Matru Devo Bhava Pitru Devo Bhava Acharya Devo Bhava

Matru Devo Bhava Pitru Devo Bhava Acharya Devo Bhava

मातृ देवो भव पितृ देवो भव आचार्य देवो भव अतिथी देवो भव

 

उपनिषद में 4 वस्तु हैं। मातृ देवो भव(Matru Devo Bhava), पितृ देवो भव(Pitru Devo Bhava), आचार्य देवो भव(Acharya Devo Bhava), अतिथी देवो भव(Atithi Devo Bhava)

 

मातृ देवो भव : Matru Devo Bhava

अध्यात्मिक जगत की चर्चा करनी हो तो माँ कौन?
हमारी जनेता और हमारी मातृ भूमि, हमारी मातृभाषा, ये हमारी माँ तो है हीं।

मेरी व्यास्पीठ को…. मातृ देवो भव मतलब 9 प्रकार की भक्ति ये हमारी माँ है ….
1. साधु का संग।
2. जहाँ सत्संग होता हो …सद्चर्चा होती हो …उसका श्रवण करना।
3. अभिमान छोड़कर हमारे गुरू की सेवा करना। गुरू की सबसे बड़ी सेवा है उसकी आज्ञा अनुसार वर्तन करना।
4. कपट और दंभ किये बिना हमारे इष्ट का गुणगान गाना …प्रार्थना करना …स्मरण करना।
5. भरोसा रखकर भगवान का नाम लेना …सिर्फ नाम।
6. थोड़ा संयम ..नियम का पालन करना। त्याग करने की वृत्ति …भावना रखना।
7. सब में अच्छा देखना। गलतियाँ नहीं निकालना। सब में हरि दर्शन, positive दर्शन करना।
8. जितना मिले उसमें संतोष रखना।
9. सरल जीवन …सादी बोली …सादा भोजन …सादा वेश ….सादा व्यवहार ….किसीको बाधा ना बनें ….सबको सस्ता पड़ें …मूल्यवान ना बनें।

पितृ देवो भव : Pitru Devo Bhava

 

पिता के 8 लक्षण …मतलब अष्टांग योग …उनके 8 अंग …2 चरण …..2 हाथ ..2 आँखें … जीभ … दिल।

2 चरण ….1 चरण सतत हमारे लिये गति करे और दूसरा चरण हमारा आश्रय हो …शरण हो।

2 हाथ ….1 शिक्षण …दूसरा रक्षण …..बाप हमको शिक्षण दिलाये कि कैसे भी मैं तुम्हारी फीस दूँगा …लेकिन आप पढो …और दूसरे हाथ से हमारा रक्षण ….हमारा हाथ पकड़कर हमें मेले में ले जाये ….

2 आँखें …1 थोडी कठोर और दूसरी में उतना ही वात्सल्य …पिता की आँखें कभी लाल हो तो बच्चों …कभी नाराज मत होना …उसकी दूसरी आँख के सामने देखना ….

उसकी जीभ …पिता हमारे माथे पर हाथ फेरकर पूछे …बेटा खाना खा लिया ?…उसकी जीभ में अमृत है …प्रेम है …..

उसका दिल …जिसमें संतान के लिये प्रेम भरा हो …..

 

आचार्य देवो भव : Acharya Devo Bhava

 

आचार्य देवो भव …ये ज्ञान के 7 सोपान हैं ….आचार्य विद्वान होना चाहिये …विवेकी होना चाहिये …आचारवान होना चाहिये ..ज्ञानवान होना चाहिये …ज्ञान के 7 लक्षण हैं …..

 

 

अतिथी देवो भव : Atithi Devo Bhava

अतिथी देवो भव….के 6 लक्षण।

1…वो हम पर बोझ ना बनें …हमको ऐसा लगे कि भले पधारे वो ….
2…जब वो हमारे घर से जायें ..तब हमारे पूरे घर को …हर कोने को ..आनंद से भर दें ….
3…जैसे मैं आज अचानक आया हूँ …वैसे तुम भी मेरे घर किसी दिन अचानक आना ….ऐसा कहे ….
4…जो हम खिलायें …वो अमृत की डकार लेकर खा ले …
5…खाली हाथ ना आये ……
जिसके घर बच्चे हों …या देवस्थान…किसी साधु संत का आश्रम हो …वहाँ खाली हाथ जाने को मनाई है …हमारे पास कुछ ना हो तो कम से कम हम मुस्कुराहट तो लेते जायें …
6…हमारे घर का अन्न खाता जाये और भजन से भरा अपना मन हमको देता जाये …..

प्रेम देवो भव : Prem Devo Bhava

मातृ देवो भव…पितृ देवो भव …आचार्य देवो भव …अतिथी देवो भव ….इनके अलावा बापू ने प्रेम देवो भव के कुछ लक्षण बताये ….

प्रेम के 5 लक्षण हैं …..
1…जो बदले में कुछ ना माँगे …
2…निर्दंभता …transparency …आरपारता ..
3…सामनेवाले ने कितनी भी भूल की हो …उसको तुरंत क्षमा कर देना ….
4…बदला लेनेकी वृत्ति ना हो ….
5…प्रेम रूठता नहीं ….
6…प्रेम समाधान करता है।

 

मोरारी बापू के शब्द 
मानस शहीद 
जय सियाराम

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