Sati Shiv story(katha) in hindi

Sati Shiv story(katha) in hindi

सती शिव कथा 

संत महात्मा बताते हैं-ये जो रामचरितमानस की चौपाई हैं वो साधारण चौपाई नही है। एक एक मन्त्र है। इसलिए हो सके तो चौपाई भी याद कर लीजिये

एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥ संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥

एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य ऋषि के पास गए। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषि ने संपूर्ण जगत्‌ के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया॥

 

गोस्वामी जी ने शिव जी के साथ कोई विशेषण नही लगाया है सिर्फ सती जी के साथ लगाया है(जगज्जननी भवानी)। और जो अपने गुणों को लेकर राम कथा, कृष्ण कथा सुनते हैं। जो कहते हैं मैं इतना बड़ा हूँ, मैं इतना धनवान हूँ। वो वास्तव में कथा सुन ही नही सकता है। सारे गुण त्याग कर, परमात्मा का प्रेम लेकर कथा सुनो तो जरूर आनंद आएगा। अब आगे कथा में प्रवेश करते हैं।

 

अगस्त्यजी ने रामकथा विस्तार से कही, जिसको महेश्वर ने परम सुख मानकर सुना लेकिन ये नही बताया की सती जी ने सुनी या नही सुनी। फिर ऋषि ने शिवजी से सुंदर हरिभक्ति पूछी और शिवजी ने उनको अधिकारी पाकर (रहस्य सहित) भक्ति का निरूपण किया॥

श्री रघुनाथजी के गुणों की कथाएँ कहते-सुनते कुछ दिनों तक शिवजी वहाँ रहे। फिर मुनि से विदा माँगकर शिवजी दक्षकुमारी सतीजी के साथ घर (कैलास) को चले॥

उन्हीं दिनों पृथ्वी का भार उतारने के लिए श्री हरि ने रघुवंश में अवतार लिया था। वे अविनाशी भगवान्‌ उस समय पिता के वचन से राज्य का त्याग करके तपस्वी या साधु वेश में दण्डकवन में विचर रहे थे॥ सीता जी का हरण हो गया है और रामजी वियोग में सीता जी को धुंध रहे हैं।

 

अब जाते समय शिव जी के मन में एक ही अभिलाषा है। जिन रामजी की कथा मैंने सुनी वो एक बार दर्शन दे दें। एक बार किसी तरह से उनका दर्शन हो जाये। हृदयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।

 

भगवन शिव को भेद खुलने का भी डर है। कहीं मैं भगवान के पास जाऊं और भगवान की लीला में दखल पड़ जाये। परन्तु दर्शन के लोभ से उनके नेत्र ललचा रहे हैं॥ लेकिन सोच रहे हैं मैं जो पास नहीं जाता हूँ तो बड़ा पछतावा रह जाएगा। इस प्रकार शिवजी विचार करते थे, परन्तु कोई भी युक्ति ठीक नहीं बैठती थी॥ इस प्रकार महादेवजी चिन्ता के वश हो गए।

 

श्री रघुनाथजी मनुष्यों की भाँति विरह से व्याकुल हैं और दोनों भाई वन में सीता को खोजते हुए फिर रहे हैं। श्री शिवजी ने उसी अवसर पर श्री रामजी को देखा और उनके हृदय में बहुत भारी आनंद उत्पन्न हुआ। उन शोभा के समुद्र (श्री रामचंद्रजी) को शिवजी ने नेत्र भरकर देखा, परन्तु सोचा ये भगवान से मिलने का अवसर नही है क्योंकि भगवान लीला कर रहे हैं॥

 

भगवान शिव ने दूर से ही प्रणाम किया। जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन॥ इस प्रकार भगवान की जय जयकार करते हुए भगवान शिव वहां से चले गए।

भगवान शिव बहुत प्रसन्न मन से चले जा रहे हैं और साथ में सती जी हैं। जब सतीजी ने भगवान शंकर को ये सब करते हुए देखा तो इनके मन में बड़ा संदेह उत्पन्न हो गया। वे मन ही मन कहने लगीं कि शंकरजी की सारा जगत्‌ वंदना करता है, वे जगत्‌ के ईश्वर हैं, देवता, मनुष्य, मुनि सब उनके प्रति सिर नवाते हैं॥ इन्होने एक राजपुत्र को सच्चिदानंद परधाम कहकर प्रणाम किया और उनके रूप को  देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गए कि अब तक उनके हृदय में प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती। अरे जो सर्वज्ञ हैं ,ज्ञान के भंडार, लक्ष्मीपति और असुरों के शत्रु भगवान्‌ विष्णु क्या अज्ञानी की तरह स्त्री को खोजेंगे?

लेकिन फिर सोचती हैं शिवजी के वचन भी झूठे नहीं हो सकते। सब कोई जानते हैं कि शिवजी सर्वज्ञ हैं।

सती के मन में इस प्रकार का अपार संदेह उठ खड़ा हुआ, सती जी नही समझ पा रही है की क्या किया जाये?

सती जी ने कुछ नही कहा पर भोले नाथ सब जान गए।  वे बोले- हे सती! सुनो, ऐसा संदेह मन में कभी न रखना चाहिए॥

 

जिनकी कथा का अगस्त्य ऋषि ने गान किया और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को सुनाई, ये वही मेरे इष्टदेव श्री रघुवीरजी हैं, जिनकी सेवा ज्ञानी मुनि सदा किया करते हैं॥ भगवान्‌ श्री रामजी ने अपने भक्तों के हित के लिए (अपनी इच्छा से) रघुकुल के मणिरूप में अवतार लिया है।

शिवजी ने बहुत बार समझाया, फिर भी सतीजी के हृदय में उनका उपदेश नहीं बैठा। तब महादेवजी मन में भगवान्‌ की माया का बल जानकर मुस्कुराते हुए बोले-

जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥ तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं॥

जो तुम्हारे मन में बहुत संदेह है तो तुम जाकर परीक्षा क्यों नहीं लेती? जब तक तुम मेरे पास लौट आओगी तब तक मैं इसी बड़ की छाँह में बैठा हूँ॥

लेकिन शिवजी ने ये भी कह दिया अगर परीक्षा लेनी तो हो विवेक से लेना। अविवेक से लोगे तो सब नुकसान ही होगा।

 

पेज 2 पर जाइये

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.