Bhagwan aur Bhakt ka Prem

Bhagwan aur Bhakt ka Prem 

भगवान और भक्त का प्रेम

 

आज हर चीज के लिए सबको सबूत चाहिए। प्रेम का भी सबूत चाहिए। लेकिन भगवान देने को तैयार है परन्तु आप पहले भगवान से प्रेम तो करें। भगवान अपने भक्तों से अत्यधिक प्रेम करते है। भगवान अपने भक्त के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

 
श्रीमद्भागवत पुराण में एक कथा आती है। एक राजा थे अम्बरीष। भगवान के भक्त थे। और इतने बड़े भक्त थे की भगवान ने सुदर्शन चक्र को इनकी रक्षा के लिए नियुक्त किया हुआ था। एक बार ऋषि दुर्वासा को लगा की अम्बरीष राजा ने इनका अपमान किया।  इन्हें भोजन कराये बिना खुद भोजन कर लिया। जिस कारण ऋषि ने अम्बरीष राजा को मारने के लिए एक कृत्या नाम की दैत्य को पैदा करते है लेकिन सुदर्शन चक्र कृत्या को मार देता है और फिर दुर्वासा जी के पीछे लग जाता है।

 
दुर्वासा जी आगे आगे और सुदर्शन चक्र पीछे-पीछे। उनकी रक्षा ब्रह्मा, शिव और अन्य कोई देवता नही कर पाता। अंत में वे भगवान विष्णु के पास रक्षा के लिए जाते है तब भगवान कहते हैं —

 

श्रीभगवानने कहा—दुर्वासा जी! मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूँ।(अहं भक्तपराधीनो) मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है।

 

मेरे सीधे-सादे सरल भक्तों ने मेरे हृदय को अपने हाथ में कर रखा है। भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे। अपने भक्तों का एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। इसलिये अपने साधु स्वभाव भक्तों को छोड़कर मैं न तो अपने-आपको चाहता हूँ और न अपनी अर्द्धांगिनी विनाश रहित लक्ष्मी को।

 

जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक—सबको छोड़कर केवल मेरी शरण में आ गये हैं, उन्हें छोड़ने का संकल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ?

 
जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्य से सदाचारी पति को वश में कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदय को प्रेम-बन्धन से बाँध रखने वाले समदर्शी साधु भक्ति के द्वारा मुझे अपने वश में कर लेते हैं।

 
मेरे अनन्य प्रेमी भक्त सेवा से ही अपने को परिपूर्ण—कृतकृत्य मानते हैं।

 

मेरी सेवा के फलस्वरूप जब उन्हें सालोक्य, सारुप्य आदि मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं तब वे उन्हें भी स्वीकार करना नहीं चाहते; फिर समय के फेर से नष्ट हो जाने वाली वस्तुओं की तो बात ही क्या है।

 

दुर्वासाजी! मैं आपसे और क्या कहूँ, मेरे प्रेमी भक्त तो मेरे हृदय हैं और उन प्रेमी भक्तों का हृदय स्वयं मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते तथा मैं उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता।

 
दुर्वासाजी! सुनिये, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ। जिसका अनिष्ट करने से आपको इस विपत्ति में पड़ना पड़ा है, आप उसी के पास जाइये। निरपराध साधुओं के अनिष्ट की चेष्टा से अनिष्ट करने वाले का ही अमंगल होता है। इसमें सन्देह नहीं कि ब्राम्हणों के लिये तपस्या और विद्या परम कल्याण के साधन हैं।

 

परन्तु यदि ब्राम्हण उद्दण्ड और अन्यायी हो जाय तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं। दुर्वासा जी! आपका कल्याण हो। आप नाभागनन्दन परम भाग्यशाली राजा अम्बरीष के पास जाइये और उनसे क्षमा माँगिये। तब आपको शान्ति मिलेगी।

इसके बाद दुर्वासा जी राजा अम्बरीष के पास गए और उनसे क्षमा मांगी। और अम्बरीष जी ने सुदर्शन चक्र को शांत कर दिया।

 

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One thought on “Bhagwan aur Bhakt ka Prem

  1. Bhai bahgwan KO Dekha hai kya koi cheese hai koi aadmi hai ya koi janwar hai tabkoi pakshi hai Jo unse prem kare Kabhi koi bhekari we prem Kiya hai ya koi lachar aadmi se jisme felling he Nahi usese pyar kya Hoga ghanta dot.

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