Ramayan : Ram-Sita Vivaah Story in hindi part 2

Raja Janak Dukh : राजा जनक का दुःख और क्रोध

और जनक जी कहते है मैंने जान लिया है पृथ्वी वीरों से खाली हो गई। इस धरती पर अब कोई वीर है ही नही। बीर बिहीन मही मैं जानी॥

सब अपने-अपने घर को लौट जाओ। ऐसा लगता है की मेरी बेटी का विवाह अब होगा ही नहीं। यदि मुझे पहले से पता होता की पृथ्वी वीरों से शून्य है तो मैं ये धनुष यज्ञ का कार्यक्रम रखता ही नही और इस उपहास का पात्र न बनता।

जनक जी के वचन सुनकर लक्ष्मण जी तमतमा उठे, उनकी भौंहें टेढ़ी हो गईं, होठ फड़कने लगे और नेत्र क्रोध से लाल हो गए। और भगवान श्री राम की ओर देखते है और रामचन्द्रजी के चरण कमलों में सिर नवाकर कहते हैं-

जिस सभा में रघुकुल मणि बैठे हों और उस सभा में ऐसे वचन अनुचित हैं। यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लूँ तो ये धनुष क्या चीज हैं। जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं॥

मैं सुमेरु पर्वत को मूली की तरह तोड़ सकता हूँ, हे भगवन्‌! आपके प्रताप की महिमा से यह बेचारा पुराना धनुष तो कौन चीज है। हे नाथ! आपके प्रताप के बल से धनुष को कुकुरमुत्ते (बरसाती छत्ते) की तरह तोड़ दूँ। और लक्ष्मण जी ने यहाँ तक कह दिया यदि ऐसा न करूँ तो प्रभु के चरणों की शपथ है, फिर मैं धनुष और तरकस को कभी हाथ में भी न लूँगा। जैसे ही लक्ष्मणजी क्रोध भरे वचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिशाओं के हाथी काँप गए। सभी लोग और सब राजा डर गए। सीताजी के हृदय में हर्ष हुआ और जनकजी सकुचा गए।

जब खूब बोले हैं तो श्री रामचन्द्रजी ने इशारे से लक्ष्मण को मना किया और प्रेम सहित अपने पास बैठा लिया।

Ram ji ka Shiv Dhanush todna :रामजी का  शिव धनुष तोडना 

अब विश्वामित्र जी ने शुभ समय जानकर अत्यन्त प्रेमभरी वाणी बोले- हे राम! उठो, शिवजी का धनुष तोड़ो और हे तात! जनक का संताप मिटाओ। उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥

गुरु के वचन सुनकर श्री राम जी ने चरणों में सिर नवाया, उनके मन में न हर्ष हुआ, न विषाद और सहज स्वभाव से ही उठ खड़े हुए। सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥

आज सीता जी राम जी को आते हुए देख रही है लेकिन थोड़ा मन में दर है की तोड़ भी पाएंगे या नहीं। क्योंकि जब पुष्प वाटिका में भगवान फूल तोड़ रहे थे तो उनके चेहरे पर पसीना आ रहा था। और आज धनुष तोड़ने जा रहे हैं तो ना जाने क्या हों जायेगा। माँ जानकी ने भोले नाथ, माँ पार्वती और गणेश जी से प्रार्थना की हैं।

गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा॥बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी॥

हे गणों के नायक, वर देने वाले देवता गणेशजी! मैंने आज ही के लिए तुम्हारी सेवा की थी। बार-बार मेरी विनती सुनकर धनुष का भारीपन बहुत ही कम कर दीजिए।

और अंत में किशोरी जी ने धनुष से ही प्रार्थना की हैं की आज तुम्हे हल्का हों जाना हैं क्योंकि आज भगवान राम तुझे उठाने जा रहे हैं।

रामजी धनुष की और बढे जा रहे हैं। मन ही मन उन्होंने गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को उठा लिया।

लेते, चढ़ाते और जोर से खींचते हुए किसी ने नहीं लखा (अर्थात ये तीनों काम इतनी फुर्ती से हुए कि धनुष को कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा, इसका किसी को पता नहीं लगा), सबने श्री रामजी को (धनुष खींचे) खड़े देखा। उसी क्षण श्री रामजी ने धनुष को बीच से तोड़ डाला। भयंकर कठोर ध्वनि से (सब) लोक भर गए॥

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥ तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥

तुलसीदासजी कहते हैं (जब सब को निश्चय हो गया कि) श्री रामजी ने धनुष को तोड़ डाला, तब सब ‘श्री रामचन्द्र की जय’ बोलने लगे।

 

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