Eklavya Story(katha) in hindi

Eklavya Story(katha) in hindi

एकलव्य की कहानी(कथा)

 

एक बार निषादपुत्र एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य जी के पास आया और उनसे धनुर्विद्या सिखने का आग्रह किया। एकलव्य कहते हैं की मेरे पिता निषादराज हिरण्यधनु हैं और मैं आपसे धनुर्विद्या सीखना चाहता हूँ। लेकिन द्रोणाचार्य ने कहा की वे केवल कौरव और पांडवों को शिक्षा देने के लिए नियुक्त हुए हैं। निराश हो कर एकलव्य वन में चला गया। उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एकाग्रचित्त से साधना करते हुये अल्पकाल में ही वह धनु्र्विद्या में अत्यन्त निपुण हो गया।

 
गुरु द्रोणाचार्य जी ने पांडवों और कौरवों को शस्त्र विद्या सीखना शुरू कर दिया था। द्रोणाचार्य जी ने अर्जुन को विश्व का सर्वश्रेठ धनुर्धर बनाने का निश्चय कर लिया था।

 
एक दिन सभी कौरव और पाण्‍डव आचार्य द्रोण की अनुमति से रथों पर बैठकर शिकार खेलने के लिये निकले। उसने साथ में एक कुत्ता भी ले रखा था। वह कुत्ता वन में घूमता-घामता निषाद पुत्र एकलव्‍य पास जा पहुंचा।

 
अनजान एकलव्‍य को देखकर वह कुत्ता भौं-भौं करके भोंकने लगा। जिससे एकलव्य का ध्यान भंग हो गया। उसने कुत्ते के मुँह में एक ही साथ सात बाण मारे। उसका मुंह बाणों से भर गया कुत्ते का मुँह तो बंद था लेकिन उसे चोट कहीं भी नही लगी थी। तीर इस तरह से मारे गए थे कि देखने वाले सब सोचते रह जाएँ।

 

जब कुत्ता भागकर पांडवों और कौरवों के पास आया तो सबके आश्चर्य की सीमा न रही। गुरु द्रोणाचार्य भी देखते रह गए। तब गुरु द्रोण के साथ कौरव और पांडव सभी मिलकर एकलव्य को ढूंढते-ढूंढते उसके पास पहुंचे।

 

Eklavya Guru Dakshina Story in hindi : एकलव्य गुरु दक्षिणा की कहानी

जैसे ही एकलव्य ने द्रोणाचार्य जी को देखा तो पृथ्वी पर माथा टेक कर उन्हें प्रणाम किया। एकलव्य कहते हैं की गुरुदेव मैंने आपसे ही मैंने ये धनुर्विद्या सीखी हैं। और आप ही मेरे गुरु हैं।
द्रोणाचार्य जी कहते हैं- मैंने तुम्हे कोई धनुर्विद्या नही सिखाई, तब मैं किस प्रकार तुम्हारा गुरु बना?
एकलव्य कहते हैं- गुरुदेव मैंने आपकी एक प्रतिमा बनाई और उसे गुरु मानकर अभ्यास शुरू किया।

 

 

तब द्रोणाचार्य ने एकलव्‍य से यह बात कही- ‘वीर! यदि तुम मेरे शिष्‍य हो तो मुझे गुरुदक्षिणा दो’। यह सुनकर एकलव्‍य बहुत प्रसन्न हुआ और बोला मैं आपको क्‍या दूं, गुरुदेव?

 

 

तब द्रोणाचार्य ने कहा- ‘तुम मुझे दाहिने हाथ का अंगूठा दे दो’।
द्रोणाचार्य जी की बात सुनकर एकलव्‍य ने अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करते हुए खुश होकर और कुछ सोच-विचार अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर द्रोणाचार्य को दे‍ दिया।
द्रोणाचार्य निषादनन्‍दन एकलव्‍य को सत्‍य प्रतिज्ञ देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्‍होंने संकेत से उसे यह बता दिया कि तर्जनी और मध्‍यमा के संयोग से बाण पकड़कर किस प्रकार धनुष की डोरी खींचनी चाहिये। तब से वह निषाद कुमार अपनी अंगुलियों द्वारा ही बाणों का संधान करने लगा।

 

 

कुछ लोग शंका करते हैं की द्रोणाचार्य जी गलत थे। लेकिन बिलकुल भी नहीं। जिसके कुछ कारण हैं-
पहला – केवल अंगूठा लेने के कारण तीरंदाजी करने के आधुनिक तरीके का जन्म हुआ। आज के समय में कोई भी व्यक्ति उस तरह से तीरंदाजी नहीं करता जैसा कि अर्जुन करता था। क्योंकि गुरु द्रोणाचार्य जी सब जानते थे की भविष्य में एकलव्य का नाम अमर हो जायेगा। अगर वो दान में अंगूठा नही लेते तो एकलव्य को शायद हम कभी नही जान पाते।
दूसरा- मोरारी बापू ने एक बार कथा में कहा था की एक गुरु ने आज अपने आपको छोटा करते हुए अपने शिष्य को महान बना दिया। ऐसे गुरु बिरले ही होते हैं। जो अपने शिष्य को महान बना दें।

 

तीसरा- उन्होंने उस समय अर्जुन को सर्वश्रेठ धनुर्दर बनाने का संकल्प कर लिया था जिसे पूरा करना भी जरुरी था।

 

Read : द्रोणाचार्य की जन्म कथा 

Read : कृष्ण जी की जन्म कथा 

 

 

2 thoughts on “Eklavya Story(katha) in hindi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.