Sati Death story(katha) in hindi

Sati Deh tyag : सती देह त्याग

सती ने वहां पर देखा। सभी लोग सभा में बैठे हैं और आहुतियां दी जा रही है लेकिन एक नाम सती जी के कान में नही पड़ रहा है। क्योंकि शिव का अपमान करने के लिए वो यज्ञ हो रहा था।  परन्तु उनसे शिवजी का अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदय में कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभा को हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं-

हे सभासदों और सब मुनीश्वरो! सुनो। जिन लोगों ने यहाँ शिवजी की निंदा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भलीभाँति पछताएँगे॥ हाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति श्री विष्णु भगवान की निंदा सुनी जाए, वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस (निंदा करने वाले) की जीभ काट लें और नहीं तो कान मूँदकर वहाँ से भाग जाएँ॥

सती बोली मेरा पिता दक्ष नही हैं। यदि दक्ष होता तो मेरे पति को पहचानता। क्योंकि मेरे पति शिव का संसार में कोई बेरि ही नही है। ये अदक्ष है।

 

त्रिपुर दैत्य को मारने वाले भगवान महेश्वर सम्पूर्ण जगत की आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सबका हित करने वाले हैं। मेरा मंदबुद्धि पिता उनकी निंदा करता है और मेरा यह शरीर दक्ष ही के वीर्य से उत्पन्न है॥

इसलिए चन्द्रमा को ललाट पर धारण करने वाले वृषकेतु शिवजी को हृदय में धारण करके मैं इस शरीर को तुरंत ही त्याग दूँगी।

 

सती जी ने जहाँ पर देवताओं के नाम की आहुति दे रही थी वहीँ पर ध्यान में बैठ गई और सती के शरीर से योगाग्नि निकली। और उस योगाग्नि में जलकर सती जी भस्म हो गई है। सती ने मरते समय भगवान हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्म में शिवजी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के शरीर से जन्म लिया॥ सारी त्रिलोकी में हा-हाहाकार मच गया।

शिव के कोप से अब कौन रक्षा करे। जब नारद जी ने देखा तो भगवान शिव के पास पहुंचे हैं। और भगवान शिव को खबर दी है।

Shiva-Daksh and Veerbhadra story(katha)  : शिव-दक्ष और वीरभद्र कथा

भगवान शिव ने अपने दोनों हाथों से अपनी जटाओं को पकड़ लिया है। और अपनी जटाओं को फेंककर चट्टान पर दे मारा है। वीरभद्र नाम के गण प्रकट हो गए हैं।

वीरभद्र को भगवान शिव ने कहा तू अभी जा और दक्ष के यज्ञ का विध्वसं कर दे। वीरभद्र  ने  स्त्रियों के बैठने का स्थान नष्ट कर दिया। और अंत में यजमान दक्ष का मस्तक धड़ से अलग करके यज्ञ में आहुति प्रदान कर दी ओम नमः शिवाय सवा हा। दक्ष की जगत्प्रसिद्ध वही गति हुई, जो शिवद्रोही की हुआ करती है।

सब भयभीत हो गए शिव के कोप से कौन रक्षा करे?

उसी क्षण ब्रह्मा जी के पास गए। सभी मिलकर भगवान शिव के पास गए हैं और प्रार्थना की है। उसी समय भगवान शिव ने अपने त्रिशूल सेवक को आज्ञा दी । त्रिशूल बकरे का मस्तक लाया है और शिव ने बकरे का मस्तक दक्ष की धड़ पर रखा है। भगवान शिव ने दक्ष को जीवन दान दिया है। और शिव की दक्षता में यज्ञ प्रारम्भ हुआ है। यज्ञ भगवान प्रकट हुए हैं। और उन्होंने बताया की ब्रह्मा, विष्णु और महेश हम तीनों एक ही है। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते है, विष्णु जी पालन करते है और शिव जी संहार करते हैं। इस कारण से हमने तीन रूप धारण किया है जबकि हम एक ही है।

इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने सिर पर धारण कर शिव ने तांडव नृत्य किया। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देख कर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा सती के शरीर के टुकड़े करने शुरू कर दिए।
इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किए आभूषण जहां-जहां गिरे वहां-वहां शक्ति पीठ अस्तित्व में आ गए। देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का जिक्र है, तो देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गई है। आगे पढ़ें… 

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