Dhritarashtra Pandu and Vidura Birth Story in hindi

Dhritarashtra Pandu and Vidura Birth Story in hindi

धृतराष्ट्र पाण्डु और विदुर की जन्म कहानी/कथा 

 

विचित्रवीर्य का विवाह अम्बिका और अम्बालिका के साथ हुआ। राजा विचित्रवीर्य ने दोनों पत्नियों के साथ सात वर्षों विहार किया, लेकिन उस असंयम के कारण उन्हें युवावस्‍था में ही राजयक्ष्‍मा(‘टी.बी.’ या ‘क्षय रोग’ ) हो गया। वो ठीक नहीं हो सके और उनकी मृत्यु हो गई।  भीष्‍मजी भाई की मृत्‍यु से चिन्‍ता और शोक में डूब गये।

 

अब सत्यवती ने भीष्म से कहा की वो अम्बिका और अम्बालिका के साथ विवाह कर ले। लेकिन भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण मना कर दिया। लेकिन कुरु वंश को आगे बढ़ाना भी जरुरी था। 

 

सत्यवती ने भीष्म से कहा की तुम जाकर श्री वेद व्यास जी को बुला लाओ। क्योंकि वो मेरे पुत्र हैं और वो जरूर इस संदर्भ में कुछ न कुछ करेंगे।

 

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भीष्म जी वेदव्यास के आश्रम पर गए और उनसे चलने के लिए अनुरोध किया। जब व्यास जी को पता चला की उनकी माता सत्यवती ने उन्हें बुलाया है तो व्‍यासजी वेदमन्‍त्रों का पाठ करते हुए क्षण भर में वहां प्रकट हो गये। अपने पुत्र को दीर्घकाल के बाद देखकर सत्‍यवती की आंखों में स्‍नेह और आनन्‍द के आंसू बहने लगे।

 

अब वेदव्यास जी कहते हैं की माँ, बताइये मैं आपका कौन सा कार्य करूँ?

 

सत्यवती ने कहा की – तुम्‍हारे छोटे भाई(विचित्रवीर्य) की पत्नियां देवकन्‍याओं के समान सुन्‍दर रुप तथा युवावस्‍था से सम्‍पन्न हैं। उनके मन में धर्मत: पुत्र पाने की कामना है। पुत्र ! तुम इसके लिये समर्थ हो, अत: उन दोनों के गर्भ से ऐसी संतानों को जन्‍म दो, जो इस कुल-परम्‍परा की रक्षा तथा वृद्धि के लिये सर्वथा सुयोग्‍य हों’ ।

 

 व्‍यासजी ने कहा- माता सत्‍यवती ! मैं आपकी इच्‍छा के अनुरुप कार्य करूंगा। लेकिन इसके लिए आपकी बहुओं को 1 वर्ष तक विधि पूर्वक व्रत करना होगा।

 

सत्‍यवती ने कहा- बेटा ! ये दोनों रानियां जिस प्रकार शीघ्र गर्भ धारण करें, वह उपाय करो। क्योंकि राज सिंहासन बिना राजा के खाली पड़ा हुआ है।

 

व्‍यासजी बोले- मां ! यदि शीघ्र पुत्र उत्पन्न करना है तो तो उन देवियों के लिये यह उत्तम व्रत आवश्‍यक है कि वे मेरे असुन्‍दर रुप को देखकर शान्‍त रहें, डरें नहीं(क्योंकि व्‍यासजी के शरीर का रंग काला था, उनकी जटाऐं पिंगल वर्ण की ओर आंखें चमक रही थीं तथा दाढी-मूंछ भूरे रंग की दिखाई देती थी)। यदि कौसल्‍या (अम्बिका) मेरे गन्‍ध, रुप, वेष और शरीर को सहन कर ले तो वह आज ही एक उत्तम बालक को अपने गर्भ में पा सकती हैं।

 

सत्यवती ने समझा बुझा कर अम्बिका को वेद व्यास जी के पास भेजा। लेकिन जैसे ही अम्बिका ने व्यास जी को देखा तो अम्बिका ने डर के मारे अपनी दोनों आँखें बंद कर ली।

 

जब व्‍यासजी उसके महल से बाहर निकले, तब माता सत्‍यवती ने आकर उनसे पूछा- ‘बेटा ! क्‍या अम्बिका के गर्भ से कोई गुणवान् राजकुमार उत्‍पन्न होगा?’

 

 

माता का यह बात सुनकर व्‍यासजी बोले- मां ! वह दस हजार हाथियों के समान बलवान्, विद्वान्, राजर्षियों में श्रेष्ठ, परम सौभाग्‍यशाली, महा पराक्रमी तथा अत्‍यन्‍त बुद्धिमान् होगा। उस महामना के भी सौ पुत्र होंगे। ‘लेकिन  माता के दोष के कारण वह बालक अन्‍धा ही होगा’ क्योंकि अम्बिका ने मेरे रूप से डरकर नेत्र बंद कर लिए थे।

 

माता सत्यवती ने कहा की – कुरुवंश का राजा अन्‍धा हो यह उचित नहीं है। अत: कुरुवंश के लिये दूसरा राजा दो।

 

फिर सत्यवती ने अम्बालिका को समझा बुझा कर वेदव्यास जी के पास भेजा लेकिन शर्त वही थी की वेदव्यास जी के रूप को देखकर वह डरे नहीं। जब अम्बालिका व्यास जी के पास पहुंची तो महर्षि व्‍यास को देखकर वह भी कान्तिहीन तथा पाण्‍डुवर्ण की-सी हो गयी।

 

उसे डरा हुआ और पाण्‍डुवर्ण(पीले) की-सी देख सत्‍यवती नन्‍दन व्‍यास ने यों कहा- ‘अम्‍बालिके ! म मुझे विरुप देखकर पाण्‍डु वर्ण की-सी हो गयी थीं, इसलिये तुम्‍हारा यह पुत्र पाण्‍डु रंग का ही होगा। इस बालक का नाम भी संसार में ‘पाण्‍डु’ ही होगा।’ ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् व्‍यास वहां से निकल गये।

 

 

उस महल से निकलने पर सत्‍यवती ने अपने पुत्र से उसके विषय में पूछा। तब व्‍यासजी ने भी माता से उस बालक के पाण्‍डु वर्ण होने की बात बता दी। उसके बाद सत्‍यवती ने पुन: एक दूसरे पुत्र के लिये उनसे याचना की। महर्षि ‘बहुत अच्‍छा’ कहकर माता की आज्ञा स्‍वीकार कर ली।

 

 

अब माता सत्यवती ने बड़ी रानी अम्बिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। लेकिन डर के कारण इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी बिना किसी संकोच और डर के वेदव्यास के सामने से गुजरी।   इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा, “माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।” इतना कह कर वेदव्यास तपस्या करने चले गये।

 

समय आने पर अम्बिका के गर्भ से जन्मांध धृतराष्ट्र(Dhritarashtra), अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु(Pandu) तथा दासी के गर्भ से धर्मात्मा विदुर(Vidura) का जन्म हुआ।

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