Ramayan : Sita haran story(katha) in hindi

Ramayan : Sita haran story(katha) in hindi

रामायण : सीता हरण कहानी(कथा)

अब तक आपने पढ़ा की भगवान राम ने किस प्रकार अगस्त्य मुनि और सुतीक्ष्ण मुनि पर कृपा की है। यहाँ से तुलसीदास जी सीता हरण की लीला प्रारम्भ कर रहे हैं। 

 

Ram-Laxman and Surpanakha : राम-लक्ष्मण और शूर्पणखा

सूपनखा रावन कै बहिनी। शूर्पणखा नामक रावण की एक बहिन थी। राम और लक्ष्मण दोनों राजकुमारों को देखकर विकल (काम से पीड़ित) हो गई। वह सुन्दर रूप धरकर प्रभु के पास जाकर और बहुत मुस्कुराकर वचन बोली- न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री। तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी।

और राम जी से कहती हैं मुझे कहीं भी कोई भी सुंदर पुरुष नही मिला है। अब तुमको देखकर कुछ मन माना (चित्त ठहरा) है॥

सीताजी की ओर देखकर प्रभु श्री रामजी ने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है। तब वह लक्ष्मणजी के पास गई।

लक्ष्मणजी ने कहा- हे सुंदरी! सुन, मैं तो रामजी का दास हूँ। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुर के राजा है, वे जो कुछ करें, उन्हें सब फबता है॥

 

वह फिर राम जी के पास आई है। प्रभु ने उसे फिर लक्ष्मणजी के पास भेज दिया। लक्ष्मणजी ने कहा- तुम्हें वही वरेगा, जो लज्जा को जो निपट निर्लज्ज होगा।

तब वह खिसियायी हुई (क्रुद्ध होकर) श्री रामजी के पास गई और उसने अपना भयंकर रूप प्रकट किया। सीताजी को भयभीत देखकर श्री रघुनाथजी ने लक्ष्मण को इशारा देकर कहा।

लक्ष्मणजी ने बड़ी फुर्ती से उसको बिना नाक-कान की कर दिया। मानो उसके हाथ रावण को चुनौती दी हो! ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥

उसकी नाक से खून बह रहा था वह रोती हुई खर-दूषण के पास गई (और बोली-) हे भाई! तुम्हारी वीरता को धिक्कार है, तुम्हारे होते हुए मेरे नाक-कान काट दिए गए।

उनके पूछने पर, शूर्पणखा ने सब बात बता दी।

 

Khar Dushan Vadh by Rama : राम द्वारा खर दूषण वध 

खर दूषण 14000 सैनिक लेके भगवान के साथ युद्ध करने आये हैं। सभी असुर मायावी हैं और भगवान के साथ युद्ध कर रहे हैं। देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत (राक्षस) चौदह हजार हैं और अयोध्यानाथ श्री रामजी अकेले हैं। देवता और मुनियों को भयभीत देखकर माया के स्वामी प्रभु ने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओं की सेना एक-दूसरे को राम रूप देखने लगी और आपस में ही युद्ध करके लड़ मरी॥

सब (‘यही राम है, इसे मारो’ इस प्रकार) राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण (मोक्ष) पद पाते हैं। कृपानिधान श्री रामजी ने यह उपाय करके क्षण भर में शत्रुओं को मार डाला॥

 

खर-दूषण का विध्वंस देखकर शूर्पणखा ने जाकर रावण को भड़काया और खूब रोयी है।

 

लंकापति रावण ने कहा- अपनी बात तो बता, किसने तेरे नाक-कान काट लिए? वह बोली- अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, जो पुरुषों में सिंह के समान हैं, वन में शिकार खेलने आए हैं। मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देंगे॥ वे शोभा के धाम हैं, ‘राम’ ऐसा उनका नाम है। उनके साथ एक तरुणी सुंदर स्त्री है॥ उस स्त्री जितनी सुंदर नारी कहीं भी नही है। उन्हीं के छोटे भाई ने मेरे नाक-कान काट डाले। मैं तेरी बहिन हूँ, यह सुनकर वे मेरी हँसी करने लगे॥ फिर खर-दूषण सहायता करने आए। लेकिन उन्होंने खर-दूषन और त्रिशिरा का वध कर डाला।

 

अब रावण ने अपनी बहन शूपर्णखा को बहुत समझाया है और रावण ने एक योजना बनाई  है।

 

इधर लक्ष्मणजी जब कंद-मूल-फल लेने के लिए वन में गए, तब (अकेले में) कृपा और सुख के समूह श्री रामचंद्रजी हँसकर जानकीजी से बोले- सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा, इसलिए जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो॥

जैसे ही राम जी ने कहा- सीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गईं। और सीताजी ने अपनी ही छाया मूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी॥ भगवान ने जो कुछ लीला रची, इस रहस्य को लक्ष्मणजी ने भी नहीं जाना। लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥

Marich vadh by Ram : राम द्वारा मारीच वध 

अब रावण मारीच के पास आया है। मारीच ने रावण से पूछा- आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आए हैं?

 

भाग्यहीन रावण ने सारी कथा अभिमान सहित उसके सामने कही और फिर कहा- तुम छल करने वाले कपटमृग(हिरन) बनो, जिस उपाय से मैं उस राजवधू को हर लाऊँ॥

 

तब मारीच ने कहा- वे मानव(राम) कोई साधारण मानव नही है साक्षात ईश्वर हैं। उनसे वैर न कीजिए। यही राजकुमार मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए गए थे। उस समय श्री रघुनाथजी ने बिना फल का बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षणभर में सौ योजन पर आ गिरा। उनसे वैर करने में भलाई नहीं है॥ जिसने ताड़का और सुबाहु को मारकर शिवजी का धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण और त्रिशिरा का वध कर डाला, ऐसा प्रचंड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है?

 

रावण ने कहा मुर्ख- तू इनकी बड़ाई कर रहा है। अगर तूने मेरी बात नही मानी तो मैं तुझे मृत्युदंड दूंगा।

अब मारीच ने सोचा की मेरी मौत निश्चित है तो क्यों ना मैं इस पापी के हाथों मरने की वजाय श्री राम चन्द्र जी के हाथों अपने प्राण त्याग दूं।

 

हृदय में ऐसा समझकर वह रावण के साथ चला। और वह मन ही मन सोचने लगा- आज तो मैं भगवान का दर्शन पाउँगा। और आज मुझे भगवान के हाथों मरकर भगवान का धाम भी मिलेगा। वह अत्यन्त ही विचित्र था, कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता। सोने का शरीर मणियों से जड़कर बनाया था॥

 

जब रावण उस वन के (जिस वन में श्री रघुनाथजी रहते थे) निकट पहुँचा, तब मारीच कपटमृग बन गया!

सीताजी ने उस परम सुंदर हिरन को देखा, तो वे कहने लगीं- हे देव! कितना सुंदर मृग है! आप इस मृग को मेरे लिए ले आइये।

 

हिरन को देखकर श्री रामजी जी ने कहा ठीक है सीता! अभी ले आता हूँ और कमर में फेंटा बाँधा और हाथ में धनुष लेकर उस पर सुंदर (दिव्य) बाण चढ़ाया। फिर प्रभु ने लक्ष्मणजी को समझाकर कहा- हे भाई! वन में बहुत से राक्षस फिरते हैं॥  तुम सीताजी की रखवाली करना।

 

श्री रामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े॥ भगवान की लीला देखिये जो माया भगवान के आधीन है। श्री रामजी माया से बने हुए मृग के पीछे दौड़ रहे हैं। वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है। कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है॥

 

फिर श्री रामचन्द्रजी ने निशाना साधकर कठोर बाण मारा, जिसके लगते ही वह घोर शब्द(लक्ष्मण-लक्ष्मण) करके पृथ्वी पर गिर पड़ा॥

बाहर से तो ये लक्ष्मण लक्ष्मण चिल्ला रहा है लेकिन अंदर राम-राम जप रहा है।

 

इधर जब सीता जी ने लक्ष्मण-लक्ष्मण चिल्लाने की आवाज सुनी तो सीता जी ने सोचा की रामजी संकट में हैं। वे बहुत ही भयभीत होकर लक्ष्मणजी से कहने लगीं॥ तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई बड़े संकट में हैं।

 

लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा- हे माता! सुनो, श्री रामजी क्या कभी स्वप्न में भी संकट में पड़ सकते हैं? इस पर जब सीताजी कुछ मर्म वचन (हृदय में चुभने वाले वचन) कहने लगीं, तब भगवान की प्रेरणा से लक्ष्मणजी का मन भी चंचल हो उठा। और लक्ष्मण ने कुटिया के चारों और लक्ष्मण रेखा खींच दी और कहा- माता! चाहे कुछ भी हो जाये जब तक हम(राम-लक्ष्मण) ना लौटे आप इस रेखा को पार न करियेगा।

और लक्ष्मण जी राम जी को ढूंढने चले गए।

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