Bhishma Pitamah Pratigya Story in hindi

Bhishma Pitamah Pratigya Story in hindi 

भीष्म पितामह जी की प्रतिज्ञा कहानी/कथा 

 

देवी गंगा ने देवव्रत(भीष्म) को शांतनु जी को सोंप दिया और अन्‍तर्धान हो गयीं। शांतनु देवव्रत के साथ अपनी राजधानी हस्तिनापुर आ गए। देवव्रत बचपन से ही बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने अपने पराक्रम से सम्पूर्ण राष्ट्र को प्रसन्न कर लिया। राजा शान्‍तनु ने अपने गुणवान् पुत्र के साथ आनन्‍द पूर्वक रहते हुए चार वर्ष व्‍यतीत किये। एक दिन शांतनु  यमुना नदी के निकटवर्ती वन में गये। वहां पर एक सुंदर स्त्री को देखा और पूछा- ” तू कौन है, किसी पुत्री है और क्‍या करना चाहती है?’

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वह स्त्री बोली – मैं निषाद कन्‍या हूं और अपने पिता महामना निषादराज की आज्ञा से धर्मार्थ नाव चलाती हूं।’

 

राजा शांतनु उस पर इतने आशक्त हो गए की वो इस स्त्री के पिता के पास गए और वे कहने लगे- ‘मैं अपने लिये तुम्‍हारी कन्‍या चाहता हूं। ‘यह सुनकर निषादराज ने राजा शान्‍तनु को यह उत्तर दिया-

 

निषाद ने कहा- ” ठीक है मैं अपनी बेटी का विवाह तुमसे करवा दूंगा लेकिन एक शर्त है।

 

राजा ने पूछा-क्या शर्त है? यदि देने योग्‍य होगा, तो दूंगा और देने योग्‍य नहीं होगा, तो कदापि नहीं दे सकता।

 

निषाद बोला- इसके गर्भ से जो पुत्र उत्‍पन्न हो, आपके बाद वो ही राजा बनना चाहिए।

 

राजा शांतनु उस कन्या से विवाह तो करना चाहते थे लेकिन उन्होंने ये वचन नही दिया। अब शांतनु हस्तिनापुर लौट आये और चिंता में पड़े थे।  इसी समय उनके पुत्र देवव्रत अपने पिता के पास आये और बोले- ‘पिताजी ! आपका तो सब ओर से कुशल-मंगल है, पूरा राज्य आपके आधीन है। फि‍र किसलिये आप इतने दुखी होकर चिंता में डूब रहे हैं। 

 

 

शांतनु जी बोले की तुम इस विशाल वंश में मेरे एक ही पुत्र हो। यदि किसी प्रकार तुम पर कोई मुसीबत आयी, तो उसी दिन हमारा यह वंश समाप्त हो जायेगा। इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे लिये सौ पुत्रों से भी बढ़कर हो। ‘मैं पुन: व्‍यर्थ विवाह नहीं करना चाहता; किंतु हमारी वंश परम्‍परा का लोप न हो, इसी के लिये मुझे पुन: पत्नी की कामना हुई है। मैं इस संदेह में पड़ा हूं कि तुम्‍हारे शान्‍त हो जाने पर इस वंश परम्‍परा का निर्वाह कैसे होगा? और यही मेरे दुःख का कारण है।

 

अपने पिता(राजा) के दुःख का कारण जानकर देवव्रत ने अपनी बुद्धि से विचार किया और तुरंत उसी समय अपने पिता के हितैषी बूढ़े मन्‍त्री के पास गये और पिता के शोक का वास्‍तविक कारण क्‍या है, इसके विषय में उनसे पूछ-ताछ की।

 

वृद्ध मन्‍त्री ने बताया कि महाराज एक कन्‍या से विवाह करना चाहते हैं।

 

फिर देवव्रत ने अपने पिता के सारथि से कारण पूछा। क्‍या तुम जानते हो कि महाराज का अनुराग किस स्त्री में है?

 

उसने देवव्रत को सब कुछ बता दिया की एक धीवर की कन्‍या है, उसी के प्रति आपके पिता का अनुराग हो गया है। महाराज ने धीवर से उस कन्‍या को मांगा भी था, परंतु उस समय उसने यह शर्त रक्‍खी कि ‘इसके गर्भ से जो पुत्र हो, वही आपके बाद राजा होना चाहिये। ‘आपके पिताजी के मन में धीवर को ऐसा वर देने की इच्‍छा नहीं हुई।

 

Devvrat se Bhisma  : देवव्रत से भीष्म 

यह सुनकर देवव्रत ने उस समय बूढ़े क्षत्रियों के साथ निषाद राज के पास जाकर स्‍वयं आने पिता के लिये उसकी कन्‍या मांगी। निषाद ने उनका सत्कार किया और कहा- इस कन्‍या को देने में मैंने राज्‍य को ही शुल्‍क रक्‍खा है। इसके गर्भ से जो पुत्र उत्‍पन्न हो, वही पिता के बाद राजा हो। यह कन्‍या एक आर्य पुरुष की संतान है। जिनसे सत्यवती का जन्म हुआ उन्होंने कहा था की सत्‍यवती को व्‍याहने के योग्‍य तो केवल धर्मज्ञ राजा शान्‍तनु ही हैं। लेकिन यदि आप मेरी शर्त को पूरा करें तो आप इस कन्या को ले जा सकते हैं।

 

 

तभी देवव्रत(भीष्म ) ने प्रतिज्ञा(Pratigya) ली कि इस कन्या से उत्पन्न पुत्र ही राज्य का अधिकारी होगा। तब निषादराज ने कहा कि अगर तुम्हारे पुत्र ने उसे मारकर राज्य छिन लिया तब क्या होगा?

 

यह सुनकर देवव्रत ने सभी दिशाओं और देवताओं को साक्षी मानकर आजीवन ब्रह्मचारी रहने की भीष्म प्रतिज्ञा ली। ऐसी भीष्म प्रतिज्ञा लेने के कारण ही देवव्रत का नाम भीष्म पड़ा।

 

अब भीष्‍म पिता की मनोकामना के लिए निषाद कन्‍या से बोले- ‘माताजी ! इस रथ पर बैठिये। अब हम लोग अपने घर चलें’। ऐसा कहकर भीष्‍म ने उस भामिनी को रथ पर बैठा लिया और हस्तिनापुर आकर उसे महाराज शान्‍तनु को सौंप दिया।

 

Bhishma Pitamah Iccha Mrityu Vardaan : भीष्म पितामह इच्छा मृत्यु वरदान 

राज्य के सब लोग देवव्रत की प्रशंसा करने लगे। सबने एक स्‍वर से कहा, ‘यह राजकुमार देवव्रत सच में भीष्‍म है’। राजा शान्‍तनु अपने पुत्र के इस कर्म पर बहुत संतुष्ट हुए और उन्‍होंने उन भीष्‍म को इच्छा मृत्‍यु का वरदान दिया। वे बोले- ‘मेरे निष्‍पाप पुत्र ! तुम जब तक यहां जीवित रहना चाहोगे, तब तक मृत्‍यु तुम्‍हारे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। तुमसे आज्ञा लेकर ही मृत्यु तुम पर अपना प्रभाव प्रकट कर सकती है’।

 

 

इस प्रकार देवव्रत का नाम भीष्म(Devvrat to Bhisma) हो गया और भीष्म जी को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त हुआ।

 

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