Parvati birth story(katha) in hindi

Parvati pariksha by Saptarishi :  सप्तर्षि द्वारा पार्वती जी की परीक्षा 

उसी समय सप्तर्षि शिवजी के पास आए। शिवजी ने उनसे कहा-आप जाकर पार्वती के प्रेम की परीक्षा लीजिये।

कुछ लोग कहते हैं की भोले नाथ ने पार्वती की परीक्षा क्यों ली? संत जन कहते हैं क्योंकि सती ने रामजी की परीक्षा ली थी। इसलिए भोले नाथ ने कहा इसने मेरे राम की परीक्षा ली इसलिए मैं अब सती की परीक्षा लूंगा। इसलिए भोले नाथ ने सप्तऋषियों को आज पार्वती के पास भेजा है।

 

ऋषियों ने (वहाँ जाकर) पार्वती से कहा- हे शैलकुमारी! सुनो, तुम किसलिए इतना कठोर तप कर रही हो? तुम किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो? हमसे अपना सच्चा भेद क्यों नहीं कहतीं?

 

पार्वती ने कहा- हे मुनियों! मेरे गुरुदेव नारद जी की प्रेरणा से मैं सदा शिवजी को ही पति बनाना चाहती हूँ॥

 

पार्वतीजी की बात सुनते ही ऋषि लोग हँस पड़े और बोले- तुम्हारा शरीर पर्वत से ही तो उत्पन्न हुआ है! भला, कहो तो नारद का उपदेश सुनकर आज तक किसका घर बसा है? जो स्त्री-पुरुष नारद की सीख सुनते हैं, वे घर-बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं। उनके वचनों पर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेषवाला, नर-कपालों की माला पहनने वाला, कुलहीन, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखने वाला है॥

 

अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिए अच्छा वर विचारा है। वह दोषों से रहित, सारे सद्‍गुणों की राशि, लक्ष्मी का स्वामी और वैकुण्ठपुरी का रहने वाला है। हम ऐसे वर को लाकर तुमसे मिला देंगे। पार्वती जी को खूब भड़काया है।

 

यह सुनते ही पार्वतीजी हँसकर बोलीं- आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वत से उत्पन्न हुआ है, इसलिए हठ नहीं छूटेगा, शरीर भले ही छूट जाए। 

नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरउँ॥ गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥

अतः मैं नारदजी के वचनों को नहीं छोड़ूँगी, चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। क्योंकि जिसको गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्न में भी सुगम नहीं होती॥

 

जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥ तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥ मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजी के उपदेश को न छोड़ूँगी॥ जगज्जननी पार्वतीजी ने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप अपने घर जाइए, बहुत देर हो गई।

 

शिवजी में पार्वतीजी का ऐसा) प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले- हे जगज्जननी! हे भवानी! आपकी जय हो! जय हो! आप माया हैं और शिवजी भगवान हैं। आप दोनों समस्त जगत के माता-पिता हैं। यह कहकर मुनि पार्वतीजी के चरणों में सिर नवाकर चल दिए।

मुनियों ने जाकर हिमवान्‌ को पार्वतीजी के पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आए, फिर सप्तर्षियों ने शिवजी के पास जाकर उनको पार्वतीजी की सारी कथा सुनाई॥

 

पार्वतीजी का प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न हो गए। तब शिवजी मन को स्थिर करके श्री रघुनाथजी का ध्यान करने लगे॥

 

उसी समय तारक नाम का असुर हुआ। उसने ब्रह्मा जी से वरदान पाया था शिव के पुत्र से मेरी मृत्यु हो। इस प्रकार उसने सब लोक और लोकपालों को जीत लिया, सब देवता सुख और सम्पत्ति से रहित हो गए॥  देवता उसके साथ बहुत तरह की लड़ाइयाँ लड़कर हार गए। तब उन्होंने ब्रह्माजी के पास जाकर पुकार मचाई। ब्रह्माजी ने सब देवताओं को दुःखी देखा॥

 

ब्रह्माजी ने सबको समझाकर कहा- इस दैत्य की मृत्यु तब होगी जब शिवजी के वीर्य से पुत्र उत्पन्न हो, इसको युद्ध में वही जीतेगा॥

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