Kak Bhusundi katha(story) in hindi

 

kak bhusundi and Garuda story : काकभुशुण्डि और गरुड़जी कथा 

अब वह कथा सुनो जिस कारण से पक्ष‍ी कुल के ध्वजा गरुड़जी उस काग के पास गए थे॥ जिस समय युद्ध में श्री रघुनाथजी ने मेघनाद के हाथों अपने को बँधा लिया, तब नारद मुनि ने गरुड़ को भेजा॥ सर्पों के भक्षक गरुड़जी बंधन काटकर गए, तब उनके हृदय में बड़ा भारी विषाद उत्पन्न हुआ। ये कैसे भगवान राम हैं की एक नागपाश से अपनी रक्षा नही कर सके? जिनका नाम जपकर मनुष्य संसार के बंधन से छूट जाते हैं, उन्हीं राम को एक तुच्छ राक्षस ने नागपाश से बाँध लिया॥ गरुड़जी ने अनेकों प्रकार से अपने मन को समझाया। पर उन्हें ज्ञान नहीं हुआ संदेहजनित) दुःख से दुःखी होकर, मन में कुतर्क बढ़ाकर वे तुम्हारी ही भाँति मोहवश हो गए॥

दुखी होकर वे देवर्षि नारदजी के पास गए। नारदजी ने कहा-  हे गरुड़! सुनिए! श्री रामजी की माया बड़ी ही बलवती है॥ जिसने मुझको भी बहुत बार नचाया है, हे पक्षीराज! वही माया आपको भी व्याप गई है॥ जो मेरे समझाने से भी दूर नही होगी। इसलिए आप ब्रह्मा जी के पास जाइये।

तब पक्षीराज गरुड़ ब्रह्माजी के पास गए और अपना संदेह उन्हें कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माजी ने श्री रामचंद्रजी को सिर नवाया और ब्रह्मा ने सोचा जब सभी माया से नाच सकते है यहाँ तक की मैं भी, तब गरुड़ को मोह होना कोई आश्चर्य (की बात) नहीं है। ब्रह्मा जी बोले- हे गरुड़! तुम शंकरजी के पास जाओ। और किसी के पास मत जाना।

 

तब बड़ी आतुरता (उतावली) से पक्षीराज गरुड़ मेरे पास आए।  हे उमा! उस समय मैं कुबेर के घर जा रहा था और तुम कैलास पर थीं॥

गरुण ने भगवान से विनती की- आप मेरे मोह को दूर कीजिये।

भोले नाथ बोले हे गरुड़! तुम मुझे रास्ते में मिले हो। राह चलते मैं तुम्हे किस प्रकार समझाऊँ?

सब संदेहों का तो तभी नाश हो जब दीर्घ काल तक सत्संग किया जाए॥ तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥

हे भाई! जहाँ प्रतिदिन हरिकथा होती है, तुमको मैं वहीं भेजता हूँ, तुम जाकर उसे सुनो। उसे सुनते ही तुम्हारा सब संदेह दूर हो जाएगा और तुम्हें श्री रामजी के चरणों में अत्यंत प्रेम होगा॥

 

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥ क्योंकि सत्संग के बिना हरि की कथा सुनने को नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह के गए बिना श्री रामचंद्रजी के चरणों में दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता॥

तुम सत्संग के लिए वहाँ जाओ जहाँ उत्तर दिशा में एक सुंदर नील पर्वत है। वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं॥ उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुण्डि सुसीला॥

राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना॥ वे रामभक्ति के मार्ग में परम प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणों के धाम हैं और बहुत काल के हैं।

वे निरंतर श्री रामचंद्रजी की कथा कहते रहते हैं, वहाँ जाकर श्री हरि के गुण समूहों को सुनो। उनके सुनने से मोह से उत्पन्न तुम्हारा दुःख दूर हो जाएगा।

 

भगवान शिव कहते हैं- मैं चाहता तो गरुण का मोह दूर कर सकता था लेकिन उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसको कृपानिधान श्री रामजी नष्ट करना चाहते हैं। फिर कुछ इस कारण भी मैंने उसको अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षी की ही बोली समझते हैं। शिव जी कहते हैं – भगवान की माया जब शिवजी और ब्रह्माजी को भी मोह लेती है, तब दूसरा बेचारा क्या चीज है?

 

अब गरुण जी वहां गए जहाँ काकभुशुण्डि बसते थे। उस पर्वत को देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और (उसके दर्शन से ही) सब माया, मोह तथा सोच जाता रहा॥

तालाब में स्नान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्त से वटवृक्ष के नीचे गए। वहाँ श्री रामजी के सुंदर चरित्र सुनने के लिए बूढ़े-बूढ़े पक्षी आए हुए थे॥ भुशुण्डिजी कथा आरंभ करना ही चाहते थे कि उसी समय पक्षीराज गरुड़जी वहाँ जा पहुँचे। उन्होंने पक्षीराज गरुड़जी का बहुत ही आदर-सत्कार किया।

 

फिर प्रेम सहित पूजा कर के कागभुशुण्डिजी बोले-  हे पक्षीराज ! आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया। आप किस कार्य के लिए आए हैं?

पक्षीराज गरुड़जी ने कहा- हे नाथ! सुनिए, मैं जिस कारण से आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया। फिर आपके दर्शन भी प्राप्त हो गए। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह संदेह और अनेक प्रकार के भ्रम सब जाते रहे॥

आप मुझे श्री रामजी की अत्यंत पवित्र करने वाली, सदा सुख देने वाली और दुःख समूह का नाश करने वाली कथा सादर सहित सुनाएँ। हे प्रभो! मैं बार-बार आप से यही विनती करता हूँ॥ बार बार बिनवउँ प्रभु तोही॥

 

गरुड़जी की विनम्र, सरल, सुंदर और प्रेमयुक्त वाणी सुनते ही भुशण्डिजी के मन में परम उत्साह हुआ और वे श्री रघुनाथजी के गुणों की कथा कहने लगे॥

हे भवानी! उन्होंने बड़े ही प्रेम से रामजी के सब उज्ज्वल चरित्र काकभुशुण्डिजी ने विस्तारपूर्वक वर्णन किए। भुशुण्डिजी ने वह सब कथा कही जो हे भवानी! मैंने तुमसे कही।

सारी रामकथा सुनकर गरुड़जी आनंदित होकर वचन कहने लगे- श्री रघुनाथजी के सब चरित्र मैंने सुने, जिससे मेरा संदेह जाता रहा। हे काकशिरोमणि! आपके अनुग्रह से श्री रामजी के चरणों में मेरा प्रेम हो गया॥ युद्ध में प्रभु का नागपाश से बंधन देखकर मुझे अत्यंत मोह हो गया था। अब सब मोह जाता रहा।

 

हे तात! यदि मुझे अत्यंत मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता? सच्चे संत उसी को मिलते हैं, जिसे श्री रामजी कृपा करके देखते हैं। श्री रामजी की कृपा से मुझे आपके दर्शन हुए और आपकी कृपा से मेरा संदेह चला गया॥

 

पक्षीराज गरुड़जी की विनय और प्रेमयुक्त वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजी का शरीर पुलकित हो गया, उनके नेत्रों में जल भर आया और वे मन में अत्यंत हर्षित हुए॥ काकभुशुण्डिजी ने फिर कहा- पक्षीराज पर उनका प्रेम कम न था। आप सब प्रकार से मेरे पूज्य हैं और श्री रघुनाथजी के कृपापात्र हैं॥ हे पक्षीराज! मोह के बहाने श्री रघुनाथजी ने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है॥

जो माया सारे जगत्‌ को नचाती है और जिसका चरित्र (करनी) किसी ने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्री रामचंद्रजी की भृकुटी के इशारे पर अपने समाज (परिवार) सहित नटी की तरह नाचती है॥ भगवान्‌ प्रभु श्री रामचंद्रजी ने भक्तों के लिए राजा का शरीर धारण किया और साधारण मनुष्यों के से अनेकों परम पावन चरित्र किए॥ हे गरुड़जी! ऐसी ही श्री रघुनाथजी की यह लीला है, जो राक्षसों को विशेष मोहित करने वाली और भक्तों को सुख देने वाली है। हे स्वामी! जो मनुष्य मलिन बुद्धि, विषयों के वश और कामी हैं, वे ही प्रभु पर इस प्रकार मोह का आरोप करते हैं॥ जो काम, क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दुःख रूप घर में आसक्त हैं, वे श्री रघुनाथजी को कैसे जान सकते हैं?

 

हे पक्षीराज गरुड़जी! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ॥ श्री रामचंद्रजी का सहज स्वभाव सुनिए। वे भक्त में अभिमान कभी नहीं रहने देते। हे गरुड़जी! श्री रामजी की कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिए।

 

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