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Guru Mahima by Morari Bapu

Guru Mahima by Morari Bapu 

गुरु महिमा मोरारी बापू द्वारा

 

गुरु महिमा(Guru Mahima) जितनी गाई जाये उतनी कम है। गुरु की महिमा को तो कोई भी पूरी तरह से नहीं गा सकता है। जीवन में सद्गुरु का होना बहुत ही जरुरी है। अब सद्गुरु किसको बनायें? लोगों को डर रहता है हमारे सद्गुरु तो कोई नहीं है किसे बनायें?

 

इस संदर्भ में मोरारी बापू मानस शंकर (केदारनाथ) में राम कथा कहते हुए बता रहे हैं
मैं एक समय था ..मेरी एक रट ..एक धुन लगा रखी थी मैने ..जब रामायण पढ़ता था ..और फिर निष्ठा बढ़ती गयी ..बढ़ती गयी ..तो मैं यही बोलता रहता था मन में ..की दादा ..मेरे विचार तू ..मेरा आयुष्य तू ..मेरी आबरू तू ..मेरी वाणी तू ..मेरा ईश्वर तू ..मेरा सबकुछ तू..

कई लोग मुझे चिट्ठीयाँ लिखते हैं ..कि बापू हमारा सब कुछ व्यास्पीठ बन चुकी है।

ज़िसके आश्रित बन जाये ना तो केवल उसके साक्षी गोपाल बन जाओ ..मैं बस तुझे देखूँ ..बस ..मैं इतना आनंद लूँ कि मैं तेरी हाज़री में था ..तेरी उपस्थिती के एहसास में था।

Who is guru in Hindi : गुरु कौन है ? : Guru kaun hai ?

 

कह दो अपने गुरू को ..दर्द भी तू ..

 

एक समय की मेरी धुन है साहब ..अभी भी कोई इतनी समझ नहीं ..तो तभी क्या खाक समझ होगी ? लेकिन ये मेरा मंत्र था की दादा तू मेरा सबकुछ है ..मेरा मंत्र तू ..मेरी मूर्ती तू ..मेरा मानस तू ..मेरा मारूती तू ..मेरी माला तू ..सबकुछ तू ..

दर्द भी तू ..चैन भी तू ..दरस भी तू ..नैन भी तू ..
गुरू ही हमारी पीड़ा है ..हमें कौनसे दुख है बताओ ..कुछ दिन गुरू को ना मिले तो पीड़ा ..यही तो 1 पीड़ा है ..रोटी ..इज्जत ..मकान सबकुछ अपनी औकाद के अनुसार दाता ने दे रखा है ..मैं तो अपना अनुभव दोहराऊं की कभी चूकना तो मुश्किल है। क्यूँकी स्वभाव बन चुका है ..लेकिन कभी विस्मरण हो जाये तो लगता है कि इससे तो better है मर जायें की गुरू याद ना आया ..जीवन का क्या अर्थ है ?

 

सबकुछ वो बन जाता है ..यही तो पीड़ा है ..

 

याद रखना ..गुरू महापीड़ा है। ..गुरू महारोग है ..बचना ..और साहस किया तो वो हमें बचा लेता है।
जो गुरू कृपा से कहना चाहूँ। आपसे बातें करना चाहूँ ..प्रमाण मत खोजना ..कुछ मिल भी जायेंगे प्रमाण अवश्य ..मेरे पास नहीं ..आपको मिल भी जाये ..और कभी ना भी मिले ..वचन पर भरोसा करना ..सदगुरू बैद बचन बिस्वासा …मैं तो इसी भरोसे पे जिये जा रहा हूँ की दादा ने कहा बस ..निहाल ..बोले सो निहाल ..बोले सो निहाल ..बोले सो निहाल ..सत श्री अकाल ..
गुरू वचन के आगे विकल्प ..मैने कल भी कहा था गुरू को कोई विकल्प नहीं ..ये गुरू नहीं ये गुरू हो तो चले ..ऐसा नहीं चलता ..साड़ी खरीदने जाओ तो ये हो सकता है की ये साड़ी नहीं ..ये साड़ी ……श्री राम मिल की धोती दो ..फलां की नहीं ..उसमें विकल्प होते हैं ..गुरू में विकल्प नहीं होता।
तुम्हारा कोई स्वार्थ ना हो जनम जनम में कोई पहचान ना हो ..कुछ भी ना हो ..जाना ना हो ..सुना भी ना हो ..लेकिन किसी को देखकर आँखें नम हो जाने लगे तो समझना कुछ अज्ञात रिश्ता है। …केवल देखते ही ..फिर सुनने से और कुछ होने लगे तो समझना की अज्ञात कोई ऊपर ऊपर का नहीं है ..ज़्यादा गहरा है।

 
देखे और दीवाना कर दे ..फिर उसको कोई मित्र कह दे तो मुझे कोई आपत्ती नहीं ..इसको आप प्रियतम कह दो तो भी मुझे आपत्ती नहीं ..लेकिन पवित्र भाव से ये घटना घटे तो समझना कोई बुद्धपुरूष मेरे करीब आ रहा है ..कोई अकल्प घटना भीतर घटे ..कोई लेना देना नहीं ..कोई कल्पना भी हमने नहीं की है ..ना देखा ..ना सोचा ..ना समझा ..ना देखा ना भाला ..ना आरजू ..
गुरू ऐसे मिल जाता है मेरे भाई बहन और जब ऐसे में मिलता है ना तब पता लगता है की बहुत सस्ते में मिल गया है।
सरे राह चलते चलते ..मुझे कोई मिल गया था ..
जितनी हमारी पाकीजगी ज़्यादा होगी उतनी ये भनक हमें ज़्यादा सुनायी देगी ..पाकीजगी का अर्थ है पावित्रय् ..कोई मिल गया था ..कोई गुमनाम ..पता नहीं कौन था ये ..यूँही कोई मिल गया था ..यूँही खेल खेल में ..चलते चलते ..निश्चित नहीं था की राम मिलें ..कृष्ण मिले …अल्लाह ताला मिले ..कोई …..उनके लिये कोई शब्द ज़्यादा अच्छा लगता है ..शीश देकर मिले तो भी सस्ता जान ..गुरू के बारे में ऐसा लिखा गया है।

 

 

अब इसके 2 अर्थ हैं ..मुख्य अर्थ तो है की हम चल रहे थे ..कोई मिल गया ..ये भी एक यात्रा है अध्यात्मिक ..की साधना करते.. करते..करते..करते .. यूँही कोई मिल गया …साधक की यात्रा चल रही थी और अचानक कोई मिल गया ..सोचा नहीं था ..इतनी जल्दी कोई मिल जायेगा।

दूसरा अर्थ ये है कि हम तो बैठे थे माया में ..कीचड में ..कोई चलते चलते हमें मिल गया। कोई अपना स्थान छोडकर हमारे पास आया। ..हम तो बैठे थे बिल्कुल मोह के कूप में पड़े थे ..अंधेरे में फंसे थे ..हमें कहाँ सूझ की किस रास्ते पे चलें ..लेकिन कोई करूणा करके स्वयं चलते चलते हमारे तक आ गया।
पहला.. प्रयास की यात्रा है ..दूसरा ..प्रसाद की यात्रा है।

जब हम चलें और कोई मिल जाये तो प्रयास …

हम बैठे रहें ..वो आकर मिले ..वो प्रसाद।

मोरारी बापू बता रहे हैं कि –

महाकाल के मंदिर में गुरू आये तो काकभूसुंडी जी खड़े नहीं हुए। ..ये गुरू द्रोह हो गया। ..गुरू को खड़ा हुआ.. नहीं हुआ कोई फरक नहीं पड़ता ..लेकिन श्रुती नियम तोडा है।
मैने बहुत बार आपको कहा है आप मंदिर में पूजा करते हैं ..मानो केदार के मंदिर में आप पूजा करते हैं ..ठीक है ..और आपका कोई गुरू हो ..किसीके चरण में आपका आश्रय हो और उस समय वो आ जाये ..आप शिव जी की पूजा आधी कर चुके हैं और गुरू आ गया ..तो शास्त्र नियम ऐसा है कि बाकी की पूजा शिव की नहीं करनी है ..गुरू की करनी है। ..क्यूँकी वो मूर्ती है ..ये मूर्तिमंत है। ..इसलिये गुरू को हमने ब्रह्मा कहा..विष्णु कहा ..शिव कहा ..

 

वो गुरू बराबर नहीं तो उसकी करनी उसको भोगनी है ..तू तेरी निष्ठा को बदबू क्यूँ लगाता है ?
बापू के शब्द
मानस शंकर
जय सियाराम बाप

This blog is written by Didi Rupa Khant. ये ब्लॉग रूपा खांट दीदी द्वारा लिखा गया है।

Read : सम्पूर्ण राम कथा

 

 

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