Dronacharya became Guru of Kauravas and Pandavas in hindi

Dronacharya became Guru of Kauravas and Pandavas in hindi

द्रोणाचार्य का कौरव और पांडवों का गुरु बनना 

 

एक बार कौरव और पांडव आपस में खेल रहे थे। उनकी गेंद एक कुँए में गिर गई। सब बच्चे सोचने लगे की गेंद को कैसे निकाला जाये। तभी वहां पर आचार्य द्रोण आये। और उन्होंने बच्चों को सरकंडे लेन के लिए कहा। बच्चे भागकर गए और सरकंडे लेकर आये। द्रोणाचार्य जी ने एक-एक सरकंडे को कुँए में फेंकना शुरू किया। पहला सरकंडा गेंद पर लगा। उसके बाद दूसरा, पहले सरकंडे के पीछे, फिर तीसरा और फिर चौथा। ऐसे करते-करते सरकंडो को एक श्रृंखला बन गई। और द्रोणाचार्य ने सरकंडो के सहारे गेंद को बाहर निकाल दिया।

 

जब सब बच्चे अपने महल हस्तिनापुर पहुचे तो अर्जुन ने ये पूरी बात भीष्म पितामह जी को बताई। भीष्म जी कहते हैं की अर्जुन, ये आचार्य कोई साधारण मानव नही हैं। ये तो साक्षात् गुरु द्रोण हैं। ये ही तुम्हारे गुरुदेव बनेंगे।

 

अब खुद भीष्म जी द्रोणाचार्य जी के पास गए और उनके आने का कारण पूछा।

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द्रोणाचार्य जी कहते हैं- मेरी पत्नी का नाम कृपी है और मेरे पुत्र का नाम अश्वत्‍थामा है। एक बार मेरा बालक दूध पीने के लिए मचल गया और रोने लगा। मैंने सोचा की मैं एक ब्राह्मण हूँ और मैं किसी से गाय मांग लेता हूँ। गांय के लिए मैं काफी घुमा लेकिन मुझे कहीं भी गाय नही मिली। जब लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटे के पानी से अश्‍वत्‍थामा को ललचा रहे हैं और वह आटे के पानी को पीकर खुश होकर कह रहा था मैंने दूध पी लिया। सब बच्चे इस पर हँसते थे और मैं काफी दुखी था।
मैंने सोचा ‘मुझे दरिद्र जानकर पहले से ही ब्राह्मणों ने मेरा साथ छोड़ दिया। मैं धनाभाव के कारण निन्दित होकर उपवास भले ही कर लूंगा, परंतु धन के लोभ से दूसरों की सेवा, जो अत्‍यन्‍त पाप पूर्ण कर्म है, कदापि नहीं कर सकता’।

 

मुझे पता चला कि मेरे मित्र द्रुपद का राज्याभिषेक हो गया है क्यों ना उसके पास जाकर मांगू? ऐसा सोचकर मैं अपने मित्र ध्रुपद के पास गया। लेकिन जब मैं द्रुपद से मिला तो उसने मुझे नीच मनुष्‍य के समान समझकर मेरा उपहास उड़ाया। उसने कहा कि -तुम्‍हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह ( साथ-साथ खेलने और अध्‍ययन करने आदि ) स्‍वार्थ को लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्‍य धनवान् का, मूर्ख विद्वान् का और कायर शूरवीर का सखा नहीं हो सकता; अत: पहले की मित्रता का क्‍या भरोसा करते हो? मैं तुम्हे सिर्फ एक रात के लिये अच्‍छी तरह भोजन दे सकता हूं।’

 

 

राजा द्रुपद के यों कहने पर मैं पत्नी और पुत्र के साथ वहां से चल दिया। चलते समय मैंने एक प्रतिज्ञा की थी, मैं अपने अपमान का बदला जरूर लूंगा। बस अपने मनोरथ को पूरा करने के लिए मैं हस्तिनापुर में आया हूँ।
द्रोणाचार्य के ऐसा कहने पर भीष्म जी ने कहा- कुरुवंश के दरवाजे आपके लिए सदैव खुले हुए हैं। आप यहाँ रहकर यहां रहकर राजकुमारों को धनुर्वेद एवं अस्त्र-शस्त्रों की अच्‍छी शिक्षा दीजिये।

 

इस प्रकार अब गुरु द्रोणाचार्य कौरव और पांडवों को शिक्षा देने लग गए।

 

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