Ramayan : Ram-Sita Vivaah Story in hindi part 2

Ramayan : Ram-Sita Vivaah Story in hindi part 2

रामायण : राम-सीता विवाह कहानी(कथा) पार्ट 2

 

पहले पार्ट में आपने पढ़ा की किस प्रकार गुरुदेव विश्वामित्र जी ने राम-लक्ष्मण का परिचय जनक आदि लोगों से करवाया। अब भगवान प्रातः काल उठे है और स्नान कर गुरूजी की पूजा की है। गुरुदेव ने उन्हें फूलवाड़ी के लिए भेजा है। गुरु की आज्ञा पाकर दोनों भाई फूल लेने चले। भगवान फुलवारी के लिए पधारे हैं। और भगवान मधुर-मधुर फूल चुन रहे हैं। उसी समय जनकनन्दनी श्री सीता जी का वहां आगमन हुआ हैं। और वहां पर एक सखी ने भगवान को देखा है-एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥

Sita-Ram  Pushp-Vatika-  सीता-राम पुष्प-वाटिका मिलन 

एक सखी सीताजी का साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने चली गई थी। और अपनी सुध-बुध खो बैठी है दौड़कर सीताजी के पास गई। और कहती हैं 2 बहुत प्यारे हैं-स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥

एक श्याम हैं और एक गोरे हैं मैं कैसे उनके रूप का वर्णन करूँ? क्योंकि जिन आखों ने देखा हैं वो बोल नही सकती और जिसको जुबान हैं वो देख नही सकती है। क्योंकि शब्दों से प्रेम को व्यक्त नही किया जा सकता है। फिर भी जैसे तैसे सीताजी को बताया है।

अब सीताजी भगवान का दर्शन पाने के लिए चली हैं।

कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥ मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥

सीता जी के जब चल रही हैं तो उनके नुपुर से अलोकिक ध्वनि आ रही है। जब भगवान ने इस शब्द को सुना है तो रामजी के ह्रदय में हलचल हो गई हैं और लक्ष्मण को कहते हैं- अरे लक्ष्मण! ये वही जनकनन्दनी हैं जिनके लिए यज्ञ हो रहा है।

लक्ष्मण जी बोले की मुझे क्यों बता रहे हो, आप ही देखो। क्योंकि लक्ष्मण की तो माँ हैं और उनका ध्यान तो बस चरणों में है।

लेकिन कोई भी मर्यादा नही टूटी है यहाँ बहुत अद्भुत मिलान है।

राम को देख कर के जनकनन्दनी, बगिया में खड़ी की खड़ी रह गई।

राम देखे सिया, सिया राम को , चारों अँखियाँ लड़ी की लड़ी रह गई॥

बस मन में दोनों के प्रेम जग गया है। यों तो रामजी छोटे भाई से बातें कर रहे हैं, पर मन सीताजी के रूप में लुभाया हुआ उनके मुखरूपी कमल के छबि रूप मकरंद रस को भौंरे की तरह पी रहा है।

सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं। आप रामचरितमानस जी में पढ़ सकते हैं गोस्वामी जी ने कितना सुंदर इनके मिलान का वर्णन दिया है।

तभी एक सखी कहती हैं की बहुत देर हो गई है हमें चलना चाहिए। सखी की यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गईं। देर हो गई जान उन्हें माता का भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्री रामचन्द्रजी को हृदय में ले आईं और उनका ध्यान करती हुई अपने को पिता के अधीन जानकर लौट चलीं।

अब सीताजी महल में आकर सोच रही हैं ये शिव जी का धनुष(shiv Dhanush) कितना कठोर है भगवान इसको किस प्रकार तोड़ पाएंगे। सीताजी भवानी माँ के मंदिर में गई और भगवान की वंदना की है-

जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥ जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥

हे श्रेष्ठ पर्वतों के राजा हिमाचल की पुत्री पार्वती! आपकी जय हो, जय हो, हे महादेवजी के मुख रूपी चन्द्रमा की (ओर टकटकी लगाकर देखने वाली) चकोरी! आपकी जय हो, हे हाथी के मुख वाले गणेशजी और छह मुख वाले स्वामिकार्तिकजी की माता! हे जगज्जननी! हे बिजली की सी कान्तियुक्त शरीर वाली! आपकी जय हो!

मेरे मनोरथ को आप भलीभाँति जानती हैं, क्योंकि आप सदा सबके हृदय रूपी नगरी में निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजी ने उनके चरण पकड़ लिए।

गिरिजाजी सीताजी के विनय और प्रेम के वश में हो गईं। उन (के गले) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुस्कुराई। सीताजी ने आदरपूर्वक उस प्रसाद (माला) को सिर पर धारण किया। गौरीजी का हृदय हर्ष से भर गया और वे बोलीं–हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मनःकामना पूरी होगी। जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा। और माँ कहती हैं –

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥

एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से ही सुंदर साँवला वर (श्री रामचन्द्रजी) तुमको मिलेगा। वह दया का खजाना और सुजान (सर्वज्ञ) है, तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है। इस प्रकार श्री गौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सब सखियाँ हृदय में हर्षित हुईं। तुलसीदासजी कहते हैं- भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चलीं॥

इधर भगवान लौटकर आये हैं और श्री रामचन्द्रजी ने विश्वामित्र से सब कुछ कह दिया। राम कहा सबु कौसिक पाहीं। फूलों से गुरु जी पूजा की है। फिर दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे मनोरथ सफल हों। यह सुनकर श्री राम-लक्ष्मण सुखी हुए॥

इसके बाद भगवान ने संध्या वंदन किया है। पूर्व दिशा में सुंदर चन्द्रमा उदय हुआ।पहले राम सुंदर चन्द्रमा को जानकी जी के मुख के समान मान रहे थे लेकिन फिर कहते हैं नही,नही ये चन्द्रमा मेरी जानकी से तुलना नही कर सकता है। इसमें तो कलंक हैं और मेरी किशोरी निष्कलंक है।

भगवान कहते हैं मैंने गलती कर दी ये कह कर की सीताजी का मुख चन्द्रमा जैसा है। मुझे इसका दोष जरूर लगेगा। फिर भगवान सोचते इस प्रकार बड़ी देर हो गई ये जानकार भगवान गुरुदेव के पास गए हैं। फिर भगवान ने शयन किया है।

प्रातःकाल भगवान उठे हैं। गुरुदेव को प्रणाम किया है। दैनिक नित्यकर्म पुरे किये हैं। फिर शतानन्दजी जी आये हैं और कहा हैं की धनुष यज्ञ(Dhanush Yagy) का कार्यक्रम शुरू हो गया हैं गुरुदेव। आप राम लक्ष्मण को लेकर पधारिये।

अब राम-लक्ष्मण को लेकर गुरुदेव चल रहे हैं और कहते हैं – सीय स्वयंबरू देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥

विश्वामित्र जी राम और लक्ष्मण को कहते है चलो, शिव धनुष यज्ञ देखने चलते है। और देखते है आज भगवान किसको बड़ाई दिलवाते है। कौन इस धनुष को तोड़ेगा। लक्ष्मण को ये बात पसंद नही आई। जो गुरुदेव ने कहा की किसको बड़ाई मिलेगी ये मालूम नहीं।

लक्ष्मण जी कहते हैं- लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई॥

लक्ष्मणजी ने कहा- हे नाथ! जिस पर आपकी कृपा होगी, वही बड़ाई का पात्र होगा (धनुष तोड़ने का श्रेय उसी को प्राप्त होगा)॥

Shiv Dhanush : शिव धनुष 

लक्ष्मण की इस बात को सुनकर मुनि बहुत प्रसन्न हुए। इस तरह से राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र जी धनुष यज्ञ के कार्यक्रम में पहुंचे हैं। बड़ा ही सुंदर मंडप सजाया गया हैं। सारे मिथिलापुरी के वासी आये हुए हैं। बड़े -बड़े राजा और महाराजा आये हुए हैं। जैसे ही भगवान वहां पहुंचे हैं सारा वातावरण ही अद्भुत हो गया हैं। जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥

जिसका जैसे भाव था भगवान श्री राम का सबको उसी रूप में दर्शन होने लगा हैं।

मैया सुनैना और और जनक समेत जितने भी वृद्धजन बैठे हुए हैं सबको भगवान एक शिशु के रूप में दिखाई दे रहे हैं। सभी योगियों को भगवान परम तत्व के रूप में दिखाई दे रहे हैं। जितने भी धुरंधर और बलशाली राजा बैठे हुए थे उन्होंने प्रभु को प्रत्यक्ष काल के समान देखा। लगने लगा की कोई बहुत बड़ा योद्धा आया हैं।

स्त्रियाँ हृदय में हर्षित होकर अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें देख रही हैं। और गोस्वामी जी ने यहाँ भगवान के सुंदर रूप का काफी अद्भुत वर्णन किया हैं। मनुष्यों की तो बात ही क्या देवता लोग भी आकाश से विमानों पर चढ़े हुए दर्शन कर रहे हैं और सुंदर गान करते हुए फूल बरसा रहे हैं।

तब सुअवसर जानकर जनकजी ने सीताजी को बुला भेजा। सब चतुर और सुंदर सखियाँ आरदपूर्वक उन्हें लेकर आई हैं। यहाँ पर तुलसीदास जी ने भगवान राम को रूप सौंदर्य का तो जैसे तैसे वर्णन कर दिया लेकिन माँ जानकी के रूप का वर्णन कर ही नही पाये। और तुलसीदास जी ने लिख दिया की इनके रूप का वर्णन तो किया ही नही जा सकता हैं। रूप और गुणों की खान जगज्जननी जानकीजी की शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। क्योंकि माँ जगतजननी के लिए सब उपमाएं और शब्द छोटे पड़ रहे हैं। जो भी अलंकार और शब्द स्त्रियों के लिए कहे जाते हैं वो इस लौकिक जगत में कहे जा सकते हैं। काव्य की उपमाएँ सब त्रिगुणात्मक, मायिक जगत से ली गई हैं, उन्हें भगवान की स्वरूपा शक्ति श्री जानकीजी के अप्राकृत, चिन्मय अंगों के लिए प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपने को उपहासास्पद बनाना है)

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥ उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥

जब सीताजी ने रंगभूमि में पैर रखा, तब उनका (दिव्य) रूप देखकर स्त्री, पुरुष सभी मोहित हो गए। लेकिन माँ सीता का मन तो भगवान श्री राम में हैं।  इधर जब भगवान राम ने भी जानकी जी का दर्शन किया हैं तो उनकी आँखे स्थिर हो गई हैं।परन्तु गुरुजनों की लाज से तथा बहुत बड़े समाज को देखकर सीताजी सकुचा गईं। वे श्री रामचन्द्रजी को हृदय में लाकर सखियों की ओर देखने लगीं।

श्री रामचन्द्रजी का रूप और सीताजी की छबि देखकर स्त्री-पुरुषों ने पलक मारना छोड़ दिया (सब एकटक उन्हीं को देखने लगे)। आज सभी विधाता से प्रार्थना कर रहे हैं की राम और सीता का पवित्र विवाह जल्दी से हो जाये।सब लोग इसी लालसा में मग्न हो रहे हैं कि जानकीजी के योग्य वर तो यह साँवला ही है।

धनुष यज्ञ कार्यक्रम आरम्भ हुआ हैं। अब बड़े-बड़े योद्धा शिव धनुष को तोड़ने के लिए आये हैं। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुष को देखकर गौं से (चुपके से) चलते बने (उसे उठाना तो दूर रहा, छूने तक की हिम्मत न हुई)। एक-एक योद्धा धनुष तो तोड़ने के लिए आते हैं लेकिन तोडना तो दूर उसे हिला भी नही पा रहे हैं जिस कारण से उन्हें राजसभा में शर्मिंदा होना पड़ रहा है। जिन राजाओं के मन में कुछ विवेक है, वे तो धनुष के पास ही नहीं जाते।

तब 10 हजार राजाओं ने एक साथ धनुष को उठाने का पर्यत्न किया है लेकिन धनुष अपनी जगह से टस से मस भी नही हुआ है। भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा॥

अब राजसभा में सभी राजाओं का उपहास हो रहा है। और सभी राजा हार गए है थक गए है। तो जनक जी को क्रोध आने लगा है।

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