Bhagwan kahan hai?

Bhagwan kahan hai?

भगवान कहाँ हैं?

ये एक ऐसा प्रश्न है जिसके बारे में सब जानना चाहते हैं। भगवान को पाना तो सब चाहते हैं लेकिन उन्हें खोजना कोई नही चाहता। ये सोचने वाली बात है की-

भगवान कहाँ हैं?(Bhagwan kahan hai? )
भगवान कहाँ रहते हैं?(Bhagwan kahan rehte hain?)
भगवान का एड्रेस/पता क्या है?(Bhagwan ka address kya hai?)
भगवान को कहाँ ढूंढे? (Bhagwan ko kahan dundhe?)

 

सबसे पहले मैं आपको कबीरदास जी के माध्यम से उत्तर देना चाहूंगा। कबीरदास जी कहते हैं हे भाई!तू मुझे कहाँ ढूंढ रहा है। मैं तो तेरे पास में ही हूँ — 

मोको कहां ढूँढे रे बन्दे ,मैं तो तेरे पास में।
ना तीरथ मे ना मूरत में, ना एकान्त निवास में।।

ना मंदिर में ना मस्जिद में ना काबे कैलास में।
मैं तो तेरे पास में बन्दे मैं तो तेरे पास में।।

खोजि होए तुरत मिल जाउं इक पल की तालास में।
कहत कबीर सुनो भई साधो मैं तो हूं विश्वास में।।

कबीरदास जी कहते हैं तू मुझे कहाँ ढूंढ रहा है भाई! मैं तो तेरे पास में ही हूँ। जहाँ पर तुम्हारा विश्वास है मैं वहां पर हूँ। और कहीं भी नही मिलूंगा। ना मूर्ति में, ना माला में, ना मस्जिद में , कहीं भी आपको नही मिलूंगा। हाँ आप मुझे खोजोगे तो आपको मिल जाऊंगा। और तुरंत मिल जाऊंगा। क्योकि मैं केवल और केवल विश्वास में हूँ।

आप नीचे दिए गए विडियो को भी देख सकते हैं — 

फिर गरुड़ पुराण में एक श्लोक आता है की — 

न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये।
भावेषु विद्यते देवः तस्मात् भावो हि कारणम्॥ 

अर्थ : – ‘देवता न तो काष्ठ(लकड़ी) में रहते हैं, न पत्थर में और न मिट्टी में रहते हैं। भाव में ही देवता का निवास है, इसलिये भाव को ही मुख्य मानना चाहिये।’

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कहने का अर्थ ये है की जहाँ पर भक्त का भाव होता है वहां पर भगवान भी विराजमान हो जाते हैं । आप इसको प्रल्हाद जी की कथा के माध्यम से समझिये ।

आप सभी ने भक्त प्रल्हाद जी के बारे में तो सुना होगा? प्रल्हाद जी कहते हैं की भगवान कण-कण में व्याप्त है। और उन्हें अपनी इस बात पर पूरा विश्वास भी था। जिस कारण से उनके पिता ने पूछा- क्या तेरा भगवान मुजेमे है ?
तो प्रल्हाद जी ने कहा की हाँ! वो आपके अंदर भी है।

फिर पूछा – “क्या वो तेरे अंदर भी बैठा है?”
प्रल्हाद जी ने कहा -“हाँ पिताजी! वो मेरे अंदर भी बैठा है।”

फिर पूछा की क्या वो इस तलवार में भी है?
प्रल्हाद जी ने कहा की – हाँ वो इसमें भी है।

फिर पूछते हैं की तेरा विष्णु क्या इस खम्भे में भी है?
प्रल्हाद जी कहते हैं की – ” मो में , तो में, खडग खम्भ में, जहाँ देखो तहाँ राम। “

वो आपके अंदर है , मेरे अंदर है, इस तलवार में है और इस खम्भे में भी है। पिताजी वो तो हर जगह है।

तभी उनके पिता ने खंभा तोड़ दिया और उसमे से भगवान विष्णु नरसिंह रूप धारण करके प्रकट हो गए।

अब देखिये प्रल्हाद जी को विश्वास था तभी तो भगवान आये।

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Bhagwan Ka Address/Pata  : भगवान का एड्रेस/पता 

एक बार नारद जी भगवान से मिलते हैं और पूछते हैं की भगवान आप कहाँ रहते हैं? क्या आपका निवास वैकुण्ठ में है? क्या आप योगियों के ह्रदय में रहते हैं?

तब भगवान कहते हैं -नारदजी! आज में आपको अपना पता बताने जा रहा हूँ। आप मेरा एड्रेस नोट कर लो।

नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च ।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ! ।।

अर्थ:- हे देवर्षि ! मैं न तो वैकुण्ठ में निवास करता हूँ और न ही योगीजनो के ह्रदय में मेरा निवास होता है। मैं तो उन भक्तों के पास सदैव रहता हूँ जहाँ मेरे भक्त मुझको चित्त से लीं और तन्मय होकर मुझको भजते है। और मेरे मधुर नामों का संकीर्तन करते है।

भगवान ने एकदम साफ़ कहा है की जहाँ पर विश्वास है, जहाँ पर भाव है और जहाँ पर मेरे भक्त मुझे ह्रदय से याद करते हैं , मेरे नाम का गान करते हैं मैं वहां पर रहता हूँ ।

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