जब गुरूजी ने शिवजी को हरि का सेवक कहा तो मेरा ह्रदय जल गया। नीच जाति का मैं विद्या पाकर ऐसा हो गया जैसे दूध पिलाने से साँप॥  फिर मैं अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति दिन-रात गुरुजी से द्रोह करता।

लेकिन गुरूजी इतने कृपालु थे मेरे द्रोह करने पर भी वो मुझसे प्रेम करते थे और मुझे अच्छी शिक्षा देते थे।

Shiv Shrap(curse) to Kak bhusundi : काकभुसुण्डि को शिव का शाप(श्राप) 

एक दिन मैं शिवजी के मंदिर में शिवनाम जप रहा था। उसी समय गुरुजी वहाँ आए, पर अभिमान के मारे मैंने उठकर उनको प्रणाम नहीं किया॥ गुरुदेव ने इस अपमान के बदले मुझे कुछ भी नहीं कहा लेकिन महादेव ये अपमान सहन नही कर सके।

मंदिर में आकाशवाणी हुई कि अरे मूर्ख! अभिमानी! तेरे गुरुदेव तुझ पर क्रोधित नही हैं क्योंकि वे अत्यंत कृपालु चित्त के हैं और उन्हें (पूर्ण तथा) यथार्थ ज्ञान है।

तो भी हे मूर्ख! तुझको मैं शाप दूँगा, जो मूर्ख गुरु से ईर्षा करते हैं, वे करोड़ों युगों तक रौरव नरक में पड़े रहते हैं। अरे पापी! तू गुरु के सामने अजगर की भाँति बैठा रहा। रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पाप से ढँक गई है, (अतः) तू सर्प हो जा और अरे अधम से भी अधम! इस अधोगति (सर्प की नीची योनि) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़ के खोखले में जाकर रह॥

शिवजी का भयानक शाप सुनकर गुरुजी ने हाहाकार किया। प्रेम सहित दण्डवत्‌ करके वे ब्राह्मण श्री शिवजी के सामने हाथ जोड़कर मेरी भयंकर गति (दण्ड) का विचार कर गदगद वाणी से विनती और स्तुति करने लगे-हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्री शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूँ। सबके नाथ (कल्याण करने वाले) श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ॥ हे प्रभो! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए॥ मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। 

जब शिवजी ने विनती सुनी और ब्राह्मण का प्रेम देखा। तब मंदिर में आकाशवाणी हुई कि हे द्विजश्रेष्ठ! वर माँगो॥

ब्राह्मण ने कहा- हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो पहले अपने चरणों की भक्ति देकर फिर दूसरा वर दीजिए॥ यह अज्ञानी जीव आपकी माया के वश होकर निरंतर भूला फिरता है। हे कृपा के समुद्र भगवान्‌! उस पर क्रोध न कीजिए॥ हे नाथ! हे दीनों पर दया करने वाले (कल्याणकारी) शंकर! कुछ ऐसा कीजिये जिससे थोड़े ही समय में इस पर शाप के बाद अनुग्रह (शाप से मुक्ति) हो जाए॥ हे कृपानिधान! अब वही कीजिए, जिससे इसका परम कल्याण हो।

ब्राह्मण की वाणी सुनकर फिर आकाशवाणी हुई- ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो)। यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी इसे क्रोध करके शाप दिया है, तो भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इस पर विशेष कृपा करूँगा॥ जो क्षमाशील एवं परोपकारी होते हैं, वे मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि श्री रामचंद्रजी। मेरा शाप व्यर्थ नहीं जाएगा। यह हजार जन्म अवश्य पाएगा॥ परंतु जन्मने और मरने में जो दुःसह दुःख होता है, इसको वह दुःख जरा भी न व्यापेगा और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा।

हे शूद्र! सत्य वचन सुन॥ प्रथम तो तेरा जन्म श्री रघुनाथजी की पुरी में हुआ। फिर तूने मेरी सेवा में मन लगाया। पुरी के प्रभाव और मेरी कृपा से तेरे हृदय में रामभक्ति उत्पन्न होगी॥

हे भाई! अब मेरा सत्य वचन सुन। द्विजों की सेवा ही भगवान्‌ को प्रसन्न करने वाला व्रत है। अब कभी ब्राह्मण का अपमान न करना। संतों को अनंत श्री भगवान्‌ ही के समान जानना॥ इंद्र के वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, काल के दंड और श्री हरि के विकराल चक्र के मारे भी जो नहीं मरता, वह भी विप्रद्रोह रूपी अग्नि से भस्म हो जाता है॥ ऐसा विवेक मन में रखना। फिर तुम्हारे लिए जगत्‌ में कुछ भी दुर्लभ न होगा।

मेरा एक और भी आशीर्वाद है कि तुम जहाँ जाना चाहोगे, वहीं बिना रोक-टोक के जा सकोगे॥

आकाशवाणी के द्वारा) शिवजी के वचन सुनकर गुरुजी हर्षित होकर ‘ऐसा ही हो’ यह कहकर मुझे बहुत समझाकर और शिवजी के चरणों को हृदय में रखकर अपने घर गए॥

उसके बाद काल की प्रेरणा से मैं विन्ध्याचल में जाकर सर्प बना। फिर कुछ काल बीतने पर बिना ही परिश्रम (कष्ट) के मैंने वह शरीर त्याग दिया।

मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहिन लेता है॥  शिवजी ने वेद की मर्यादा की रक्षा की और मैंने क्लेश भी नहीं पाया। इस प्रकार हे पक्षीराज! मैंने बहुत से शरीर धारण किए, पर मेरा ज्ञान नहीं गया॥

तिर्यक्‌ योनि (पशु-पक्षी), देवता या मनुष्य का, जो भी शरीर धारण करता, वहाँ-वहाँ (उस-उस शरीर में) मैं श्री रामजी का भजन जारी रखता। (इस प्रकार मैं सुखी हो गया) लेकिन एक बात मेरी ह्रदय में कांटे की तरह चुभ रही थी की गुरुजी का कोमल, सुशील स्वभाव मुझे कभी नहीं भूलता (अर्थात्‌ मैंने ऐसे कोमल स्वभाव दयालु गुरु का अपमान किया, यह दुःख मुझे सदा बना रहा।

मैंने अंतिम शरीर ब्राह्मण का पाया, जिसे पुराण और वेद देवताओं को भी दुर्लभ बताते हैं। मैं वहाँ (ब्राह्मण शरीर में) भी बालकों में मिलकर खेलता तो श्री रघुनाथजी की ही सब लीलाएँ किया करता॥ सयाना होने पर पिताजी मुझे पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता और विचारता, पर मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। मेरे मन से सारी वासनाएँ भाग गईं। केवल श्री रामजी के चरणों में लव लग गई॥

हे गरुड़जी! कहिए, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनु को छोड़कर गदही की सेवा करेगा?

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14 thoughts on “kak bhusundi purva janam and rishi lomash Story

  1. mujhe ye batane kikripa ki jaye ki kagbhsundi ji ke guru ji kya nam tha jinhone bhagvan shiv ki ashtuti ” namami shamishan nirvana roopan ……..” ki . yadi ye bataya gaya to main dhanya ho jaunga .
    dhanyavad………

    • Jai Siya Ram…
      Manas me or Adhyatam ramayan me sirf brahman shabd milta hai ya phir guru.. koi naam nhi milta hai. Agar kabhi bhagwan ne kripa ki to aapko jarur btauga.
      aapka bhi bahut bahut dhanywad

  2. mai yeh katha padhkar prabhu shree ram ke
    charno mein leen ho gaya…dhnya hai vo jinhone ye katha batayi jai shree ram jai kakbhusundi

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