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Arjuna Refuse to Fight after see kauravas Sena in hindi

Arjuna Refuse to Fight after see kauravas Sena in hindi

अर्जुन का कौरवों की सेना को देखकर युद्ध करने से इंकार करना 

 

 

महाभारत युद्ध होना निश्चित हो गया था। कौरव और पांडवों की सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में डेरा डाल चुकी थी। भगवान श्री कृष्ण को बर्बरीक ने अपना शीश दान में दे दिया था। कौरव और पांडवों दोनों की ओर से भीष्म पितामह जी ने युद्ध के नियम बना दिए थे। आइये अब दोनों पक्षों की सेनाओं पर नजर डालते हैं।

 

Kaurav Pandav sena in Mahabharat yudh : महाभारत युद्ध में कौरव और पांडवों की सेना

महाभारत युद्ध में दोनों(कौरव और पांडवों) ओर से  18 अक्षौहिणी सेना लड़ी थी। पांडवों की ओर 7 अक्षौहिणी सेना थी जबकि कौरवों की ओर 11 अक्षौहिणी सेना थी।

 

 एक अक्षौहिणी सेना में 21,870 रथ, 21 ,870 हाथी, 65,610 सवार और 1,09, 350 पैदल सैनिक होते हैं।

 

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कौरवों की ओर से युद्ध में भीष्म पितामह , गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्रनरेश शल्य, भूरिश्र्वा, अलम्बुष, कृतवर्मा, कलिंगराज श्रुतायुध,शकुनि, भगदत्तजयद्रथ,विन्द-अनुविन्द,काम्बोजराज सुदक्षिण,

बृहद्वल,दुर्योधन व उसके 99 भाई थे।

 

 

 

जबकि पांडवों की ओर से भीम, नकुल, सहदेव, अर्जुन, युधिष्टर, द्रौपदी के पांचों पुत्र, सात्यकि, उत्तमौजा, विराट, द्रुपद, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, पाण्ड्यराज, घटोत्कच, शिखण्डी, युयुत्सु, कुन्तिभोज, उत्तमौजा, शैब्य, अनूपराज नील आदि योद्धा थे।

 

 

 

 

युद्ध के नियमानुसार दोनों सेनाएं और दोनों सेनाओं के महारथी युद्ध के लिए तैयार थे।  इसी बीच अर्जुन श्री कृष्ण से कहते हैं- केशव! आप मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले चलो।  भगवान अर्जुन की बात मानकर अर्जुन का रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले आते हैं।  अर्जुन दोनों सेनाओं पर अपनी दृष्टि डालते हैं।  जब अर्जुन दुर्योधन, भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, पर नजर डालते हैं तो उसके हाथ कांपने लग जाते हैं।

 

इधर वेदव्यास जी ने संजय को दिव्यदृष्टि दी है। संजय युद्ध भूमि का सीधा प्रसारण धृतराष्ट्र को बता रहा है।

 

Arjun ka yudh karne se inkar : अर्जुन का युद्ध करने से इंकार करना

 

संजय कहता है- अर्जुन के मन में आज मोह पैदा हो गया। अर्जुन भगवान कृष्ण से कहते हैं- मैं अपने पितामह के सामने बाण कैसे चलाऊंगा जिन्होंने मुझे पाला, मैं अपने गुरु द्रोण के सामने तीर कैसे चलाऊंगा जिन्होंने मुझे धनुर विद्या में निपुण बनाया, केशव! केवल निपुण ही नहीं बनाया बल्कि विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर भी बनाया। गुरु कृपाचार्य, अश्व्थामा ने तो हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ा ना। रही बात दुर्योधन की तो वो जैसा भी है, है तो हमारा भाई ही ना। मैं इन सब पर बाण नहीं चला पाऊंगा।

 

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं- अर्जुन युद्ध भूमि में आकर तुम नपुंसकों जैसी बात करते हो, मोह ने तुम्हे घेर लिया है। वास्तव में ये शरीर के ही सम्बन्ध है। तुम धनुष उठाओ और युद्ध करो।

 

 

लेकिन अर्जुन हथियार डाल देते हैं और युद्ध करने से मना कर देते हैं।

 

 

तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को ऐसा उपदेश किया जो युगों युगों तक लोगों का आदर्श बना रहेगा। जिसे श्रीमद भगवद गीता का ज्ञान कहते हैं। ये भागवत गीता का ज्ञान, उपदेश जो कोई भी पढ़ेगा या सुनेगा और जीवन में धारण करेगा उसका सदैव ही कल्याण होगा। जब जब आपका मन भटकने लगे, जब जब आपको कोई रास्ता नहीं दिखाई दे तब आप भगवत गीता को पढ़िए। आपकी हर समस्या का हल श्रीमद भगवत गीता में है।

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