गणेश-कार्तिकेय शिव-पार्वती परिक्रमा कथा/कहानी

Ganesha Birth Story/Katha in hindi

Ganesha Birth Story/Katha in hindi

गणेश जी की जन्म कहानी/कथा

 

एक बार की बात है। भगवान शिव कहीं पर गए हुए थे। माँ पार्वती कैलाश पर अकेली थी। तब उन्होंने अपने शरीर के मैल और उबटन से एक बालक का निर्माण किया और उसमें प्राण डाल दिए। इस बालक को माता पार्वती ने कहा कि आज से तुम मेरे पुत्र हो। इस प्रकार माता पार्वती ने गणेश को जन्म नहीं दिया बल्कि उसके शरीर की रचना की। उस समय बालक का मुख सामान्य था।

 

माता पार्वती ने कहा, पुत्र! मैं स्नान करने जा रही हूँ। तुम किसी को भी अंदर मत आने देना। ये मेरी आज्ञा है और तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना। ऐसा कहकर माँ पार्वती स्नान करने चली गई और गणेश जी द्वार पर खड़े रहकर पहरा देने लगे।

 

थोड़ी देर में भगवान शिव वहां पर आये और अंदर जाने लगे। उस बालक ने भगवान शिव को अंदर आने से मन कर दिया। बालक ने कहा, “अंदर मेरी माता स्नान कर रही है।” जब तक मेरी माँ स्नान नहीं कर लेती आपको अंदर नहीं जाने दूँगा, क्योंकि ये मेरी माँ की आज्ञा है।

 

भगवान शिव ने बहुत समझाया। कि तुम कौन हो पुत्र, और मुझे अंदर आने से मना कैसे कर सकते हो। लेकिन वो बालक नहीं मना और ज़िद्द पर अड़ गया कि मेरी माँ की आज्ञा मेरे लिए सर्वोपरि है। भगवान शिव ने थोड़ा क्रोध में आकर कहा, पुत्र! मुझे प्रवेश करने दो।” लेकिन गणेश ने प्रवेश नहीं करने दिया।
अब भगवान शिव कहते हैं बालक, तुमने मेरी आज्ञा का निरादर किया है। तुम्हे इसका दंड मैं जरूर दूंगा। भगवान शिव ने त्रिशूल गणेश जी पर फेंका और गणेश जी का सर धड़ से अलग हो गया। गणेश जी भूमि पर गिर पड़े, एकदम मरणासन्न हो गए।

 

इधर पार्वती जी स्नान करके आई तो गणेश जी को मृत अवस्था में पाया और क्रोधित हो गई। किसने मेरे बालक को मारने की, हत्या करने की चेष्टा की?मेरे सामने आओ। भगवान शिव ने कहा, देवी! ये अपराध तो मुझसे ही हुआ है। मैंने इस बालक को बहुत समझाया कि मुझे अंदर जाने दो लेकिन इस बालक ने मेरी बात नहीं मानी और मैंने क्रोध में आकर त्रिशूल फेंक कर मारा और इसकी ये दशा हो गई।

 

यह सुन देवी पार्वती क्रोधित होकर विलाप करने लगी। उनके क्रोध से पूरा विश्व डर गया। तब वहाँ सभी देवता आ गए और सबने माता पार्वती की स्तुति की और उनको शांत किया। तब पार्वती कहती है मेरे पुत्र को जीवित किया जाये। सबने विचार विमर्श किया। भगवान शिव को अपनी त्रुटि का बोध हुआ। तब भगवान शिव ने अपने त्रिशूल को दोबारा आज्ञा दी। जाओ जो भी जीव, जो भी प्राणी सबसे पहले मिले उसका सिर लेकर आओ। त्रिशूल जी गए और उन्हें एक हाथी के बच्चे का सिर मिला।

वो सिर लेकर उस बालक के ऊपर लगाया गया और वो बालक जीवित हो गया। तबसे उस बालक का नाम गणेश रखा गया। क्योंकि एक हाथी (गज) का सिर लगाया गया।

भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। सभी देवताओं ने उस बालक को प्रथम पूज्य का वरदान दिया। इस तरह श्री गणेश जी महाराज का जन्म हुआ और गणेश जी को प्रथम पूजनीय का वरदान मिला।

बोलिये गणेश जी महाराज की जय!! गणपति बप्पा मोरिया!!

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