Arjun and Shiv fight(yudh) Story in hindi

Arjun and Shiv fight(yudh) Story in hindi

अर्जुन और शिव की युद्ध कहानी 

 

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा था कि तुम्हारे पास अभी ऐसे अस्त्र शस्त्र नहीं हैं जो पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण और अश्वत्थामा आदि धनुर्धरों का सामना कर सकें। इसलिए तुम इंद्र महादेव आदि की तपस्या करके अस्त्र शस्त्र प्राप्त करो। ऐसा कहकर भगवान वन से चले गए।

 

अब अर्जुन, युधिष्ठिर व भीम आदि की आज्ञा पाकर देवराज इन्द्र का दर्शन करने के लिए इन्द्रकील पर्वत पर गए। यहाँ पर इन्हे एक तपस्वी महात्मा दिखायी दिये। इन्होने अर्जुन को रुकने के लिए कहा और अर्जुन ने पूछा- तुम कौन हो ? ये हाथ में धनुष बाण लिए कहाँ जा रहे हो? तुम ये धनुष यहीं फेंक दो।

 

ऐसा सुनते ही अर्जुन ने उन्हें धनुष छोड़ने से मना कर दिया।

 

यह सुनते ही उन तपस्वी ब्राह्मण ने हंसते हुए से कहा-‘ तुम्हारा भला हो, मैं साक्षात् इन्द्र हूं, मुझसे कोई वर मांगो’।

 

अर्जुन ने सहस्त्र नेत्रधारी इन्द्र से हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक कहा- मैं आपसे सम्पूर्ण अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूं।

 

इंद्र ने अर्जुन से कहा कि पहले तुम महादेव की तपस्या करो। उनके दर्शन से पूर्णतः सिद्ध हो जाने पर तुम स्वर्गलोक में पधारोगे’। अर्जुन से ऐसा कहकर इन्द्र पुनः अदृश्य हो गये।

 

Arjun-Shiv tapasya : अर्जुन-शिव तपस्या 

अब अर्जुन ने भगवान शिव की तपस्या करनी शुरू कर दी। अर्जुन भगवान शिव की बड़ी उग्र तपस्या करने लगे। अर्जुन पृथ्वी पर गिरे हुए सूखे पत्तों का ही भोजन करते थे। एक महीने तक वे तीन-तीन रात के बाद केवल फलाहार करके रहे।

 

दूसरे महीने को छः-छः रात के बाद फलाहार करके व्यतीत किया। तीसरे महीने पंद्रह-पंद्रह दिन में भोजन करते थे। चौथा महीना आने पर सिर्फ हवा पीकर रहने लगे। वे दोनों भुजाएं ऊपर उठाये बिना किसी सहारे के पैर के अंगूठे के अग्रभाग के बलपर खडे़ रहे। अर्जुन के सिर की जटाएं काफी बढ़ गई थी।

 

एक दिन भगवान शिव एक किरात का वेश धारण करके अर्जुन के पास गए। तभी वहां भगवान् शंकर ने एक अद्भुत दानव को देखा, जो सूअर का रूप धारण करके अर्जुन को मारने के लिए भागा। अर्जुन ने भी उस सूअर को देखा तो अर्जुन ने अपने धनुष से लेकर तुरंत तीर चलाया। इधर से किरात ने भी तीर चला दिया। दोनों के तीर एकसाथ सूअर को लगे और वह दानव फिर अपने राक्षसरूप को प्रकट करते हुए मर गया।

 

अब अर्जुन ने हँसते हुए उस किरात(भगवान शिव) से पूछा- आप कौन हैं? यह सूअर तो मेरा लक्ष्य था, आपने क्यों उसपर बाण मारा ?

 

भगवान शिव ने कहा- ये सूअर तो मेरा शिकार है और मेरा ही बाण लगने के कारण ये धरती पर गिरकर मर गया है। तुम बताओ की तुम कौन हो?

 

अर्जुन ने कहा कि मैं गुरु द्रोण शिष्य, पाण्डु पुत्र, वीर , सर्वश्रेठ धनुर्धर अर्जुन हूँ।

 

तब उस किरात ने पूछा- कौन अर्जुन? मैं किसी अर्जुन को नहीं जानता। मैं सिर्फ ये जानता हूँ कि ये शिकार मेरा है। और मैंने ही इसे मारा है।

Arjun-Shiva Yudh : अर्जुन-शिव का युद्ध

तुम अपने बल के धमंड के आकर अपने दोष दूसरे पर नहीं मढ़ सकते। तुम्हें अपनी शक्तिपर बड़ा गर्व हैं। अतः अब तुम मेरे हाथ से जीवित नहीं बच सकते। धैर्यपूर्वक सामने खडे़ रहो, मैं वज्र के समान भयानक बाण छोडूंगा। तुम भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर मुझे जीतने का प्रयास करो। मेरे ऊपर अपने बाण छोड़ो।

 

 

किरात की बात सुनकर समय अर्जुन को बड़ा गुस्सा आया। अर्जुन ने अपने बाणों से उस पर प्रहार आरम्भ किया।

 तब किरात ने अर्जुन के छोड़े हुए सभी बाणों को पकड़ लिया और कहा-‘मूर्ख! और बाण मार और बाण मार।

उसके ऐसा कहने पर अर्जुन ने सहसा बाणों की झड़ी लगा दी।

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अब अर्जुन ने किरात पर बाणों की वर्षा प्रारम्भ की; लेकिन भगवान् शिव ने ख़ुशी ख़ुशी उन सब बाणों को ग्रहण कर लिया। भगवान शिव ने दो ही घड़ी में सारी बाणवर्षा को अपने में लीन कर लिया और जैसे के तैसे खड़े रहे । उनके शरीर पर खरोंच भी नहीं आई। ये सब देख अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ वह किरात को बोले- आपको मैं प्रणाम करता हूँ। क्योंकि संसार में कर्ण, गुरु द्रोण, भीष्म पितामह, इंद्र और महादेव के अलावा मेरे बाणों का उत्तर कोई नहीं दे सकता है। और मैंने जिन बाणों की वर्षा की ‘मैंने सहस्त्रों बार जिन बाण-समूहों की वृष्टि की है, उनका वेग पिनाकधारी भगवान् शंकर के सिवा दूसरा कोई नहीं सह सकता।

 

ऐसा कहकर अर्जुन किरातरूपी भगवान् शंकर के चरणों में गिर पड़े।

 

भगवान् शिव ने कहा- अर्जुन! मैं तुम्हारे इस अनुपम पराक्रम, शौर्य और धैर्य से बहुत संतुष्ट हूं। तुम्हारे समान दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं है। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूं। मेरी ओर देखो मैं तुम्हे दिव्य दृष्टि देता हूं। तुम पहले के ‘नर’ नाक ऋषि हो। तुम युद्ध में अपने शत्रुओं पर, वे चाहे सम्पूर्ण देवता ही क्यों न हों, विजय पाओगे। मैं तुम्हारे प्रेम के कारण तुम्हें अपना पाशुपतास्त्र दूंगा, जिसकी गति को कोई रोक नहीं सकता।

 

अर्जुन कहते हैं- भगवन! मैं आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम करता हूँ। आप मेरा अपराध क्षमा कीजिये। भगवन्! मैं आपही के दर्शन की इच्छा लेकर ही इस पर्वत पर आया हूं। शंकर! मै। अब आपकी शरण में आया हूं। आप मेरी उस धृष्टता को क्षमा करें।

 Lord Shiva  Pashupatastra obtained by Arjuna :  भगवान शिव का पाशुपतास्त्र अर्जुन द्वारा प्राप्त करना

 

अब भगवन शिव ने मुस्कुराते हुए कहा- मैंने तुम्हारा अपराध पहले ही क्षमा कर दिया। ऐसा कहकर भगवान शिव ने अर्जुन को गले से लगा लिया। और अर्जुन से वर मांगने को कहा।

 

अर्जुन कहते हैं कि – मैं भगवान श्री कृष्ण की प्रेरणा पाकर ही आपके पास आया हूँ। आप मुझे दिव्यास्त्र पाशुपत प्रदान कीजिये।

 

अर्जुन कहते हैं – महादेव! कर्ण, भीष्म, कृप, द्रोणाचार्य आदि के साथ मेरा महान् युद्ध होने वाला है, उस युद्ध में मैं आपकी कृपा से उन सब पर विजय पा सकूं, इसी के लिये दिव्यास्त्र चाहता हूं।

 

महादेवजी ने कहा- अर्जुन! मैं तुम्हे अपना परम प्रिय पाशुपतास्त्र तुम्हें प्रदान करता हूं। लेकिन तुम सहसा किसी पुरुष पर इसका प्रयोग न करना। यदि किसी अल्पशक्ति योद्धापर इसका प्रयोग किया गया तो यह सम्पूर्ण जगत् का नाश कर डालेगा। चराचर प्राणियों सहित समस्त त्रिलोकी में कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो इस अस्त्रद्वारा मारा न जा सके। इसका प्रयोग करनेवाला पुरुष अपने मानसिक संकल्प से, दृष्टि से, वाणी से तथा धनुष बाणद्वारा भी शत्रुओं को नष्ट कर सकता है।

 

 

ऐसा कहकर भगवान शिव ने अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्रदान किया। भगवान् शिव ने अर्जुन को यह आज्ञा दी कि अब तुम स्वर्गलोक को जाओ’।

(नोट : महाभारत युद्ध में कर्ण का वध करने के लिए अर्जुन ने पाशुपतास्त्र का इस्तेमाल किया था)

 

 

तब अर्जुन ने भगवान् के चरणों से मस्तक रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखने लगे। फिर   भगवान् शिव ने अर्जुन को वह महान् गाण्डीव धनुष दे दिया, जो दैत्यों और पिशाचों का संहार करनेवाला था।

 

इस तरह अर्जुन को वरदान देकर वहां से चले गए। और अर्जुन ने महादेव की आज्ञा पाकर स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।

 

 

 

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