Ramayan : Ram-Sita Vivaah Story in hindi part 3

Ramayan : Ram-Sita Vivaah Story in hindi part 3

रामायण : राम-सीता विवाह कहानी(कथा) पार्ट 3 

पार्ट 2 में आपने पढ़ा की किस तरह से भगवान श्री राम ने शिव धनुष(Shiv Dhanush) को तोडा। 

Sita-Ram jaimala : सीता-राम जयमाला 

धनुष टूट जाने पर राजा लोग ऐसे श्रीहीन (निस्तेज) हो गए, जैसे दिन में दीपक की शोभा जाती रहती है। चतुर सखी ने यह दशा देखकर समझाकर कहा- सुहावनी जयमाला पहनाओ। यह सुनकर सीताजी ने दोनों हाथों से माला उठाई, पर प्रेम में विवश होने से पहनाई नहीं जाती। (उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे हैं) मानो डंडियों सहित दो कमल चन्द्रमा को डरते हुए जयमाला दे रहे हों। इस छवि को देखकर सखियाँ गाने लगीं। तब सीताजी ने श्री रामजी के गले में जयमाला पहना दी। श्री रघुनाथजी के हृदय पर जयमाला देखकर देवता फूल बरसाने लगे। पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग तीनों लोकों में यश फैल गया कि श्री रामचन्द्रजी ने धनुष तोड़ दिया और सीताजी को वरण कर लिया। नगर के नर-नारी आरती कर रहे हैं और अपनी पूँजी (हैसियत) को भुलाकर (सामर्थ्य से बहुत अधिक) निछावर कर रहे हैं।

श्री सीता-रामजी की जोड़ी ऐसी सुशोभित हो रही है मानो सुंदरता और श्रृंगार रस एकत्र हो गए हों। सखियाँ कह रही हैं- सीते! स्वामी के चरण छुओ, किन्तु सीताजी अत्यन्त भयभीत हुई उनके चरण नहीं छूतीं। गौतमजी की स्त्री अहल्या की गति का स्मरण करके सीताजी श्री रामजी के चरणों को हाथों से स्पर्श नहीं कर रही हैं। सीताजी की अलौकिक प्रीति जानकर रघुकुल मणि श्री रामचन्द्रजी मन में हँसे।

Parshuram Sanwad : #परशुराम संवाद  

इसके बाद परशुराम जी जब पता चला हैं की शिव धनुष तोड़ दिया हैं। तो अत्यंत क्रोध में आये हैं। परशुराम जी को बहुत समझाया गया हैं। तब उन्हें पता चला की ये श्री राम साक्षात भगवान ही हैं तो शांत हुए हैं। ये कथा पूरी पढ़ने के लिए नीचे दिए ब्लू लिंक पर क्लिक कीजिये-

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जनकजी ने विश्वामित्रजी को प्रणाम किया और कहा- प्रभु ही की कृपा से श्री रामचन्द्रजी ने धनुष तोड़ा है। दोनों भाइयों ने मुझ पर कृपा की हैं अब आगे बताइये क्या किया जाये? मुनि ने कहा- हे चतुर नरेश ! राम-सीता का विवाह हो चूका हैं। जैसे ही धनुष टुटा तो विवाह तो होना ही था। सभी ये बात जानते हैं। अब जैसा विधि-विधान ब्राह्मणों, कुल के बूढ़ों और गुरुओं से पूछकर और वेदों में वर्णित हैं वैसा ही करो। अब विवाह की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। सब महाजनों को बुलाया गया, दूत भेजकर राजा दशरथ को बुलाया गया है। सुंदर मंडप तैयार किया गया है। मंडप की सोभा ऐसी हैं की ब्रह्मा भी आज देखता ही रह गया। गोस्वामी जी ने इतना वर्णन किया हैं की कोई कर ही नही सकता है।

दूत ने अयोध्या पहुंचकर राजा दशरथ जी को जनक जी की चिट्ठी दी है। हृदय में राम और लक्ष्मण हैं, हाथ में सुंदर चिट्ठी है। चिट्ठी पढ़ते समय दशरथ जी के नेत्रों में प्रेम और आनंद के आँसू आ गए , शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आई। भरतजी अपने मित्रों और भाई शत्रुघ्न के साथ जहाँ खेलते थे, वहीं समाचार पाकर वे आ गए। उस दूत ने पुरे धनुष यज्ञ की बात राजा दशरथ जी को बताई है। और अब आप भी देर ना कीजिये महाराज। जल्दी चलिए।

Ram Barat : राम जी की बारात 

राजा दशरथ जी ने अपनी पूरी नगरी को दुल्हन की तरह सजवा दिया हैं और भरतजी को बुला लिया और कहा कि जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजी की बारात में चलो। यह सुनते ही दोनों भाई (भरतजी और शत्रुघ्नजी) आनंदवश पुलक से भर गए। और सभी ने बारात में बढ़-चढ़ कर भाग लिया है। राजा दशरथ के दरवाजे पर इतनी भारी भीड़ हो रही है कि वहाँ पत्थर फेंका जाए तो वह भी पिसकर धूल हो जाए। अटारियों पर चढ़ी स्त्रियाँ मंगल थालों में आरती लिए देख रही हैं। और मंगल गीत गए रही हैं। श्री रामचन्द्रजी का स्मरण करके, गुरु की आज्ञा पाकर पृथ्वी पति दशरथजी शंख बजाकर चले। बारात देखकर देवता हर्षित हुए और सुंदर मंगलदायक फूलों की वर्षा करने लगे। बारात ऐसी बनी है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता।

जब बारात पहुंची हैं तो सुंदर स्वागत जनक जी की ओर से किया गया है। अगवानी करने वालों को जब बारात दिखाई दी, तब उनके हृदय में आनंद छा गया और शरीर रोमांच से भर गया। अगवानों को सज-धज के साथ देखकर बारातियों ने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाए। बाराती तथा अगवानों में से) कुछ लोग परस्पर मिलने के लिए हर्ष के मारे बाग छोड़कर (सरपट) दौड़ चले और ऐसे मिले मानो आनंद के दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों। राजा दशरथजी ने प्रेम सहित सब वस्तुएँ ले लीं, फिर उनकी बख्शीशें होने लगीं और वे याचकों को दे दी गईं। बरातियों के ठहरने की उत्तम व्यवस्था की गई।

पिता दशरथजी के आने का समाचार सुनकर दोनों भाइयों के हृदय में महान आनंद समाता न था। संकोचवश वे गुरु विश्वामित्रजी से कह नहीं सकते थे। आज गुरुदेव जान गए हैं और स्वयं राम लक्ष्मण के साथ दशरथ जी से मिलने जा रहे हैं। मानो सरोवर प्यासे की ओर लक्ष्य करके चला हो। जब राजा दशरथजी ने पुत्रों सहित मुनि को आते देखा, तब वे हर्षित होकर उठे और सुख के समुद्र में थाह सी लेते हुए चले। दशरथ जी ने विस्वामित्र की चरण धूल ली हैं और दोनों भाइयों ने पिता सहित गुरु वशिष्ठ जी को प्रणाम किया है। राम-लक्ष्मण ने फिर भरत और शत्रुघ्न को ह्रदय से लगा लिया है।

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