Parvati birth story(katha) in hindi

Parvati  birth story(katha) in hindi

पार्वती माता जन्म कथा(कहानी)

आपने पढ़ा की सती ने श्री राम जी की परीक्षा ली। भगवन शंकर जी ने सती का त्याग किया और सती ने फिर अपनी देख का त्याग कर दिया।

सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥ तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥सती ने मरते समय भगवान हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्म में शिवजी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के शरीर से जन्म लिया॥

क्योंकि पर्वतराज हिमालय के यहाँ जन्म हुआ है। इसलिए पार्वती नाम पड़ा है। जब से उमाजी हिमाचल के घर जन्मीं, तबसे वहाँ सारी सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ छा गईं। सारी नदियों में पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते हैं। सब जीवों ने अपना स्वाभाविक बैर छोड़ दिया और पर्वत पर सभी परस्पर प्रेम करते हैं॥ पर्वतराज के घर नित्य नए-नए मंगलोत्सव होते हैं, जिसका ब्रह्मादि यश गाते हैं॥

 

अब नारदजी हिमाचल के घर पधारे हैं। हिमाचल ने अपने सौभाग्य का बहुत बखान किया और पुत्री को बुलाकर नारद मुनि के चरणों पर डाल दिया॥ और कहा- हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी सर्वत्र पहुँच है। अतः आप हृदय में विचार कर कन्या के दोष-गुण कहिए॥

 

नारद मुनि ने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणी से कहा- तुम्हारी कन्या सब गुणों की खान है। यह स्वभाव से ही सुंदर, सुशील और समझदार है। उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं॥ कन्या सब सुलक्षणों से सम्पन्न है, यह अपने पति को सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इससे इसके माता-पिता यश पावेंगे॥ यह सारे जगत में पूज्य होगी और इसकी सेवा करने से कुछ भी दुर्लभ न होगा। संसार में स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रता रूपी तलवार की धार पर चढ़ जाएँगी॥

हे पर्वतराज! तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है। अब इसमें जो दो-चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। लेकिन ये गुण इनके पति में होंगे।

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष। योगी, जटाधारी, निष्काम हृदय, नंगा और अमंगल वेष वाला, ऐसा पति इसको मिलेगा।

 

नारद मुनि की वाणी सुनकर और उसको हृदय में सत्य जानकर पति-पत्नी (हिमवान्‌ और मैना) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं। क्योंकि पार्वती जी जानती हैं मेरे पति तो शिव ही हैं।

देवर्षि की वाणी झूठी न होगी, यह विचार कर हिमवान्‌, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर पर्वतराज ने कहा- नारद जी!, अब क्या उपाय किया जाए?

 

मुनीश्वर ने कहा- हे हिमवान्‌! सुनो, विधाता ने ललाट पर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते॥ ये सारे अवगुण सद्गुणों में बदल सकते हैं अगर इनका विवाह भोले नाथ से हो जाये क्योंकि ये सारे गुण उनमें मौजूद हैं।

 

हिमालयराज ने पूछा इसके लिए क्या करना पड़ेगा?

नारदजी बोले- भगवान शिव को प्रसन्न करना बहुत ही कठिन है क्योंकि वो अकाम है। उनकी कोई कामना नही है। लेकिन मेरा विश्वास है वो तप करने से जल्दी रीझ जायेंगे। आप पार्वती को भोले नाथ का तप करने के लिए भेजो। क्योंकि संसार में वर अनेक हैं, पर इसके लिए शिवजी को छोड़कर दूसरा वर नहीं है॥

 

ऐसा कहकर सबको आशीर्वाद देकर नारद जी वहां से चले गए। पति को एकान्त में पाकर मैना ने कहा- हे नाथ! यदि पार्वती के योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ (मूर्ख) होते हैं।

तब हिमवान्‌ ने प्रेम से कहा- चाहे चन्द्रमा में अग्नि प्रकट हो जाए, पर नारदजी के वचन झूठे नहीं हो सकते॥ सब सोच छोड़कर श्री भगवान का स्मरण करो, जिन्होंने पार्वती को रचा है, वे ही कल्याण करेंगे॥ अब यदि तुम्हें कन्या पर प्रेम है, तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे, जिससे शिवजी मिल जाएँ। दूसरे उपाय से यह क्लेश नहीं मिटेगा॥

 

पति के वचन सुन मन में प्रसन्न होकर मैना उठकर तुरंत पार्वती के पास गईं। पार्वती को देखकर उनकी आँखों में आँसू भर आए। उसे स्नेह के साथ गोद में बैठा लिया॥ फिर बार-बार उसे हृदय से लगाने लगीं। प्रेम से मैना का गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता।

माता के मन की दशा को जानकर वे माता को सुख देने वाली कोमल वाणी से बोलीं- माँ तप के बल से सब कुछ संभव है।

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