Sukh-Dukh Hindi manthan

Sukh-Dukh Hindi manthan

सुख और दुःख एक मंथन

प्रत्येक प्राणी सुख और दुःख से घिरा हुआ है। आपने सुना होगा दुःख है तो कोई बात नही सुख भी आएगा। ये भी सुना होगा की ये धुप और छाँव की तरह है। लेकिन दुखों को कोई नही चाहता है फिर भी दुःख आ जाते हैं। सुख सब चाहते है फिर भी सुख नही आता है। पहले ये समझिए-

Sukh or Dukh kya hai ? सुख और दुःख क्या हैं?

जब कोई भी काम हमारे मन के अनुरूप होता है तो हम सुखी हो जाते है और मन के अनुरूप नही होता है तो दुखी हो जाते हैं। जो हमे चाहिए अगर मिल जाये तो सुखी नही मिला तो फिर दुखी। लेकिन थोड़ा विचार कीजिये- हमें जो चीज चाहिए वो मिल गई है फिर भी दुःख क्यों आ जाता है?

 

संसार में सुख क्षणिक है । आपको भूख लगी है रोटी खाओगे, एक दो तीन चार, पेट भर गया सुख पूरा हुआ। क्योंकि वहां सुख तो है लेकिन क्षणिक है। या यु कहें की वो सुख थोड़ी देर में खत्म होने वाला है। जैसे आपका रसगुल्ला खाने का मन है। आपने रसगुल्ला लिया और खाया। एक खाया, फिर दो खाए, फिर तीन, फिर चार, फिर पांच। और कितने खा पाओगे? अब सोचो जो सुख पहला रसगुल्ला खाने में मिला क्या वही सुख पांचवा रसगुल्ला खाने में मिला?
नही ना। कहने का मतलब है की यहाँ सुख कम होता चला गया। वास्तव में वहां पर सुख है ही नही।

Sukhi Kaise ho ? सुखी कैसे हों?

केवल भक्ति ही है जो आपको सुख, शांति और आनंद प्रदान कर सकती है। दूसरी कोई भी चीज नही। क्योंकि कहा गया है- 

धनहीन कहे धनवान सुखी, धनवान कहे सुख राजा को भारी,
राजा कहे महाराजा सुखी ,महाराजा कहे सुख इंद्र को भारी,
इंद्र कहे चतुरानन सो,चतुरानन कहे सुख विष्णु को भारी,
पर तुलसी अपने मन सोच करो, हरि भक्ति बिना सब जीव दुखारी।

अर्थ  : जिसके पास पैसा नही है और सोचता है की पैसे वाला सुखी है। और जिसके पास रुपैया पास है, जो धनवान है वो सोचता है की मैं सुखी थोड़ी हुईं क्योंकि मुझसे ज्यादा सुखी तो राजा है क्योंकि उसके पास मुझसे जयादा दौलत है। राजा कहता है की महाराजा सुखी है। महाराजा कहता है की मुझसे जयादा सुखी तो इंद्र देवता है। इंद्र देवता से जब पूछा गया की आप सुखी हैं? इंद्र कहते हैं की मुझसे ज्यादा सुखी तो ब्रह्मा जी हैं। और ब्रह्मा से जब पूछा गया तो ब्रह्मा जी कहते है सुखी तो विष्णु भगवान जी हैं। तुलसीदास जी ने अंत में कह दिया मुझे लगता है हरि(भगवान) की भक्ति के बिना सब जीव दुखी हैं। 

 

रामचरितमानस में काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी को कहते हैं-

श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं॥
अर्थ  :श्रुति, पुराण और सभी ग्रंथ कहते हैं कि श्री रघुनाथजी की भक्ति के बिना सुख नहीं है॥

 

कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा॥ फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला॥
अर्थ  :कछुए की पीठ पर भले ही बाल उग आवें, बाँझ का पुत्र भले ही किसी को मार डाले, आकाश में भले ही अनेकों प्रकार के फूल खिल उठें, परंतु श्री हरि से विमुख होकर जीव सुख नहीं प्राप्त कर सकता॥

 

तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥ अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥
अर्थ  :मृगतृष्णा के जल को पीने से भले ही प्यास बुझ जाए, खरगोश के सिर पर भले ही सींग निकल आवे, अन्धकार भले ही सूर्य का नाश कर दे, परंतु श्री राम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता॥

 

हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई॥
अर्थ  :बर्फ से भले ही अग्नि प्रकट हो जाए (ये सब अनहोनी बातें चाहे हो जाएँ), परंतु श्री राम से विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता॥

 

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