Bhagat Sadhna Kasai Story

Bhagat Sadhna Kasai Story

Bhagat sadna kasai was a Muslim bhagat of Shri Krishna. He was poet, saint, mystic and devotees. Here’s Hindi story of Bhagat Sadhna Kasai. 

सदना कसाई बकरे काट कर बेचता भी है और बचा हुआ ख़ुद भी खाता है । देखने मे बहुत ही सुदंर हट्टा-कट्टा नौजवान है ।यही काम करके निर्वाह करता है ।एक दिन सारा मीट बिक गया तो एक ग्राहक मीट लेने आ गया ।सदना ने कहा- मीट ख़त्म है और मै नया बकरा काट नही सकता । सेर मीट देने के बाद 40-50 सेर मीट सुबह तक ख़राब हो जायेगा । वह ग्राहक ज़िद करने लगा ,सुझाव दिया कि उसकी एक टाँग काट दे ,जिससे यह मरेगा भी नही ,और हमारा काम बन जायेगा । सदना को यह बात थोड़ी समझ आ गई, जैसे किसी शराबी को शराब पीने का कोई बहाना चाहिये और फिर उसी की आड़ मे अपना नशा पूरा करता है । ऐसे सदना को आधार मिल गया, जैसे ही वह काटने लगा बकरा गिड़गिड़ाया और ज़ोर से बोला ख़बरदार अगर मेरा एक अंग काटा, मारना है तो पूरा मार । पिछले बीस जन्मों से एक जन्म तू बकरा, मै कसाई, दूसरा जन्म मै बकरा तू कसाई । ग्राहक ने भी बकरे की बात सुनी ।सदना काँप गया, ग्राहक भाग गया । सदना मे वैराग्य पैदा हो गया । उसने काम का ढंग बदल लिया । कटा कटाया मीट लाकर बेचना शुरु कर दिया, ख़ुद खाना छोड़ दिया । प्रभु से लौ लग गई । सब धंधा भी छोड़ दिया , तप और साधना करने लग गया ।

नाम की कमाई इतनी अरबपति बन गया । चेहरे मे लाली आ गई । सोचा जगन्नाथ भगवान के दर्शन करने जाऊँ । चला गया और लक्ष्य यही कि कोई जगह देखकर रुक जाऊँगा । एक घर देखा गली मे बोला रात रह सकता हूँ । अतिथि मेहमान है ,आज्ञा दे दी ।
नवविवाहिता पति पत्नी का घर था । सदना देखने मे आकर्षक लगता था ।आधी रात को पत्नी को नींद नही आ रही थी । उसकी नीयत बदल गई, अपने पति को तलवार से मार दिया और सदने के पास आ गई । कहती , मुझे स्वीकार करो, उसने कहा , मै साधु हूँ । यह सब तुम्हें महंगा पड़ेगा । वह ज़बरदस्ती करने लगी । साधक वही जो सावधान रहता है । सदना वहाँ से भाग गया ।उस स्त्री ने शोर डाल दिया कि मेरे पति को इसने मारा । लोगों ने सदने को पकड़ लिया ख़ूब मारा पीटा । राजा के पास ले गये । हाथ काट दिये गये, मृत्यु दण्ड नही दिया ।

कुछ दिनों बाद कटे हाथो को लेकर जगन्नाथ पुरी पहुँचा । किसी ने रास्ते मे दवा पट्टी कर दी । ज़ख़्म भर गये । उस दिन पुजारी को भगवान ने दर्शन दिये और कहा मेरा भक्त आया है उसे पालकी मे लेकर आओ । पुजारी पालकी मे लेकर आया । दर्शन हुए तो सदना टुडे हाथो से कीर्तन करने लगा । दोनो हाथ जुड़ गये । सदना बोला — क्या भगवान आप पहले हाथ कटवाते हो फिर लगाते हो । लगाने थे तो बिना क़सूर कटवाये क्यों ? भगवान बोले –बिना कटवाये काम चलता तो न कटवाता । हमारे करमो के लिये भगवान भी मजबूर है । सदने ने पूछा ऐसा क्यों ?
भगवान बोले पिछले जन्म मे तू साधु था,सुदंर कुटिया थी । गाय भाग रही थी और एक व्यक्ति उसको पकड़ने के लिये भाग रहा था, तूने गाय को सींगों से पकड़ कर रोक दिया । वह कसाई था ,उसने जाकर गाय को काट दिया । जिन हाथो से पकड़ा था ,वह तो कटने ही थे । गौ हत्या जो करी वह नवयुवती और उसका पति वह व्यक्ति और गाय ही थे ,जिस कारण तेरे हाथ कटे ।आज हिसाब पूरा हुआ । जब व्यक्ति परमात्मा के पास बिक जाता है तो वह उसे अपनी इचछा के अनुसार चलाता है । करमो के अनुसार नही ,जैसे किसी होटल का मालिक कर्मचारी को चोट लगने परइलाज करवाता है, उसकी ज़िम्मेदारी बन जाती है ।
जैसे महाभारत की लड़ाई मे श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा कि करण को मार । अर्जुन ने कहा वह रथ पर नही है, नियम का उल्लंघन है । भगवान कृष्ण ने अपनी इचछा से अर्जुन को चलाया तो वह जीत गयी । भगवान खुले रूप से कहते है कि मै भक्त का पक्षपाती हूँ । पक्षपात न हो तो भक्ति  का मार्ग ही ख़त्म हो जाये । अपने आप को बेच दो ,अपनी इच्छा नही ।

 

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