Arjun Urvashi Curse(Shrap) Story in hindi

Arjun Urvashi Curse(Shrap) Story in hindi

अर्जुन उर्वशी शाप की कहानी

 

अर्जुन ने भगवान शिव की तपस्या की। भगवान शिव रूप बदलकर अर्जुन के पास आये और शिव व अर्जुन के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में भगवान शिव विजयी हुए और फिर अर्जुन ने अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी। इसके बाद भगवान शिव अर्जुन को पाशुपतास्त्र देकर अंतर्ध्यान हो गए। उस समय सभी देवता वहां पर आये।

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इन्द्र ने कहा- “हे अर्जुन! अभी तुम्हें देवताओं के अनेक कार्य सम्पन्न करने हैं, इसलिए तुमको लेने के लिये मेरा सारथि आयेगा।” तुम उसके साथ स्वर्ग में आ जाना। ऐसा कहकर इंद्र वहां से चले गए।

 

अर्जुन वहीँ पर प्रतीक्षा करने लगे। कुछ समय बाद उन्हें लेने के लिये इन्द्र के सारथि मातलि वहाँ पहुँचे और अर्जुन को विमान में बिठाकर देवराज की नगरी अमरावती ले गये।

 

 

अर्जुन ने इंद्र के पास जानकर उनको प्रणाम किया। इन्द्र ने अर्जुन को आशीर्वाद देकर अपने निकट आसन प्रदान किया। अमरावती में रहकर अर्जुन ने देवताओं से प्राप्त हुए दिव्य और अलौकिक अस्त्र-शस्त्रों की प्रयोग विधि सीखी और उन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने का अभ्यास करके उन पर महारत प्राप्त कर ली।

 

Arjun and Urvashi Mahabharat Story in hindi : अर्जुन और उर्वशी की महाभारत में कहानी

 

एक दिन इन्द्र अर्जुन से बोले- “पुत्र अर्जुन! तुम चित्रसेन नामक गन्धर्व से संगीत और नृत्य की कला सीख लो।” क्योंकि आगे चलकर ये कला तुम्हारे बहुत काम आएगी।

 

इन्द्र का आदेश पाकर अर्जुन  संगीत और नृत्य कला सिखने लगे। जल्दी ही अर्जुन नृत्य और संगीत कला में निपुण हो गए।

 

 

एक दिन जब चित्रसेन अर्जुन को संगीत और नृत्य की शिक्षा दे रहे थे, वहाँ पर इन्द्र की अप्सरा उर्वशी आई और उसने अर्जुन को देखा। अर्जुन को देखते ही उर्वशी मोहित हो गए। मोहित होने के साथ साथ कामवश भी गई।

 

 

 

उर्वशी की अवस्था देखकर चित्रसेन ने कहा- एक अप्सरा का किसी व्यक्ति पर मोहित होना शुभ संकेत नहीं है। लेकिन उर्वशी ने इनकी बात की ओर ध्यान नहीं दिया। और अर्जुन  के पास चली गई।

 

Arjun Urvashi Curse(Shrap) : अर्जुन उर्वशी श्राप(शाप)

अर्जुन रात्रि में बैठे हुए थे। कामित और मोहित उर्वशी अर्जुन के पास गई। अर्जुन के पास पहुंचकर वह सब कुछ भूल गई।

 

 

अर्जुन ने उर्वशी को देखकर उसका आदर से स्वागत किया। और अपने आसान से खड़े हो गए।

 

उर्वशी कहती है- मैं तुम्हारी सेवा के लिये तुम्हारे पास आयी हूं। तुम्हे देखकर मैं कामदेव के वश में हो गयी हूं। मेरी इच्छा पूरी करो। उसने बहुत समझाया कि स्वर्ग अप्सराएं किसी की पत्नी नहीं होतीं। उनका उपभोग करने का सभी स्वर्ग आये लोगों को अधिकार है।

 

लेकिन अर्जुन का मन अविचल था। उन्होंने कहा- “देवि ! मैं जो कहता हूं, उसे आप, सब दिशाएं और सब देवता सुन लें। हमारे पूर्वजों ने आपसे विवाह करके हमारे वंश का गौरव बढ़ाया था। अतः पुरु वंश की जननी होने के नाते आप हमारी माता के तुल्य हैं। जैसे मेरे लिये माता कुन्ती और माद्री पूज्य हैं, जैसे शची मेरी माता हैं, वैसे ही मेरे वंश की जननी आप भी मेरी माता हैं। मैं आपको माँ मानकर आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ।” 

 

 

 

अर्जुन की बातें उर्वशी के ह्रदय में चुभ गई और उसके मन में बड़ा ही क्षोभ उत्पन्न हुआ। उर्वशी ने अर्जुन से कहा- “तुमने आज नपुंसकों जैसे वचन कहे हैं, इसलिए मैं तुम्हें शाप देती हूँ कि तुम एक वर्ष तक पुंसत्वहीन रहोगे।”

 

 

 इतना कहकर उर्वशी वहाँ से चली गई। जब इन्द्र को इस घटना के विषय में ज्ञात हुआ तो वे अर्जुन से बोले- “वत्स! तुमने जो व्यवहार किया है, वह तुम्हारे योग्य ही था। उर्वशी का यह शाप भी भगवान की इच्छा थी, यह शाप तुम्हारे अज्ञातवास के समय काम आयेगा। अपने एक वर्ष के अज्ञातवास के समय ही तुम पुंसत्वहीन रहोगे और अज्ञातवास पूर्ण होने पर तुम्हें पुनः पुंसत्व की प्राप्ति हो जायेगी।”(अर्जुन को श्राप मिला कि एक साल तक अर्जुन को नपुंसक की तरह रहना पड़ेगा)

 

 

ऐसा श्राप देकर उर्वशी वहां से चली गई। जब इन्द्र को इस घटना के बारे में ज्ञात हुआ तो वे अर्जुन के पास जाकर कहते हैं- “वत्स! तुमने उर्वशी के साथ जो व्यवहार किया है, वह तुम्हारे योग्य ही था। उर्वशी का यह शाप भी भगवान की इच्छा थी, यह शाप तुम्हारे अज्ञातवास के समय काम आयेगा। अपने एक वर्ष के अज्ञातवास के समय ही तुम पुंसत्वहीन रहोगे और अज्ञातवास पूर्ण होने पर तुम्हें पुनः पुंसत्व की प्राप्ति हो जायेगी।”

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धन्य है भगवान श्री कृष्ण के ऐसे मित्र जिन पर उर्वशी जैसी अप्सरा का कोई प्रभाव नहीं हुआ। अप्सराओं ने तो अच्छे अच्छे योगियों की तपस्या को भी भंग कर दिया था। लेकिन जिस पर कृपा हरि की कोय उस पर कृपा करे सब कोय। आज भगवान की कृपा के कारण अर्जुन अपने धर्म पर डटे रहे। 

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