Dukh Dur Kaise kare ? | Jeevan me Dukh Kyo hai?

Dukh Dur Kaise kare ? | Jeevan me Dukh Kyo hai?

दुःख दूर कैसे करें?जीवन में दुःख क्यों है?

 

आदमी क्यों दुखी है?  मूल प्रश्न ये है दुःख क्यों है?

सोचो, प्रसन्नता हमारा स्वरूप है। जगद्गुरु आदि शंकर तो कहते हैं प्रसन्नता परमात्मा का दरवाजा है प्रसन्न चित्ते परमात्म दर्शनम्। सोचिये, आदमी क्यों नहीं मुस्कुराता?

तो प्रश्न बड़ा प्यारा उठाया गया और बहुत सरलता से समझाया गया कि जीवन में दुःख क्यों है। तब उसका पहला जवाब, बिल्कुल सरलता से, मुझे लगता है कि हम सबमें माँ के दूध की तरह उतर जाए इसी ढंग से सुनाया गया ये बात कि दुःख क्यों है? दुःख क्यों हमारे जीवन में जन्म लेता है?

इसका एकमात्र बड़ा प्यारा जवाब है – दुःख जन्म लेता है इच्छाओं के कारण रजोगुणसमुद्भवः । जितनी इच्छायें ज्यादा इतना आदमी ज्यादा दुःखी, हम सब। मैं आपसे बोल रहा हूँ महापुरुषों को छोड़कर। मैं आपके साथ हूँ। हमारे दुःख का कारण हमारी इच्छायें है।

 

आज राम कथा गाते हैं तो हम जहाँ तक प्रभु की कृपा, गुरुजनों की, संतों की कृपा, हम प्रसन्न रहते हैं। तो जब साक्षात् राम थे, जानकी जी थी, उसी समय अयोध्या में दुःख क्यों आया? क्योंकि इच्छा बढ़ती गई, इच्छा बढ़ती गई।

एक इच्छा थी अयोध्यावासियों की कि हमारे महाराज को पुत्र नहीं है, वारिस कोई नहीं है, वंश खत्म हो जायेगा। सब करते थे इच्छा कि पुत्र हो, पुत्र हो, पुत्र हो।

परमात्मा ने वो इच्छा पूरी करदी। राम स्वयं परमात्मा पुत्र बनकर आये।

फिर सब इच्छा करने लगे कि बस अब ये सब उत्सव हो, नामकरण हो, फलां हो, फलां फलां फलां हो, ये सब हो गया।

फिर इच्छा करने लगे अब विद्या सम्पन्न हो जाये, पूरा हो गया। फिर सब इच्छा करने लगे अब कोई अच्छे घराने में कोई अच्छी लड़की के साथ उसकी शादी हो जाये, वो भी पूरा हो गया। इच्छायें बढ़ती गई, अनंत इच्छाओं से दुःख का जन्म हुआ मानस के अयोध्याकाण्ड में।

यद्यपि राम को नहीं छुआ वहाँ तो प्रसन्नतायाम, न प्रसन्नता और न ग्लानि की कोई असर लेकिन लोग दुःखी हुए।

वर्षा अच्छी है, जीवनदात्री है, अति वर्षा ठीक नहीं, सुख जरुरी है, सम्यक। तो इच्छाओं के कारण दुःख होता है।
इच्छा क्यों होती है? switch ही बंद कर दो न इच्छा की। लेकिन इच्छाएं हम सबकी होती है।  इच्छा खत्म हो जाये तो दुःख का जन्म न हो, लेकिन इच्छाएँ जन्मती हैं अभाव के कारण। उसके पास ये है हमारे पास नहीं है, ये अभाव के कारण। ये बिल्कुल प्रैक्टिकल लगता है मुझे, बिल्कुल हमारे जीवन की ये बातें है। हमारे घर में फ्रीज़ नहीं है तो फ्रीज़ की इच्छा होती है और फ्रीज़, कक्षा नहीं है लेने की फिर भी लोन लेकर ली तो बिल भरने का दुःख आया। किसी न किसी रूप में दुःख आएगा। इसका मतलब ये नहीं कि फ्रीज़ नहीं बसाया जाये।

दुःख जन्मता है इच्छा से।

इच्छा प्रकट होती अभाव से और अभाव हमको लगता है विस्मरण के कारण। हम सब लबालब भरे हैं लेकिन विस्मृति हो गई।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति, मानस में तुलसी ने बहुत प्यारी पंक्ति लिखी है इसी सिद्धांत को, इसी इसी मन्त्रात्मक बातों को सिद्ध करने की। तुलसी कहते हैं – अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी।  सकल जीव जग दीन दुखारी॥

ऐसा परमात्मा, अविकारी परमात्मा, हर एक व्यक्ति के ह्रदय में विराजमान है फिर भी सकल जीव जग दीन दुखारी, सब दुखी, सब दुखी, सब दुखी, कारण है विस्मरण, कोई चिंता नहीं रही अर्जुन को जब स्मृति आ गई। विस्मरण था तब तक दलीलबाजी चल रही थी, ये ये ये, लेकिन स्मृतिर्लब्धा, जब स्मृति आई, विस्मरण और विस्मरण हो गया है उसका कारण है मानवी की मूढ़ता अथवा मानवी का अज्ञान। अज्ञान के कारण विस्मय हुआ है। एक पर्दा लग गया, अज्ञान के कारण बाकी ज्ञानी को तो सबमें ब्रह्म दिखता है लेकिन मूढ़ता अज्ञान के कारण और अँधेरा प्राकृतिक है। ये है अँधेरा यद्यपि ओशो ने कहा कि प्रकाश का अभाव का नाम ही अँधेरा है, अँधेरे की कोई सत्ता नहीं है, ऐसा भी आपने एक बार निवेदन किया है। मुझे तो ऐसा भी लगता है कि द्वेष का कोई अस्तित्व नहीं है लेकिन प्रेम का अभाव द्वेष पैदा करता है, द्वेष कैसा? लेकिन प्रेम का अभाव।

लेकिन अँधेरा अनंत नहीं है, उजाले के द्वारा उसका विनाश किया जा सकता है। तो मेरे भाई बहन अज्ञान का नाश, अज्ञान का तिमिर कोई बुद्धपुरुषों के वचनों से, तुलसी कहते हैं –

बंदउं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥
भावार्थ:- मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूं, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अंधकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥

मोरारी बापू के शब्द (मानस परिकम्मा राम कथा से)

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